JDU-RJD की सत्ता में वापसी का रोड़ा बनेंगी ये 5 बातें
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पिछले दस साल से बिहार की सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं। आमतौर पर शांत चित्त रहने वाले नीतीश इस बार तीखे तेवरों के साथ मैदान में हैं वजह भी जायज है मुकाबला अपने पुराने सहयोगी भाजपा से जो है।
लेकिन पिछली दो बार से आसानी से बिहार की सत्ता पर काबिज होने वाले नीतीश कुमार के लिए इस बार परिस्थितियां इतनी आसान नहीं हैं। ऐसी कई वजहे हैं जो अपने पुराने जोड़ीदार लालू यादव के साथ मैदान में उतरे नीतीश कुमार की राहें मुश्किल करती दिख रही हैं।
उनकी सबसे बड़ी परेशानी तो ये है कि चुनाव में उनका मुकाबला सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से है। ऐसे में नीतीश के सामने करो या मरो की स्थिति पैदा हो चुकी है क्योंकि चुनाव में शिकस्त मिली तो साफ है लालू यादव भी उनका हाथ झटकने में देर नहीं लगाएंगे। तो आएये निगाह डालते हैं ऐसे ही पांच कारणों पर जो बिहार चुनाव में उनकी राह कर सकते हैं मुश्किल।
सत्ता विरोधी लहर से पार पाना
नीतीश के लिए सबसे बड़ी दिक्कत है चुनावों में सत्ता विरोधी रुझानों से पारा पाना। बीते दस साल से बिहार में शासन कर रहे नीतीश कुमार ने बेशक काफी विकास कराया है लेकिन इस दौरान उनकी कई कमजोरियां भी सामने आई हैं।
शिक्षकों के मुद्दे को लगातार लटकाए रखना सरकारी, कर्मचारियों के डीएम में अंतिम समय में बढोत्तरी के अलावा भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्होंने नीतीश सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान तैयार कर दिया है।
नीतीश की एक दिक्कत ये भी है कि चुनावों में उनके भागीदार लालू यादव भी उनसे पहले लगातार 15 साल तक बिहार में शासन कर चुके हैं। ऐसे में जनता उनके दौर को भी नीतीश के साथ जोड़कर देख रही है साफ है कि सत्ता विरोधी रुझान का खामियाजा पूरे महागठबंधन को ही उठाना होगा।
महादलित जातियों का छिटकता वोट बैंक
लोकसभा चुनावों में हार के बाद नीतीश कुमार ने खुद मुख्यमंत्री पद छोड़कर दलितों में महादलित की परिभाषा गढ़ते हुए मुसहर जाति के जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था।
इसके पीछे बेशक उन्होंने चुनावों में हार की नैतिक जिम्मेदारी लेने की बात कही थी लेकिन उनका मकसद बिहार के लगभग 16 फीसदी महा दलित वोट बैंक को भी अपने पाले में करने का था।
लेकिन मांझी को सत्ता से हटाने के बाद उनका यह दांव उल्टा पड़ गया और मांझी ने इस मुद्दे को महादलितों के अपमान से जोड़ दिया। आज मांझी भाजपा के पाले में हैं तो साफ है नीतीश कुमार को बिहार की इस बड़े वोटर का नुकसान भी झेलना पड़ेगा।
भारी पड़ रहा लालू यादव का साथ
विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार की सबसे बड़ी दिक्कत उनके सबसे बड़े दोस्त लालू यादव ही हैं। लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन को बिहार में जंगलराज के तौर पर जाना जाता है।
लालू के राज को जंगलराज की संज्ञा देकर ही नीतीश कुमार बिहार की सत्ता पर काबिज हुए थे। आज उसी लालू यादव से यारी कर महागठबंधन के साथ चुनावी मैदान में उतरे नीतीश कुमार अब विरोधियों के निशाने पर हैं।
भाजपा जहां वोटरों को जंगलराज 2 का डर दिखाकर महागठबंधन से डरा रही है वहीं आम जनता के दिमाग में भी अभी तक उस जंगलराज की बात बैठी हुई है। नीतीश कुमार को इस मुद्दे पर भी विरोधियों को जवाब देना मुश्किल हो रहा है। भाजपा भी लगातार पूरे प्रदेश में रथ घुमा घुमाकर जंगलराज 2 का ज्यादा से ज्यादा प्रचार कर रही है।
बिगड़ती कानून व्यवस्था
भाजपा से साल 2013 में गठबंधन तोड़ने के बाद नीतीश कुमार राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू यादव के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं। लेकिन बीते दो साल में बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति काफी बिगड़ी है।
आंकड़े भी इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पिछले कुछ समय में नीतीश कुमार प्रशासन पर अपनी पकड़ छोड़ चुके हैं। नतीजतन बिहार में धीरे-धीरे जरायम का दौर लौटता दिख रहा है। हत्या और डकैती की वारदातों में पिछले कुछ समय में वृद्िध हुई है।
हालांकि नीतीश आंकडों के सहारे इसे झुठलाने की कोशिश करते हैं लेकिन यह भी सच है कि बिगड़ती कानून व्यवस्था बिहार चुनावों में एक मुद्दा बन चुकी है और भाजपा इसे ज्यादा-ज्यादा भुनाने के प्रयास में लगी है।
ओवैसी की एंट्री ने बिगाड़ा खेल
नीतीश और उनके जोड़ीदार लालू यादव के लिए बिहार चुनावों में सबसे बड़ा रोड़ा बन गए हैं एमआईएम नेता और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी।
ओवैसी ने बिहार के सीमांचल में दो दर्जन सीटों से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। खुद को सबसे बड़ा सेक्युलर बताकर बिहार में मुस्लिम वोटों पर एकतरफा हक जताने वाले लालू यादव को इससे बड़ा झटका लगा है।
क्योंकि ओवैसी की एंट्री के बाद साफ है कि बिहार में मुस्लिम वोटों का बंटवारा होगा जिसका खामियाजा महागठबंधन को ही उठाना पड़ेगा। लालू यादव के लिए ये इसलिए भी दोहरा झटका है क्योंकि वो मुस्लिम यादव समीकरण के सहारे ही वापिस सत्ता में लौटने की कवायद में लगे थे।
वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए ओवैसी की एंट्री सुखद नहीं है क्योंकि मुस्लिम वोटों को खोने के डर से ही उन्होंने नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा से गठबंधन तोड़ने में एक मिनट नहीं लगाई थी।