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लक्ष्मणपुर बाथे मामला: फैसले के विरोध में प्रदर्शन
Updated Thu, 10 Oct 2013 12:50 PM IST
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बिहार के बहुचर्चित लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार मामले में पटना उच्च न्यायालय द्वारा सभी 26 अभियुक्तों को बरी किए जाने के मामले में सीपीआई माले ने आज राज्य भर में विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया है।
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बुधवार को पटना उच्च न्यायलय ने बिहार के इस बहुचर्चित मामले के सभी 26 अभियुक्तों को बरी कर दिया था। साल 2010 में निचली अदालत ने इस मामले में 16 लोगों को फांसी और दस लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
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सीपीआई माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने बीबीसी को बताया कि उनकी पार्टी इस नरसंहार में मारे गए लोगों के परिजनों की ओर से लडाई जारी रखेगी। उनका कहना था कि मारे गए ज्यादातर लोग सीपीआई माले के कार्यकर्ता थे।
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उन्होंने कहा, "ये चौथा मामला है जहां उच्च न्यायालय ने दलितो के खिलाफ फैसला दिया है। ये न्याय की हत्या जैसा है। हम बथानी टोला मामले में सुप्रीम कोर्ट में जा चुके हैं। इस मामले में भी हम सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे। हम पूछना चाहेंगे कि निचली अदालत ने किन आधार पर इन अभियुक्तों को सजा सुनाई थी।"
उनका कहना था कि इस फैसले के विरोध में सीपीआई माले गुरुवार को राज्य भर विरोध प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने इस मामले में विशेष जांच दल का गठन करने की मांग की।
अदालत का फैसला
इससे पहले फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायलय के न्यायाधीश वीएन सिन्हा और न्यायाधीश एके लाल की खंडपीठ ने कहा था कि अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए गवाह और साक्ष्य विश्वसनीय नहीं हैं। इसलिए सभी दोषियों को संदेह का लाभ देते हुए रिहा किया जाता है।
अदालत के सामने पुलिस ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिसके आधार पर अभियुक्तों को सजा मिल पाए। पुलिस की रिपोर्ट बहुत कमजोर थी।
उच्च न्यायलय ने 27 जुलाई को मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
निचली अदालत ने सुनाई थी सजा
एक दिसंबर 1997 को बिहार के जहानाबाद जिले के लक्ष्मणपुर और बाथे गांव में नरसंहार हुआ था। हमलावरों ने 58 दलितों की हत्या कर दी थी। मारे जाने वालों में 27 महिलाएं और 16 बच्चे भी थे।
घटना के करीब 13 साल बाद 2010 में पटना की एक विशेष अदालत ने 16 लोगों को फांसी और 10 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। सात अप्रैल 2010 को अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायधीश विजय प्रकाश मिश्रा ने इस हत्याकांड को 'समाज के चरित्र पर धब्बा और दुर्लभतम हत्याकांड' बताया था।
लेकिन, अब तीन साल बाद पटना उच्च न्यायलय ने हुए इस नरसंहार के सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है।