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EV: क्या CAFE-III के तहत ईवी का 'जारो-एमिशन' दर्जा हो सकता है खत्म? उत्सर्जन नीति में अहम मोड़

Tue, 24 Feb 2026 09:40 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Tue, 24 Feb 2026 09:40 PM IST
सार

भारत प्रस्तावित फ्यूल-एफिशिएंसी नियमों के तहत इलेक्ट्रिक कारों से उनका जीरो-एमिशन स्टेटस हटा सकता है। यह एक ऐसा कदम है जो वाहन निर्माताओं को इन इको-फ्रेंडली गाड़ियों को ज्यादा एनर्जी-एफिशिएंट बनाने के लिए मजबूर कर सकता है। 

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CAFE III Could Redefine EV Emissions in India: What It Means for Carmakers
Electric Car Charging - फोटो : Freepik

विस्तार

भारत में प्रस्तावित CAFE-III (कैफे-3) (कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी) नियमों के तहत इलेक्ट्रिक कारों (ईवी) से जीरो-एमिशन स्टेटस हटाया जा सकता है। इस बदलाव का मकसद वाहन निर्माताओं को ईवी को और अधिक ऊर्जा-कुशल बनाने के लिए प्रेरित करना बताया जा रहा है।
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प्रस्ताव में ईवी की गणना कैसे बदलेगी?
प्रस्ताव के अनुसार, ईवी की ऊर्जा खपत को अनुपालन गणनाओं में शामिल किया जाएगा। इसके लिए ईवी की खपत (kWh/100 किमी) को पेट्रोल समकक्ष (लीटर/100 किमी) में बदला जाएगा।
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यानी, टेलपाइप से उत्सर्जन शून्य होने के बावजूद, ईवी द्वारा उपयोग की गई बिजली की ऊर्जा को गणना में जोड़ा जाएगा।

सरकार का तर्क क्या है?
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि, यह कदम ईवी को लंबी दूरी कम ऊर्जा में तय करने के लिए प्रेरित करेगा। ताकि निर्माताओं पर पेनल्टी का जोखिम न आए। तर्क यह है कि ईवी भले ही टेलपाइप से CO₂ न छोड़ें, लेकिन वे ऊर्जा की खपत करती हैं, और ऊर्जा संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।

भारत की बिजली संरचना इस बहस में क्यों अहम है?
वर्तमान वित्त वर्ष में जनवरी आखिर तक भारत ने कोयला आधारित बिजली से 1056.43 बिलियन यूनिट (BU) उत्पादन किया। जबकि सौर से 137.51 BU और पवन से 94.81 BU बिजली बनी।
इस पृष्ठभूमि में, ईवी की ऊर्जा खपत को शून्य मानना वास्तविक ऊर्जा पदचिह्न को अनदेखा करने जैसा माना जा रहा है।
 

ऑटो उद्योग की मांग क्या थी और यह प्रस्ताव उससे कैसे अलग है?
कर्मकारों (कंपनियों) की मांग थी कि CAFE में ईवी को जीरो-एमिशन माना जाए। ऐसा होने पर वे सीमित बिक्री के बावजूद कई ईवी मॉडल उतारकर सुपर-क्रेडिट्स जुटा सकते हैं और अपने ICE (इंटरनल कंब्शन इंजन) पोर्टफोलियो के अधिक उत्सर्जन को ऑफसेट कर सकते हैं।
प्रस्तावित बदलाव इस "लूपहोल" को बंद करने की दिशा में है।

वैश्विक मानक और कानूनी आधार क्या कहते हैं?
मामले से जुड़े एक जानकार के अनुसार, दुनिया भर में देश या तो CO₂ उत्सर्जन या ऊर्जा खपत को नियंत्रित करते हैं, और ऊर्जा कभी शून्य नहीं होती। भारत में CAFE नियम ऊर्जा संरक्षण कानून के अंतर्गत आते हैं, इसलिए वैज्ञानिक और कानूनी दोनों दृष्टि से ईवी को जीरो-एमिशन मानना तर्कसंगत नहीं माना जा रहा।
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CAFE-III में क्रेडिट्स और पेनल्टी का ढांचा क्या होगा?
प्रस्तावित दिशानिर्देशों के मुताबिक:
  • ईवी और रेंज-एक्सटेंडर हाइब्रिड ईवी को 3 सुपर-क्रेडिट्स
  • ICE कारों को 1 क्रेडिट
मिलेंगे।
यह ढांचा ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) की सिफारिशों में बना हुआ है, जिन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को भेजा गया है।
CAFE-III के तहत अधिक उत्सर्जन वाले वाहनों पर पेनल्टी लग सकती है, जिसे ईवी/हाइब्रिड बिक्री से मिले क्रेडिट्स या अन्य निर्माताओं से खरीदे गए क्रेडिट्स से ऑफसेट किया जा सकेगा।

 

सरकार को ICE दक्षता को लेकर चिंता क्यों है?
उद्योग प्रतिनिधियों के मुताबिक, सरकार को आशंका है कि यदि ईवी को CAFE-III में जीरो-एमिशन मान लिया गया, तो निर्माता ICE वाहनों की ईंधन दक्षता सुधारने में निवेश कम कर सकते हैं। जबकि आने वाले वर्षों में ICE का बाजार हिस्सा बड़ा बना रहेगा।

EV अपनाने की गति और सख्त नियम क्यों जरूरी हैं?
2025 में ईवी की हिस्सेदारी कुल घरेलू पैसेंजर वाहन बिक्री में 4 प्रतिशत थी, जो 2030 तक 13-15 प्रतिशत होने की उम्मीद है। तब भी कुल बिक्री (करीब 60 लाख यूनिट्स) का 85-87 प्रतिशत हिस्सा ICE रहेगा। इसलिए कड़े अनुपालन नियम बनाकर ईंधन दक्षता और उत्सर्जन पर नियंत्रण जरूरी माना जा रहा है। 

ऊर्जा रूपांतरण का फॉर्मूला क्या होगा?
सरकार के नवीन प्रस्ताव में 1 लीटर पेट्रोल की ऊष्मीय ऊर्जा (~35 मेगाजूल) को किलोवॉट-घंटे से जोड़ा गया है, जहां 1 kWh = 3.6 मेगाजूल। इस रूपांतरण से नियामक ईवी फ्लीट द्वारा उपयोग की गई ऊर्जा को अन्य वाहनों के साथ जोड़कर निर्माता का कुल ऊर्जा पदचिह्न निकाल सकेगा।

क्या है नतीजा?
अगर यह प्रस्ताव अंतिम रूप लेता है, तो ईवी का जीरो-एमिशन टैग हट सकता है और फोकस ऊर्जा दक्षता पर शिफ्ट होगा। इससे ईवी तकनीक और बेहतर बनेगी, ICE सुधार को प्रोत्साहन मिलेगा और CAFE-III में वास्तविक ऊर्जा खपत के आधार पर निष्पक्ष अनुपालन संभव होगा।

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