ग्रामीण प्रौद्योगिकी कार्य समूह (रूटा जी -2.0) ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप संस्थानों के माध्यम से तकनीक विकसित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। आईआईटी रुड़की में बृहस्पतिवार को की तीसरी वार्षिक समीक्षा बैठक के दौरान भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद ने बताया कि 70 से अधिक तकनीक विकसित की जा चुकी हैं। उन्होंने उत्तराखंड में अखरोट को निकालने के लिए मशीन निर्मित्त किए जाने और धार्मिक स्थलों पर कम समय में बड़ी मात्रा में तुलसी माला तैयार करने की तकनीकों पर प्रकाश डाला। बैठक में वैज्ञानिक सचिव डॉ. परविंदर मैनई, आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत, डीन (एसआरआईसी) प्रो. विवेक मलिक और रूटा जी के आईआईटी रुड़की के प्रधान अन्वेषक प्रो. एसके सिंगल मौजूद रहे। उद्घाटन सत्र में प्रो. अजय कुमार सूद ने कहा कि ग्रामीण प्रौद्योगिकियां केवल वैज्ञानिक नवाचार तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन्हें व्यावहारिक, किफायती और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को ग्रामीण समुदायों, किसानों और कारीगरों तक पहुंचाने के लिए जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन, सामुदायिक सहभागिता और स्थानीय उद्यम मॉडल को मजबूत करना होगा। डॉ. परविंदर मैनई ने अनुसंधान, तकनीकी विकास और जमीनी क्रियान्वयन के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई। उन्होंने ग्रामीण कारीगरों और किसानों से लगातार फीडबैक लेने, तकनीक हस्तांतरण की मानकीकृत व्यवस्था विकसित करने और केंद्रों तथा साझेदार संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा कि तकनीकी नवाचार किसानों, कारीगरों और ग्रामीण समुदायों की वास्तविक जरूरतों पर आधारित होना चाहिए। बैठक में आईआईटी मद्रास, आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी रुड़की, आईआईटी गुवाहाटी, आईसीएआर-एनएएआरएम हैदराबाद और एसकेयूएएसटी कश्मीर स्थित रूटा जी के केंद्रों के प्रतिनिधि शामिल हुए। पहले दिन परियोजनाओं की प्रगति, तकनीक हस्तांतरण, प्रसार और स्थानीय स्तर पर तकनीकों को टिकाऊ रूप से अपनाने पर चर्चा हुई। बैठक शुक्रवार को भी जारी रहेगी।