Trucks:भारत की सड़कों पर सिर्फ 3% ट्रक, लेकिन 50% से ज्यादा प्रदूषण इन्हीं से, रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े
ट्रांसपोर्टेशन का एक बड़ा हिस्सा हजारों ट्रकों से होता है। जो दिन-रात सामान और प्रोडक्ट्स ले जाते हैं। भारतीय सड़कों पर चलने वाले सभी वाहनों में ट्रकों की संख्या सिर्फ 3 प्रतिशत है। फिर भी वे सभी पार्टिकुलेट मैटर एमिशन के 53 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
भारत में हर साल अरबों टन सामान एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जाता है। इस बड़े पैमाने की ढुलाई को Freight Transport (फ्रेट ट्रांसपोर्ट) कहा जाता है और इसकी रीढ़ हैं देश की सड़कें और उन पर दौड़ते ट्रक।
हैरानी की बात यह है कि भारतीय सड़कों पर कुल वाहनों में ट्रकों की हिस्सेदारी सिर्फ 3 प्रतिशत है। लेकिन यही ट्रक सड़क परिवहन से होने वाले 50 प्रतिशत से ज्यादा प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं।
ट्रक प्रदूषण का असली पैमाना कितना बड़ा है?
आंकड़ों के मुताबिक, ट्रक और भारी वाहन
-
53 प्रतिशत पार्टिकुलेट मैटर (PM)
-
60 प्रतिशत से ज्यादा ब्लैक कार्बन
-
और 70 प्रतिशत से अधिक नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx)
उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं।
अनुमान है कि 2030-31 तक मीडियम और हेवी ड्यूटी वाहनों का योगदान कुल सड़क परिवहन उत्सर्जन में 27 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत हो जाएगा। इसी अवधि में भारत की फ्रेट मांग लगभग तीन गुना बढ़ने वाली है।
स्मार्ट फ्रेट सेंटर (SFC) इंडिया, TERI, और IIM-बैंगलोर की जारी एक नई रिपोर्ट में अब इस समस्या के पीछे पक्के आंकड़े दिए गए हैं। और इसे ठीक करने के लिए एक नेशनल रोडमैप का सुझाव दिया गया है।
ट्रक बाकी वाहनों से ज्यादा प्रदूषण क्यों फैलाते हैं?
इसकी तीन बड़ी वजहें हैं- ईंधन, उम्र और उपयोग का पैमाना।
भारत के ज्यादातर भारी ट्रक डीजल पर चलते हैं और इनमें से बड़ी संख्या 10 साल से ज्यादा पुरानी है।
पुराने डीजल ट्रक ब्लैक कार्बन और पार्टिकुलेट मैटर का सबसे बड़ा स्रोत हैं। खासकर नेशनल और स्टेट हाईवे के आसपास बसे इलाकों में ये ट्रक ऐसे प्रदूषण हॉटस्पॉट बनाते हैं, जो शहरों के औसत एयर क्वालिटी आंकड़ों में अक्सर दिखते ही नहीं।
क्या ट्रक प्रदूषण को सही तरीके से मापा जा रहा है?
सबसे बड़ी समस्या यही है कि प्रदूषण मापा ही नहीं जा रहा।
SEBI के अनिवार्य BRSR फ्रेमवर्क के तहत रिपोर्टिंग करने वाली 800 कंपनियों में से सिर्फ 7 प्रतिशत कंपनियां ही फ्रेट से जुड़े उत्सर्जन का खुलासा करती हैं।
जो कंपनियां रिपोर्टिंग करती भी हैं, वे अलग-अलग पद्धतियों का इस्तेमाल करती हैं। एक उदाहरण में, एक सीमेंट कंपनी के फ्रेट उत्सर्जन का अनुमान अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय फ्रेमवर्क के तहत 2.65 लाख टन से 30 लाख टन CO₂ तक निकला।
यह अंतर कोई तकनीकी गलती नहीं, बल्कि सिस्टम का नाकामी को दर्शाता है।
इस समस्या का समाधान क्या है?
इस स्थिति को ऐसे समझिए जैसे बाजार में हर दुकानदार अलग तराजू इस्तेमाल कर रहा हो।
नया समाधान है- एक समान माप प्रणाली।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि भारत में फ्रेट उत्सर्जन की गणना के लिए ISO 14083 मानक को अपनाया जाए, जिसे भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढाला गया हो।
जब सभी शिपर्स, ट्रक ऑपरेटर्स और लॉजिस्टिक्स कंपनियां एक ही तरीके से उत्सर्जन मापेंगी, तब
-
कंपनियां अपनी सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली रूट्स पहचान सकेंगी
-
सरकार सही जगह पर सख्त कदम उठा सकेगी
-
और कार्बन क्रेडिट स्कीम के जरिए सुधार को आर्थिक फायदा भी बनाया जा सकेगा
अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो भारत को क्या नुकसान होगा?
यह सिर्फ हवा की सेहत का सवाल नहीं है।
यूरोपियन यूनियन का कार्बन बॉर्डर टैक्स लागू हो चुका है, जिसके तहत अगर भारतीय निर्यातक यह साबित नहीं कर पाए कि उनके उत्पाद और उनकी ढुलाई में कितना कार्बन निकला, तो उन्हें सीधा आर्थिक जुर्माना देना होगा।
देश के अंदर इसका असर अस्पतालों के बढ़ते बिल, काम के नुकसान, और फ्रेट कॉरिडोर के आसपास रहने वाले लोगों की सेहत पर पड़ेगा।
क्या उम्मीद की कोई वजह है?
अच्छी खबर यह है कि समस्या हल हो सकती है।
डेटा मौजूद है, वैश्विक मानक उपलब्ध हैं और अब भारत के पास एक स्थानीय रोडमैप भी है।
अगर सिर्फ 3 प्रतिशत वाहनों पर सही और लक्षित कार्रवाई की जाए, तो प्रदूषण में असमानुपातिक रूप से बड़ा सुधार संभव है। यही वह मौका है, जहां सही नीति भारत को साफ हवा और मजबूत- अर्थव्यवस्था दोनों दिला सकती है।