कुंडली का पांचवा भाव: संतान सुख, विद्या और बुद्धि का घर, जानिए सबकुछ
कुंडली का पांचवा भाव संतान और शिक्षा से संबंधित होता है। पंचम भाव से उच्च शिक्षा, फैलोशिप, पोस्ट ग्रेजुएशन, लेखन, रिसर्च, मानसिक खोज और कौशल को दर्शाता है।
विस्तार
ज्योतिष शास्त्र में कुंडली का पंचम भाव बहुत ही महत्वपूर्ण भाव माना गया है। कुंडली का पंचम भाव त्रिकोण स्थान है। इस भाव से संतान सुख, विद्या, बुद्धि, ज्ञान, प्रेम, रोमांस और खुशियों का विचार किया जाता है। कुंडली के इस पंचम भाव के कारक ग्रह देवगुरु बृहस्पति होते हैं, ऐसे में इस भाव से विद्या और संतान का सुख देखा जाता है। इससे अलावा इस भाव से अचानक मिले हुए धन के बारे में भी विचार किया जाता है। ज्योतिष में पंचम, दशम, नवम और तृतीय भाव सबसे अच्छा माना गया है। कुंडली में पंचम भाव और पंचमेश की स्थिति अच्छी होने से जातक को विद्या प्राप्त करने में किसी तरह की रुकावटें नही आती है। कुंडली के पंचम भाव से विद्या और इससे प्राप्त होने वाले यश का विचार किया जाता है, इसलिए यह भाव विद्या और यश का भाव होता है।
गुरु पाराशर ने इस भाव को सीखने के तौर पर देखा गया है। संचित कर्म, प्रसिद्धि और पद का बोध भी पंचम भाव बतलाता है। पंचम भाव से पहले संतान का सुख, खुशियां, मनोरंजन, प्यार, रोमांस आदि को दर्शाता है। इस भाव से पूर्व जन्म में किए जाने वाले पुण्य कर्मों का पता चलता है। कालपुरुष की कुंडली में पंचम भाव के स्वामी सूर्य देव होते हैं और सिंह राशि का स्वामित्व प्राप्त है। पंचम भाव से उच्च शिक्षा, फैलोशिप, पोस्ट ग्रेजुएशन, लेखन, रिसर्च, मानसिक खोज और कौशल को दर्शाता है। वहीं ऋषि पाराशर के अनुसार कुंडली का पंचम भाव, दशम भाव से अष्टम पर स्थित होता है इसलिए पंचम भाव उच्च पद और प्रतिष्ठा में गिरावट को दर्शाता है। चतुर्थ भाव से शुरुआती शिक्षा का किया जाता है, इसमें जातक की प्राथमिक शिक्षा, निवास और भवन को दर्शाता है। वहीं पंचम भाव गणित, विज्ञान, कला आदि से संबंधित होता है। इस भाव में जातक अपने क्षेत्र और विषय में विशेषज्ञता को हासिल करता है।
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कुंडली का यह पंचम भाव सबसे महत्वपूर्ण भाव होता है। इससे जातक का भूत यानी पिछले कर्म और भविष्य का निर्धारण होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जो जातक अपने इस जन्म में अच्छे कर्म को करता है तो उसका फल अगले जन्म में मिलता है, यानी यह भाव संचित कर्म का भाव कहलाता है। कुंडली का पंचम भाव गुरु और पिता से किस तरह का ज्ञान प्राप्त करेंगे यह बताता है। वैदिक ज्योतिष में कुंडली के पंचम भाव से नौकरी के शुरुआत और अंत को दर्शाता है। यानी इस भाव से नौकरी के मिलने और नौकरी के खोने का भी विचार किया जाता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में कुंडली का पांचवा घर रोमांस और संतान सुख का भाव होता है।
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जन्म कुंडली का पंचम भाव संतान सुख और शिक्षा का माना जाता है। इस भाव में शुभ या अशुभ ग्रह के विराजमान होने पर जातक के शिक्षा और संतान के पहलुओं के बारे में विचार किया जाता है। अगर इस भाव में शुभ ग्रह बैठते हैं या फिर शुभ ग्रहों की द्दष्टि पड़ती है तो जातक बहुत ही उच्च शिक्षा को प्राप्त करता है। वैदिक ज्योतिष में गुरु को शुभ ग्रह माना जाता है अगर यह कुंडली के पंचम भाव में बैठते हैं तो जातक शिक्षा के हर क्षेत्र में सफलता को प्राप्त करता है। दरअसल देवगुरु को उच्च शिक्षा का कारक ग्रह माना जाता है। ऐसे में अगर कुंडली के इस पंचम भाव में कोई भी शुभ ग्रह बैठता है या फि शुभ ग्रहों की द्दष्टि पड़ती है तो व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में नया मुकाम और कीर्तिमान स्थापित करता है। ऐसे लोग बहुत ही होशियार और अच्छा करियर होता है। वहीं दूसरी तरफ अगर कुंडली के इस भाव में कोई अशुभ ग्रह हो या फिर पाप ग्रहों की द्दष्टि हो तो जातक की शिक्षा में परेशानियां आती हैं।
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