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Rahu Ketu Transit 2020: राहु-केतु के कारण कुंडली में बनता है ये दोष, जानें लक्षण और निवारण के उपाय

Wed, 23 Sep 2020 12:13 PM IST
रुस्तम राणा ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला Published by: रुस्तम राणा Updated Wed, 23 Sep 2020 12:13 PM IST
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Rahu Ketu Transit 2020 rahu ketu form this dosha in kundali know effects and remedies
राहु-केतु का राशि परिवर्तन 2020 - फोटो : सोशल मीडिया

Rahu Ketu transit September 2020: राहु और केतु दोनों छाया ग्रह आज अपनी-अपनी राशि बदल रहे हैं। जहां राहु मिथुन राशि से वृष राशि में प्रवेश कर रहे हैं तो वहीं केतु धनु राशि से वृश्चिक राशि में आ रहे हैं। ये दोनों ही ग्रह साथ-साथ अपनी राशि परिवर्तन करते हैं और दोनों की चाल भी उल्टी दिशा में होती है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक राहु केतु कुंडली में एक ऐसा दोष बनाते हैं जिसकी वजह से जातकों को अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

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काल सर्प दोष - फोटो : सोशल मीडिया

राहु-केतु के कारण कुंडली में बनता है काल सर्प दोष
जब कुंडली में राहु और केतु के मध्य में सारे ग्रह आ जाते हैं तब कुंडली में कालसर्प योग बनता है। कालसर्प योग दो शब्दों को मिलाकर बना है। इसमें पहला शब्द है काल, यानि मृत्यु और दूसरा शब्द है - सर्प, जिसका तात्पर्य सांप से है। कुंडली में कालसर्प योग के प्रभाव से व्यक्ति को मानसिक कष्ट सहना पड़ता है। इसके साथ ही कई तरह की परेशानियां जातकों को सहना पड़ता है।  

इस समय होता है काल सर्प दोष का प्रभाव
काल सर्प दोष का प्रभाव राहु की महादशा, अंतर्दशा या प्रत्यंतर्दशा में होता है। इसके साथ ही जब भी गोचर काल में राहु या केतु अशुभ होते हैं काल सर्प दोष के अशुभ प्रभाव जातकों के जीवन पर पड़ता है। 

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राहु-केतु के कारण बनता है काल सर्प दोष - फोटो : सोशल मीडिया

ऐसे मिलते हैं कालसर्प योग के संकेत
काल सर्प दोष के प्रभाव से जातकों को मानसिक एवं शारीरिक कष्ट होता है। पैतृक संपत्ति का नष्ट होना भी काल सर्प दोष की निशानी है। इसके अलावा भाई-बंधुओं से धोखा, संतान से कष्ट, शत्रुओं से निरंतर भय, बुरे स्वप्न एवं अनिद्रा रोग, कोर्ट कचहरी का सामना आदि परेशानियां इसी दोष के कारण निर्मित होती हैं।

क्या हैं ज्योतिषीय उपाय
कालसर्प दोष दूर करने के लिए जातकों को मंदिरों में सोना, चांदी, तांबा, पीतल के नाग-नागिनों के जोड़े बनाकर चढ़ाने चाहिए। मंदिर में भगवान शंकर जी का विशेष अभिषेक करना चाहिए। रूद्राभिषेक कर नौ प्रकार के नागों की प्रतिमा बना उनको नदी में प्रवाहित करना चाहिए। नागों को प्रवाहित करने के बाद स्नान करें। पहने हुए वस्त्रों का त्याग करें। नवीन वस्त्र धारण करने का विधान है। नाग स्त्रोत का पाठ करें। 

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