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Report: EV रेस में पिछड़ सकता है भारत, ऑटो इंडस्ट्री में सही समय पर फैसलों की कमी बन रही सबसे बड़ी रुकावट
Thu, 19 Jun 2025 04:42 PM IST
नीतीश कुमार
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Thu, 19 Jun 2025 04:42 PM IST
सार
भारत की ऑटो इंडस्ट्री अगले दशक में ग्लोबल मार्केट में पिछड़ सकती है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में ऑटोमोबाइल कंपनियों ने अगर अपने काम-काज के तरीकों में बदलाव नहीं किया तो आने वाले 10 साल में कंपनियां वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाएंगी।
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कार प्लांट
- फोटो : एआई
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विस्तार
भारत की ऑटो इंडस्ट्री अगर अपने कामकाज के तौर-तरीकों में बदलाव नहीं करती है, तो वह आने वाले दशक में वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट सकती है। यह चेतावनी दी गई है वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप की एक ताजा रिपोर्ट में, जिसमें ऑटो सेक्टर के अंदरूनी कार्यशैली को लेकर गंभीर खामियां उजागर की गई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) जैसे भविष्य के ट्रेंड्स के लिए तैयार होने के बावजूद भारत की वाहन कंपनियों और उनके सप्लायर्स के बीच समन्वय की भारी कमी है। यही कारण है कि कई कंपनियों की EV परियोजनाएं तकनीक या विजन की कमी से नहीं, बल्कि अंदरूनी 'एक्सीक्यूशन गैप्स' यानी कार्यान्वयन में गड़बड़ियों के कारण 24 महीने तक की देरी झेल रही हैं।
88% ऑटो कंपोनेंट सप्लायर्स में नहीं है पर्याप्त R&D क्षमता
स्टडी में 100 से अधिक ऑटो कंपनियों और टियर-1 सप्लायर्स के वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि देश के 88 प्रतिशत ऑटो पार्ट्स सप्लायर्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) की पर्याप्त क्षमता नहीं रखते हैं।
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वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप के मैनेजिंग पार्टनर रवींद्र पाटकी ने कहा, “बड़ी दिक्कत बाहरी नहीं, बल्कि अंदर है। जैसे खराब समन्वय, क्षमता में असंतुलन और कार्यान्वयन में देरी की स्थिति। नए माहौल में सफल होने के लिए कंपनियों को अपने काम करने का तरीका बदलना होगा।
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रिपोर्ट के अनुसार, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) जैसे भविष्य के ट्रेंड्स के लिए तैयार होने के बावजूद भारत की वाहन कंपनियों और उनके सप्लायर्स के बीच समन्वय की भारी कमी है। यही कारण है कि कई कंपनियों की EV परियोजनाएं तकनीक या विजन की कमी से नहीं, बल्कि अंदरूनी 'एक्सीक्यूशन गैप्स' यानी कार्यान्वयन में गड़बड़ियों के कारण 24 महीने तक की देरी झेल रही हैं।
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88% ऑटो कंपोनेंट सप्लायर्स में नहीं है पर्याप्त R&D क्षमता
स्टडी में 100 से अधिक ऑटो कंपनियों और टियर-1 सप्लायर्स के वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि देश के 88 प्रतिशत ऑटो पार्ट्स सप्लायर्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) की पर्याप्त क्षमता नहीं रखते हैं।
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वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप के मैनेजिंग पार्टनर रवींद्र पाटकी ने कहा, “बड़ी दिक्कत बाहरी नहीं, बल्कि अंदर है। जैसे खराब समन्वय, क्षमता में असंतुलन और कार्यान्वयन में देरी की स्थिति। नए माहौल में सफल होने के लिए कंपनियों को अपने काम करने का तरीका बदलना होगा।
EV स्टार्टअप्स भी नहीं हैं परफेक्ट
- फोटो : Freepik
एक ही टीम से चल रहे EV और ICE प्रोजेक्ट्स
रिपोर्ट में बताया गया है कि कई वाहन निर्माता एक ही टीम और प्रोसेस के जरिए इलेक्ट्रिक और पारंपरिक (ICE) वाहन प्रोजेक्ट्स को एक साथ चला रहे हैं, जिससे इंजीनियरिंग, खरीदारी और टेस्टिंग विभागों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यहां तक कि EV के लिए अलग बनाई गई टीमें भी पुरानी प्रक्रियाओं का पालन कर रही हैं, जो उन्हें धीमा बना रही हैं।
सप्लायर्स पर भी बढ़ रहा प्रेशर
ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनियां भी इस दबाव से जूझ रही हैं। उन्हें कई कंपनियों के लिए एक साथ जटिल प्रोजेक्ट्स पर काम करना पड़ता है, जबकि उन्हें पहले से न तो स्पष्ट टाइमलाइन मिलती है और न ही सही डिजाइन। इससे बार-बार बदलाव होते हैं, लागत बढ़ती है और इंजीनियरिंग टीम थक जाती है।
यह भी पढ़ें: Audi, BMW या Porsche? जानिए कौन है दुनिया की सबसे बड़ी कार कंपनी
पाटकी ने कहा, “अगर OEMs चाहते हैं कि डिलीवरी समय पर हो, तो उन्हें सप्लायर्स को शुरुआत से ही शामिल करना होगा। उन्हें सिर्फ सोर्सिंग प्रोसेस का हिस्सा नहीं, बल्कि डिजाइन और प्रोडक्ट प्रायोरिटी तय करने में भी भागीदार बनाना होगा।”
EV स्टार्टअप्स भी नहीं हैं परफेक्ट
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि EV स्टार्टअप्स भले ही पुराने मॉडल्स का बोझ नहीं झेल रहे, लेकिन वे भी जल्दी-जल्दी लॉन्च का वादा करके बाद में OTA अपडेट्स जैसे डिजिटल फिक्स पर निर्भर हो जाते हैं। यह ट्रस्ट तोड़ सकता है और लॉन्ग टर्म में ज्यादा खर्चीला भी साबित हो सकता है।
यह भी पढ़ें: दाएं या बाएं? हाईवे पर किस साइड से ओवरटेक करनी चाहिए गाड़ी, ज्यादातर ड्राइवर्स करते हैं ये गलती
क्या है समाधान
वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप का सुझाव है कि कंपनियों को केवल लागत घटाने के बजाय एक-दूसरे के साथ असली साझेदारी करनी होगी। डिजाइन के शुरुआती चरण से ही सप्लायर्स को जोड़ना होगा और रिस्क साझा करना होगा। इसके अलावा, रियल-टाइम प्रोग्रेस ट्रैकिंग जैसे डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल करना भी जरूरी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगले दशक में वही कंपनियां सफल होंगी जो सिर्फ प्रोटोटाइप नहीं, बल्कि समय पर लॉन्च करके तेजी से स्केल और सुधार कर सकेंगी। इसलिए पुराने सिस्टम को बार-बार पैच करने के बजाय नए सिस्टम तैयार करने की जरूरत है।”
रिपोर्ट में बताया गया है कि कई वाहन निर्माता एक ही टीम और प्रोसेस के जरिए इलेक्ट्रिक और पारंपरिक (ICE) वाहन प्रोजेक्ट्स को एक साथ चला रहे हैं, जिससे इंजीनियरिंग, खरीदारी और टेस्टिंग विभागों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यहां तक कि EV के लिए अलग बनाई गई टीमें भी पुरानी प्रक्रियाओं का पालन कर रही हैं, जो उन्हें धीमा बना रही हैं।
सप्लायर्स पर भी बढ़ रहा प्रेशर
ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनियां भी इस दबाव से जूझ रही हैं। उन्हें कई कंपनियों के लिए एक साथ जटिल प्रोजेक्ट्स पर काम करना पड़ता है, जबकि उन्हें पहले से न तो स्पष्ट टाइमलाइन मिलती है और न ही सही डिजाइन। इससे बार-बार बदलाव होते हैं, लागत बढ़ती है और इंजीनियरिंग टीम थक जाती है।
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पाटकी ने कहा, “अगर OEMs चाहते हैं कि डिलीवरी समय पर हो, तो उन्हें सप्लायर्स को शुरुआत से ही शामिल करना होगा। उन्हें सिर्फ सोर्सिंग प्रोसेस का हिस्सा नहीं, बल्कि डिजाइन और प्रोडक्ट प्रायोरिटी तय करने में भी भागीदार बनाना होगा।”
EV स्टार्टअप्स भी नहीं हैं परफेक्ट
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि EV स्टार्टअप्स भले ही पुराने मॉडल्स का बोझ नहीं झेल रहे, लेकिन वे भी जल्दी-जल्दी लॉन्च का वादा करके बाद में OTA अपडेट्स जैसे डिजिटल फिक्स पर निर्भर हो जाते हैं। यह ट्रस्ट तोड़ सकता है और लॉन्ग टर्म में ज्यादा खर्चीला भी साबित हो सकता है।
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क्या है समाधान
वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप का सुझाव है कि कंपनियों को केवल लागत घटाने के बजाय एक-दूसरे के साथ असली साझेदारी करनी होगी। डिजाइन के शुरुआती चरण से ही सप्लायर्स को जोड़ना होगा और रिस्क साझा करना होगा। इसके अलावा, रियल-टाइम प्रोग्रेस ट्रैकिंग जैसे डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल करना भी जरूरी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगले दशक में वही कंपनियां सफल होंगी जो सिर्फ प्रोटोटाइप नहीं, बल्कि समय पर लॉन्च करके तेजी से स्केल और सुधार कर सकेंगी। इसलिए पुराने सिस्टम को बार-बार पैच करने के बजाय नए सिस्टम तैयार करने की जरूरत है।”