Ola: ओला स्कूटर केस में भाविश अग्रवाल की बढ़ीं मुश्किलें, गोवा उपभोक्ता आयोग ने जारी किया गिरफ्तारी वारंट
साउथ गोवा कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन ने ओला इलेक्ट्रिक के फाउंडर और सीईओ भाविश अग्रवाल के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया है। क्योंकि पहले से नोटिस दिए जाने के बावजूद वे कमीशन के सामने पेश नहीं हुए।
विस्तार
दक्षिण गोवा उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने Ola Electric Technologies Pvt Ltd (ओला इलेक्ट्रिक टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड) के संस्थापक और सीईओ भाविश अग्रवाल के खिलाफ जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। कारण यह बताया गया कि पूर्व सूचना के बावजूद वे आयोग के सामने पेश नहीं हुए।
वारंट में क्या निर्देश दिए गए हैं?
आयोग ने बंगलूरू पुलिस को निर्देश दिया है कि वे भाविश अग्रवाल को 23 फरवरी को सुबह 10:30 बजे मार्गाओ स्थित आयोग के सामने पेश करें। आदेश के अनुसार, उन्हें 1.47 लाख रुपये की जमानत पर रिहा किया जा सकता है। यह जानकारी आयोग के अध्यक्ष संजय चोडणकर द्वारा जारी आदेश में दी गई है।
पहले उन्हें किस मामले में तलब किया गया था?
आयोग ने भाविश अग्रवाल को 4 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का नोटिस जारी किया था। उनसे शिकायतकर्ता की बाइक की मौजूदा स्थिति, लंबे समय से मरम्मत व डिलीवरी न होने के कारण, और पूरे मामले पर स्पष्टीकरण मांगा गया था। इसके बावजूद वे पेश नहीं हुए।
शिकायतकर्ता ने क्या आरोप लगाए हैं?
आयोग 26 वर्षीय युवक की शिकायत पर सुनवाई कर रहा है। शिकायतकर्ता के मुताबिक, उसने 16 अगस्त 2023 को Ola S1 Pro सेकेंड जेनरेशन स्कूटर 1.47 लाख रुपये में खरीदा। डिलीवरी के तुरंत बाद ही स्कूटर के मोटर से अनचाही आवाज आने लगी और टचस्क्रीन काम नहीं कर रही थी। जिसे हर एक घंटे में रीबूट करना पड़ता था।
शिकायतकर्ता ने बताया कि उसने इन निर्माण दोषों की जानकारी कंपनी को दी, लेकिन कोई संतोषजनक प्रतिक्रिया नहीं मिली। मोर्मुगांव स्थित स्टोर पर कई बार शिकायत करने के बाद वह स्कूटर को कंपनी के शोरूम ले गया। वहां स्कूटर की मरम्मत कर उसे लौटाया गया और मरम्मत लागत 18,627 रुपये बताई गई।
मरम्मत के बाद भी समस्या क्यों बनी रही?
शिकायत के अनुसार, मरम्मत के बाद भी पहले की समस्याएं जारी रहीं, साथ ही ब्लूटूथ कनेक्टिविटी से जुड़ी नई दिक्कत भी सामने आई। फिलहाल स्कूटर कंपनी की कस्टडी में है।
शिकायतकर्ता ने आयोग से पूरी 1.47 लाख रुपये की रिफंड राशि की मांग की है। इसके अलावा, 50,000 रुपये मुआवजा भी मांगा गया है। जिसमें पैसे की वैल्यू घटने, परेशानियों, मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न का हवाला दिया गया है।
आगे क्या हो सकता है?
अब आयोग के आदेश के मुताबिक, अगर निर्धारित तारीख पर पेशी नहीं होती, तो मामले में कानूनी कार्रवाई और कड़ी हो सकती है। यह प्रकरण उपभोक्ता अधिकारों और कंपनियों की जवाबदेही पर एक अहम मिसाल बन सकता है।