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कार चोरी होने पर FIR में देरी से बीमा दावा खारिज: अब उपभोक्ता आयोग ने कंपनी को दिया ₹4.68 लाख चुकाने का आदेश

Sat, 17 Oct 2026 07:52 PM IST
Amar Sharma ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amar Sharma Updated Sat, 17 Oct 2026 07:52 PM IST
सार

आयोग का आदेश यह स्पष्ट करता है कि बीमा कंपनियों से अपेक्षा की जाती है कि वे उपभोक्ताओं के दावों पर उचित तरीके से कार्रवाई करें। और वे उपभोक्ताओं की चिंताओं को इस तरह से अनदेखा नहीं कर सकतीं जिससे उन्हें अनावश्यक परेशानी हो।

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Insurance Claim Rejected Over Delayed FIR in Car Theft: Consumer Court Orders Insurer to Pay Rs 4.68 Lakh
Car Insurance Claim - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

दिल्ली की पूर्वी दिल्ली जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने वाहन चोरी के मामले में एक ग्राहक के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि पुलिस FIR दर्ज कराने और बीमा कंपनी को सूचित करने में हुई मामूली देरी के आधार पर पूरे इंश्योरेंस क्लेम को खारिज नहीं किया जा सकता।
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  • मुआवजे की कुल राशि: आयोग के अध्यक्ष सुखवीर सिंह मल्होत्रा और सदस्य रवि कुमार की पीठ ने 25 सितंबर को आदेश पारित करते हुए बीमा कंपनी को 'सेवा में कमी' का दोषी माना।
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  • भुगतान का विवरण:
    • गाड़ी की बीमित राशि: ₹4,31,000
    • मानसिक उत्पीड़न और क्षतिपूर्ति का मुआवजा: ₹25,000
    • मुकदमे का खर्च: ₹12,500
    • कुल मुआवजा: ₹4,68,500 (लगभग 4.68 लाख रुपये)

 

वाहन मालिक की कार चोरी की पूरी घटना क्या थी?

शिकायत के अनुसार, पीड़ित व्यक्ति की कार 26 दिसंबर 2019 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित प्रताप विहार से चोरी हो गई थी।
  • पुलिस प्रक्रिया में देरी: पीड़ित उसी दिन शिकायत दर्ज कराने स्थानीय पुलिस स्टेशन गया था। हालांकि, पुलिस ने इस शिकायत को तीन दिन बाद, यानी 29 दिसंबर 2019 को प्राथमिक रिपोर्ट (FIR) में बदला।
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  • डीलरशिप और कंपनी का रुख: जब पीड़ित बीमा कंपनी के दफ्तर गया, तो वहां के एक्जीक्यूटिव ने लिखित शिकायत लेने से मना कर दिया और कहा कि चोरी के मुख्य दस्तावेज के रूप में केवल FIR ही स्वीकार की जाएगी। बाद में पुलिस गाड़ी का पता लगाने में असमर्थ रही और कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी।

 

इंश्योरेंस कंपनी ने क्लेम रिजेक्ट करने के पीछे क्या दलील दी थी?

बीमा कंपनी ने कंज्यूमर कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि ग्राहक ने पॉलिसी के नियमों और शर्तों का उल्लंघन किया है:
  • कंपनी का तर्क: चोरी 26 दिसंबर को हुई, पुलिस को ऑनलाइन जानकारी 29 दिसंबर को दी गई और कंपनी को 2 जनवरी 2020 को सूचित किया गया।
  • 7 दिनों की देरी: कंपनी का कहना था कि बीमा कंपनी को सूचित करने में 7 दिनों की देरी हुई। इसलिए क्लेम को खारिज करना बिल्कुल जायज था। और इसमें उनकी तरफ से सेवा में कोई कमी नहीं थी।

 

उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में क्या कहा?

उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी के रुख को पूरी तरह से खारिज कर दिया। और कहा कि इतनी छोटी सी देरी के आधार पर क्लेम को पूरी तरह से रद्द करना अनुचित है:
  • आयोग की टिप्पणी: आयोग ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, पुलिस को सूचित करने में 4 दिन की देरी या बीमा कंपनी को 7 दिन बाद बताने मात्र से किसी व्यक्ति का वैध दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
  • प्रक्रियात्मक देरी की हकीकत: पीठ ने माना कि आम तौर पर लोग घटना के तुरंत बाद पुलिस स्टेशन पहुंचते हैं। लेकिन FIR दर्ज होना पुलिस की अपनी प्रक्रिया पर निर्भर करता है। ऐसे में प्रक्रियात्मक देरी की सजा उपभोक्ता को नहीं दी जा सकती।

 

बीमा संबंधी समस्याओं के लिए उपभोक्ता कहां मदद ले सकते हैं?

अगर किसी उपभोक्ता को इंश्योरेंस क्लेम या सेवा में कमी से जुड़ी कोई शिकायत है, तो वे अपने राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के कंज्यूमर कमीशन का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इसके अलावा, सहायता और मार्गदर्शन के लिए नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन के टोल-फ्री नंबर 1915 पर भी संपर्क किया जा सकता है।
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