दिमागी बुखार: अपने घरों को छोड़कर जा रहे लोग, नीतीश सरकार ने की पहली कार्रवाई
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बिहार के मुजफ्फरपुर में एईएस (एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम) से मरने वाले बच्चों की संख्या 129 हो गई है। इनमें से 109 मौत एसकेएमसीएच (श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल) अस्पताल में और 20 मौत केजरीवाल अस्पताल में हुई हैं। वहीं बिहार की नीतीश सरकार ने पहली बार दिमागी बुखार के संबंध में कार्रवाई की है।
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बिहार के मुजफ्फरपुर में एईएस (एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम) से मरने वाले बच्चों की संख्या 129 हो गई है। इनमें से 109 मौत एसकेएमसीएच (श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल) अस्पताल में और 20 मौत केजरीवाल अस्पताल में हुई हैं। वहीं बिहार की नीतीश सरकार ने पहली बार दिमागी बुखार के संबंध में कार्रवाई की है।
एसकेएमसीएच के सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर भीमसेन कुमार को भी ड्यूटी के वक्त लापरवाही करने पर निलंबित कर दिया गया है। पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच) के इस बाल चिकित्सक को स्वास्थ्य विभाग ने 19 जून को एसकेएमसीएच भेजा था।
Muzaffarpur: Senior Resident Doctor of Sri Krishna Medical College and Hospital (SKMCH), Dr Bhimsen Kumar, has been suspended for negligence of duty. The Health Department had deployed the Patna Medical College and Hospital (PMCH) pediatrician at SKMCH on 19 June. #Bihar
— ANI (@ANI) June 23, 2019
एईएस को बिहार में दिमागी बुखार या फिर चमकी बुखार कहा जा रहा है। हालात ऐसे हो चुके हैं कि लोग अपने बच्चों को लेकर अपने घरों से दूर जा रहे हैं। कुछ लोग अपने बच्चों को रिश्तेदारों के घर भेज रहे हैं। राज्य के वैशाली जिले के हरवंशपुर गांव में भी अब इस बीमारी के मामले सामने आ रहे हैं। ये गांव मुजफ्फरपुर से 40 किलोमीटर दूर है। यहां रहने वाली चतुरी सहनी ने 24 घंटे के अंदर अपने सात और दो साल के दोनों बेटों को एईएस के कारण खो दिया।
इस गांव में अब तक सात मौत के मामले सामने आ चुके हैं। अभी गांव के दो बच्चों का इलाज एसकेएमसीएच अस्पताल में चल रहा है। ये मामले सामने आने के बाद से ही गांव के लोग काफी डर गए हैं और अपने बच्चों को गांव से दूर भेज रहे हैं।
अपने बच्चों को खोने वाले छह परिवार दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। जिन्हें महीने में 10-12 दिन ही काम मिलता है। सरकार द्वारा घोषित चार लाख रुपये की क्षतिपूर्ति इनमें से एक भी परिवार को नहीं मिली है। हालांकि खंड विकास अधिकारी अरोम मोदी ने गांव का दौरा किया है।
बताया जा रहा है कि सहनी अब अपने दोनों बेटों के मृत्यु प्रमाणपत्रों के लिए अस्पताल के चक्कर लगा रहे हैं। ताकि मुआवजे में मिले पैसे उनके चार बच्चों के काम आ सकें।
फूस के घर बनाकर रोज के 500 रुपये कमाने वाले राजेश सहनी ने अपनी सात साल की बेटी रूपा को नौ जून को एईएस के चलते खो दिया। उनका कहना है, "एसकेएमसीएच में मेरे बच्चे की मौत के बाद मुझे सरकारी एंबुलेंस के लिए तीन घंटे तक लड़ना और इंतजार करना पड़ा। उस दिन मेरे अंदर का पिता सौ मौत मरा। मेरी बेटी पढ़ाई में अच्छी थी।"
सरकार की निष्क्रियता का विरोध करने पर 19 गांव वालों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। यहां के रहने वाले रामदेव सहनी ने भी अपनी सात साल की बेटी सिमरन को इस बीमारी में खो दिया है। पहले वो उसे किसी निजी डॉक्टर के पास लेकर गए, जहां से उसे एसकेएमसीएच अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया। सिमरन की अस्पताल पहुंचने से पहले रास्ते में ही मौत हो गई।
उन्हें अब इस बात का भी भरोसा नहीं है कि उन्हें सरकारी मुआवजा मिल पाएगा या नहीं। अब रामदेव का घर प्राथमिक हेल्थ कैंप बन चुका है। जिला प्रशासन ने भगवानपुर में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से दो डॉक्टरों और एक सहायक नर्स को भेज दिया है। जो दो शिफ्ट में काम करते हुए जागरुकता फैला रहे हैं और लोगों को जरूरी दवाईयां मुहया करा रहे हैं। लेकिन अधिकतर गांव वाले गांव छोड़कर जा चुके हैं।