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Nissan: कारों और लोगों से भरी सड़कों पर निसान ने बिना ड्राइवर वाली गाड़ियों का किया परीक्षण, जानें डिटेल्स

Tue, 11 Mar 2025 01:42 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Tue, 11 Mar 2025 01:42 PM IST
सार

Nissan (निसान) ने बिना ड्राइवर वाली तकनीक विकसित की है, जो 14 कैमरे, 9 रडार और 6 LiDAR सेंसर का इस्तेमाल करती है। जापान इस टेक्नोलॉजी में अमेरिका और चीन से पीछे रह गया है, लेकिन अब वह तेजी से इस दौड़ में शामिल होने की कोशिश कर रहा है। 

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Driverless Technology from Nissan Motor Corp tests Self Driving Cars
Nissan Driverless Assistance Technology - फोटो : NIssan

विस्तार

शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर एक वैन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। अगर कोई कार अचानक सामने आ जाती है, तो यह खुद-ब-खुद ब्रेक लगा लेती है। लेकिन खास बात यह है कि इसका स्टेयरिंग खुद घूम रहा है और ड्राइवर की सीट खाली है! Nissan (निसान) ने बिना ड्राइवर वाली तकनीक विकसित की है, जो 14 कैमरे, 9 रडार और 6 LiDAR सेंसर का इस्तेमाल करती है। जापान इस टेक्नोलॉजी में अमेरिका और चीन से पीछे रह गया है, लेकिन अब वह तेजी से इस दौड़ में शामिल होने की कोशिश कर रहा है। 
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जापान की धीमी शुरुआत, लेकिन अब पकड़ बना रहा है
जापान, जो दुनिया की टॉप ऑटोमोबाइल कंपनियों का घर है, अब तक चीन और अमेरिका की तुलना में सेल्फ-ड्राइविंग कारों की रेस में पीछे रहा है। लेकिन अब इसमें तेजी आ रही है।

गूगल की सेल्फ-ड्राइविंग कंपनी Waymo (वेमो) जल्द ही जापान में आने वाली है। हालांकि, शुरुआत में यह कारों में एक इंसान को बैठाकर ही काम करेगी। 

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कैसे काम करती है निसान की सेल्फ-ड्राइविंग कार?
निसान ने अपने Serena (सेरेना) मिनीवैन पर इस तकनीक का टेस्ट किया है। टेस्टिंग के दौरान यह कार 40 किमी प्रति घंटा की टॉप स्पीड पर चल रही थी। इस कार को स्मार्टफोन एप से कंट्रोल किया जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, निसान के मोबिलिटी और AI (आर्टिफिशियल लैबोरेट्री) लैब के इंजीनियर ताकेशी किमुरा का कहना है कि कार निर्माता कंपनियां ऑटोमोबाइल सिस्टम को अच्छे से समझती हैं, इसलिए वे सेल्फ-ड्राइविंग तकनीक को बेहतर तरीके से विकसित कर सकती हैं।
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फिलहाल इंसानों की निगरानी जरूरी
निसान की यह कार अभी लेवल 2 ऑटोनॉमस व्हीकल मानी जाती है, क्योंकि दूर बैठे एक इंसान रिमोट-कंट्रोल पैनल से इसे मॉनिटर कर सकता है। टेस्टिंग के दौरान, फ्रंट सीट पर एक इंसान भी बैठा होता है, जो जरूरत पड़ने पर कंट्रोल अपने हाथ में ले सकता है।

2029 तक पूरी तरह से ऑटोनॉमस कार बनाने का प्लान
निसान अगले कुछ वर्षों में 20 ऐसी गाड़ियां योकोहामा की सड़कों पर उतारने की योजना बना रहा है। 2029 या 2030 तक इसे लेवल 4 तक लाने का लक्ष्य है, जहां बिल्कुल भी इंसानी दखल की जरूरत नहीं होगी।

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बूढ़ी होती आबादी के लिए वरदान बन सकती है यह टेक्नोलॉजी
जापान में बढ़ती उम्र और ड्राइवरों की कमी को देखते हुए सेल्फ-ड्राइविंग गाड़ियां बहुत मददगार साबित हो सकती हैं। कई जापानी स्टार्टअप्स भी इस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं, जैसे Tier IV, जो ओपन-सोर्स ऑटोनॉमस ड्राइविंग टेक्नोलॉजी को प्रमोट कर रही है।

कई शहरों में हो रही है टेस्टिंग, लेकिन अभी सफर लंबा है
अब तक जापान ने लेवल 4 गाड़ियों को सिर्फ ग्रामीण इलाकों में चलाने की मंजूरी दी है।
  • Fukui प्रीफेक्चर में छोटी ऑटोनॉमस गाड़ियां, जो गोल्फ कार्ट जैसी दिखती हैं, चलाई जा रही हैं।
  • Haneda एयरपोर्ट (टोक्यो) के पास एक लेवल 4 बस भी टेस्टिंग में है, लेकिन इसकी टॉप स्पीड सिर्फ 12 किमी प्रति घंटा (7.5 मील प्रति घंटा) है।
  • Nissan की सेल्फ-ड्राइविंग कार पूरी तरह से एक असली कार की तरह काम करती है और तेज स्पीड पर भी चल सकती है।
  • Toyota भी इस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है। उसने माउंट फूजी के पास एक खास 'स्मार्ट सिटी' बनाई है, जहां सेल्फ-ड्राइविंग गाड़ियों की टेस्टिंग हो रही है।

सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल
हालांकि, सेल्फ-ड्राइविंग गाड़ियों की सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा है। टोकयो के प्रोफेसर ताकेओ इगारासी का मानना है कि लोग बिना ड्राइवर वाली गाड़ियों की दुर्घटनाओं को ज्यादा खतरनाक मानते हैं।

उनका कहना है, "अगर कोई इंसान कार चला रहा है और एक्सीडेंट हो जाता है, तो जिम्मेदारी उसी की होगी। लेकिन अगर कोई ड्राइवर ही नहीं है, तो जिम्मेदारी किसकी होगी?"

निसान का दावा है कि इसकी तकनीक मानव आंखों से बेहतर काम करती है, क्योंकि:
  • एक इंसान एक समय में सिर्फ आगे या पीछे देख सकता है, लेकिन
  • निसान की कार चारों तरफ देख सकती है, सेंसर की मदद से हर स्थिति को मॉनिटर कर सकती है।
  • हाल ही में हुई एक टेस्टिंग के दौरान जब सिस्टम में तकनीकी खराबी आई, तो कार अपने आप रुक गई और किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ।

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अभी लंबा सफर तय करना बाकी है
कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फिल कूपमैन का कहना है कि ऑटोनॉमस गाड़ियों का सफर अभी शुरू ही हुआ है।

सबसे बड़ी चुनौती "एज केस" (ऐसी दुर्लभ और खतरनाक स्थितियां जिनका डेटा बहुत कम है) को हल करना है। उन्होंने कहा कि, "हर शहर की सड़कों और ट्रैफिक की स्थिति अलग होती है। इसलिए, हर शहर के लिए खास सिस्टम बनाना पड़ेगा और हर जगह खास रिमोट सपोर्ट सेंटर बनाने होंगे।"

इसका मतलब यह है कि हर शहर में सेल्फ-ड्राइविंग गाड़ियां एक झटके में नहीं आ सकतीं, बल्कि धीरे-धीरे और सावधानी से इन्हें लाया जाएगा।
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