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बिहार में विकास नहीं ये होगा सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा

Wed, 02 Sep 2015 04:17 PM IST
Updated Wed, 02 Sep 2015 04:17 PM IST
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 bihar assembly election 2015,  cast factor is more important

बिहार में विधानसभा चुनावों की जंग रोचक होती जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी की विशेष दिलचस्पी और सभी प्रमुख दलों के लगभग दो पालों के बीच सिमटने से टक्कर बराबर की दिख रही है।

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विकास का बड़ा सपना दिखाकर केन्द्र की सत्ता पर काबिज होने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने बेशक चुनावों में विकास और भ्रष्टाचार चुनावों के लिए अहम मुद्दा बना दिया हो लेकिन बिहार में ये जरूरी मुद्दे गैरजरूरी होते दिख रहे हैं।
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आलम ये है कि विकास से बात शुरू करने वाली सभी पार्टियां एक एक कर वापस कास्ट कार्ड की ओर लौटती दिख रही हैं। बीते दिनों पटना के गांधी मैदान में हुई महागठबंधन की स्वाभिमान रैली में इसकी साफ-साफ झलक भी दिखी जब पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने हर जाति बिरादरी का नाम लेकर उस पर डोरे डालने की कोशिश की।
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बोले लालू, हमें छोड़कर कहा जाएंगे यादव

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लाखों की भीड़ में लालू ने खुलमखुल्ला खुद को यादवों का पहरूआ दिखाने की कोशिश की तो अन्य पिछडों के बीच भी अपनी अहमियत साबित करने का प्रयास किया। अपने भाषण में लालू यहां तक भी कह गए कि यादव हमें छोड़कर कहा जाएंगे। शायद बिहार में कास्ट फैक्टर का ही असर है कि लालू यादव लगातार केन्द्र सरकार पर जनगणनना के जातिगत आंकड़े जारी करने के लिए दबाव बना रहे हैं।

वहीं रैली के दौरान ही मुख्यमंत्री नीतीश ने भी खुद को पिछड़े समाज से आया बताकर बिहार की एक बड़ी आबादी पर हक जताया। ऐसा नहीं है जेडीयू-राजद ही केवल कास्ट कार्ड खेलने की जुगत में हैं, उनकी इस मंशा को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी भलीभांति समझ रहे हैं।

यही कारण है कि पूर्व में बिहार में हुई राजग की रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री के नाम पर ही बिरादरी का पत्ता उछाल दिया। अमित शाह यह कहने से भी नहीं चूके कि भाजपा ने ही देश को पहला पिछड़े वर्ग का पीएम दिया है।

अमित शाह ने मोदी को बताया था पहला ओबीसी पीएम

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हालांकि पीएम मोदी अपनी सभाओं में खुद को विकास के मुद्दों तक ही सीमित रखते हैं, लेकिन उनके सिपहसलार इस मुद्दे को बुलंद किए हुए हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले राजग के घटक दलों पर एक निगाह डाल ली जाए तो इसकी झलक दिख जाएगी।

जिसमें बिहार की आबादी में 16 फीसदी योगदान रखने वाले दलित समाज के राम विलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा शामिल हैं तो महा दलित वर्ग से आने वाले पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी भी हैं।

बिहार में गहरी पैंठ रखने वाले यादवों की नुमाइंदगी करने के लिए पप्पू यादव भी भाजपा का दामन थामते दिख रहे हैं तो मुस्लिमों को लुभाने के लिए पूर्व जेडीयू महासचिव साबिर अली को भी हाल ही में भाजपा में शामिल किया गया है।

वहीं बिहार चुनावों में एमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैशी के आने से सभी दलों के लिए समीकरण और उलझ गए हैं। ऐसे में हर किसी की निगाह अपनी अपनी बिरादरियों को एकजुट करने पर है।

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