बिहारः दोराहे पर खड़ी हैं ऊंची जातियां
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मीडिया बिहार में अन्य पिछड़ी जातियों, अति पिछड़ी जातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के वोटिंग पैटर्न का अनुमान लगाने में व्यस्त हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि सबसे अधिक ऊहापोह की स्थिति ऊंची जातियों के वोटरों में है। आकलनों के अनुसार राज्य में ऊंची जाति के वोटरों की संख्या 14-15 प्रतिशत है।
पिछले लोकसभा चुनाव में ऊंची जाति के 78 प्रतिशत वोटरों ने बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को वोट दिया था, जो कि किसी समुदाय के मुक़ाबले सर्वाधिक है।
जबकि 42 प्रतिशत दलितों और 53 प्रतिशत अति पिछड़ी जातियों के मतदाताओं ने एनडीए को वोट दिया था। ओबीसी जातियों में सबसे अधिक संख्या वाली यादव बिरादरी ने राजद-कांग्रेस-एनसीपी को संयुक्त रूप से वोट किया था, यादवों का केवल पांचवां हिस्सा ही भगवा ब्रिगेड के पीछे गया।
राज्य में हमेशा की तरह ही ऊंची जातियां माहौल बनाने वाली मुख्य शक्ति हैं, लेकिन मीडिया इनके संभावित वोटिंग पैटर्न को नज़रअंदाज़ कर रही है।
पढ़ें विस्तार से-
एनडीए के पक्ष में होती थी ऊंची जातियां
यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर के साथ विकल्प के रूप में नरेंद्र मोदी को मज़बूती से सामने लाने की योजना ऊंची जाति की एक बड़ी संख्या को 2014 के चुनाव में एनडीए के क़रीब ले गई।
हालांकि इन 15 महीनों के दौरान केंद्र सरकार के प्रति उनका मोह कुछ कम हुआ है, इसके बावजूद उनका झुकाव जेडी-यू, आरजेडी और कांग्रेस के महागठबंधन की ओर नहीं हुआ है।
अपने दिल की सुनें या दिमाग की, अधिकांश ऊंची जातियों में ये आत्मसंघर्ष तेज़ हो गया है, दिमाग से, उनमें से बड़ी संख्या में वोटरों का मोदी सरकार के प्रति पहले वाला झुकाव नहीं रहा क्योंकि मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान जो बड़े-बड़े वादे किए थे उनमें से किसी को पूरा नहीं किया।
नए रोज़गार के कोई अवसर नहीं पैदा किए गए, ना ही काला धन देश में लाया गया, न्यूनतम समर्थन मूल्य में बहुत मामूली बढ़ोतरी हो पाई। भूमि अधिग्रहण नीति से ऊंची जातियों को ज़ोर का झटका लगा क्योंकि पिछड़ों के मुक़ाबले वो ज़्यादा ज़मीनों के मालिक हैं। कार्पोरेटीकरण से ऊंची जातियों के कुछ गिने चुने लोगों को ही फायदा पहुंचा।
असमंजस है बरकरार
लेकिन दिल से वे अभी भी एनडीए के साथ हैं और स्वाभाविक रूप से इसका कारण सामाजिक और भावनात्मक है। 21वीं सदी के इस युग में ऊंची जातियों की एक बड़ी संख्या अभी भी उस गठबंधन को वोट देने के लिए तैयार नहीं है जो पिछड़ी जातियों का समर्थन करता है।
वे इस तर्क का सहारा ले सकते हैं कि नीतीश कुमार ने मंडल मसीहा लालू प्रसाद यादव के साथ हाथ मिला लिया है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। पिछले साल भी उन्होंने नीतीश का साथ छोड़ा था जबकि लालू उनके साथ नहीं थे।
वे ये भी तर्क दे सकते हैं कि उन्होंने नीतीश को इसलिए सबक सिखाया क्योंकि उन्होंने 2013 में बीजेपी की पीठ में छुरा भोंका, लेकिन ऐसा करने वाले नीतीश अकेले तो नहीं हैं।
साल 2008 में ईसाई विरोधी दंगे के बाद 2009 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले नवीन पटनायक ने भी ऐसा ही किया था। उन्होंने 2009 का विधानसभा चुनाव और ओडिशा में लोकसभा का चुनाव जीतने के लिए बीजेपी से नाता तोड़ लिया।
नीतीश से रिश्ता
ममता बनर्जी का भी बीजेपी से नाता तोड़ने का इतिहास रहा है, यहां तक कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में नरेंद्र मोदी का रथ भी रोक दिया। इन दोनों के मुक़ाबले नीतीश कुमार का काम करने का रिकॉर्ड कुछ कमतर नहीं है।
हालांकि वो ऊंची जातियों के वोटरों को आकर्षित करने में विफल रहे, 16 जून 2013 तक, जब उन्होंने भगवा पार्टी के साथ गठबंधन तोड़ा, ऊंची जातियां उनकी तारीफ़ करती नहीं थकती थीं।
नीतीश 2014 में परिस्थिति को भांप नहीं पाए, लेकिन चुनाव के बाद उन्होंने आश्चर्यजनक ढंग से यू-टर्न लिया। क़रीब दो दशक की तीखी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बाद उन्होंने अपने पुराने दोस्त लालू प्रसाद यादव को साथ लाकर अपनी क़िलेबंदी में बदलाव किया।
इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि 24 नवंबर 2005 से लेकर 16 जून 2013 के साढ़े सात वर्षों का समय 1990 के बाद से ऊंची जातियों के लिए राजनीतिक रूप से सबसे बेहतरीन समय था। पंद्रह सालों के लालू-राबड़ी राज में हाशिये पर जाने के बाद वे अब जाकर किंग मेकर के रूप में उभरे थे।
ये है रुझान
अगर ऊंची जातियों का भारी संख्या में बीजेपी की ओर झुकाव होता है तो इसलिए नहीं कि इस पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों से वे ख़ुश हैं। काम के प्रदर्शन के लिहाज़ से हो सकता है कि अभी भी वो मोदी के मुक़ाबले नीतीश को बहुत अधिक नंबर दें।
हालांकि ज़्यादा संभावना है कि वे बीजेपी को ही वोट कर सकते हैं क्योंकि उसे सत्ता में लाकर ही बिहार के सत्ता के केंद्रों पर क़ब्ज़ा जमा सकते हैं।
यहां तक कि अगर बीजेपी किसी पिछड़े नेता को मुख्यमंत्री के रूप में पेश करे, तो भी, ऊंची जातियों के लिए ये कोई समस्या नहीं होगी क्योंकि उन्होंने नीतीश के साथ रहना सीख लिया था। लेकिन ऐसा अब उसी आदमी के साथ संभव नहीं है।