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Bihar election 2020: राजनीति की पिच पर पूर्व एएसआई ने पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय को पछाड़ा
Sat, 10 Oct 2020 09:11 PM IST
देव कश्यप
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
Published by: देव कश्यप
Updated Sat, 10 Oct 2020 09:11 PM IST
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बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय
- फोटो : PTI
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बिहार विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण के लिए नामांकन का दौर आठ अक्तूबर को खत्म हो गया और इसी के साथ इस विधानसभा चुनाव में बक्सर सीट से चुनाव लड़ने की आस भी पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय की खत्म हो गई। लेकिन सियासी गलियारों में गुप्तेश्वर पांडेय का नाम आज भी चर्चा में है। विरोधी उनके वीआरस लेने और टिकट नहीं मिलने की बात को लेकर उपहास कर रहे हैं तो समर्थकों को कहीं न कहीं आस है कि आने वाले दिनों में पांडेय जी के साथ कुछ जरूर अच्छा होगा।
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इसी बीच बक्सर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे परशुराम चतुर्वेदी को लेकर एक बात आजकल चर्चा में है। सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खासम खास रह चुके गुप्तेश्वर पांडेय को एक पूर्व एएसआई से मुंह की खानी पड़ी है। डीजीपी पांडेय किसी जमाने में जमादार (एएसआई) रह चुके परशुराम चतुर्वेदी से टिकट की रेस हार गए हैं। चतुर्वेदी ने अपने पत्ते कुछ इस तरह सेट किए कि जदयू से टिकट पाने की रेस में पांडेय औंधे मुंह गिरे और धराशाही हो गए।
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देखें तो परशुराम चतुर्वेदी और गुप्तेश्वर पांडेय में कुछ चीजें कॉमन है। जैसे दोनों एक ही बिरादरी से आते हैं, दोनों पुलिस सेवा से जुड़े हुए हैं और दोनों ने अपनी राजनीतिक इच्छा को पूरा करने के लिए वीआरएस लिया है। लेकिन राजनीति के इस खेल में एक एएसआई ने एक डीजीपी को मात दे दी है।
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परशुराम चतुर्वेदी (54) बक्सर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर अपना नामांकन कर चुके हैं। यहां 28 अक्तूबर को वोट डाले जाएंगे। वहीं, 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी गुप्तेश्वर पांडेय, जिन्होंने बक्सर सीट से चुनाव लड़ने के लिए डीजीपी के पद से वीआरएस लिया था और 22 सितंबर को नीतीश कुमार की उपस्थिति में जदयू में शामिल हुए थे, उनका सपना टूट चुका है क्योंकि बक्सर क्षेत्र सीट बंटवारे के तहत भाजपा के पास चली गई।
वहीं, इस बार में चतुर्वेदी का कहना है कि 'मैं पिछले दो दशकों से भाजपा के साथ जुड़ा हुआ हूं। मुझे किसान प्रकोष्ठ की कार्यकारी समिति के साथ-साथ राज्य कार्यकारी समिति का सदस्य नियुक्त किया गया। कोविड-19 महामारी के दौरान मेरे काम ने शीर्ष नेतृत्व का ध्यान आकर्षित किया, जिन्होंने सीट के लिए मेरी उम्मीदवारी का चयन किया।'
चतुर्वेदी अपने स्कूल के दिनों से ही राजनीति में आने के इच्छुक थे। 1977 में वह जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाए गए छात्र आंदोलन से जुड़े थे, लेकिन वह अपने परिवार को चलाने के लिए पुलिस विभाग में शामिल हो गए। उन्होंने कहा कि 'एक कांस्टेबल के रूप में मेरे काम ने मुझे कई पुलिस अधिकारियों का करीबी बना दिया, जिनमें डीपी ओझा (पूर्व डीजीपी) और रमेश प्रसाद सिंह (पूर्व एसपी, ग्रामीण, पटना) शामिल हैं। मैंने राजनीति में शामिल होने के लिए 2004-05 में नौकरी छोड़ने का फैसला करने से पहले पटना में राज्य के आपराधिक जांच विभाग में भी काम किया।'
चतुर्वेदी ने कहा कि 'यह मेरे लिए एक बड़ी चुनौती है। पार्टी ने मुझ पर विश्वास किया है और मुझे इसे सही ठहराना है। पूर्व डीजीपी पांडेय के बारे में पूछे जाने पर के चतुर्वेदी ने कहा कि 'मैं उन्हें अपने बड़े भाई के रूप में मानता हूं। मुझे उनसे बहुत लगाव है। मैंने कभी उन्हें अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं माना।
बता दें, बक्सर विधानसभा से चतुर्वेदी का नाम आने के बाद पूर्व डीजीपी पांडेय ने अपने फेसबुक पर एक भावनात्मक पोस्ट शेयर किया, जिसमें उन्होंने राजनीति में शामिल होने पर अपना रुख साफ किया। उन्होंने कहा था कि 'मैं इस बार विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने जा रहा हूं। मेरा जीवन संघर्षों से भरा है और लोगों की सेवा के लिए समर्पित है।' उन्होंने जदयू से टिकट कटने के बाद एक सधे राजनीतिज्ञ की तरह कहा कि नीतीश कुमार किसी को ठगते नहीं हैं। अब मैं चुनाव नहीं लडूंगा। समीकरण नहीं बैठे। नीतीश जी जो कहेंगे, सो करेंगे। लेकिन इस दौरान पूर्व डीजीपी पांडेय के चेहरे पर टिकट नहीं मिलने का मलाल साफ दिख रहा था। पांडे ने खुद को जदयू का सच्चा सिपाही बताया।