सरयू नदी के बढ़ते जलस्तर और तेज कटान ने बाराबंकी के सूरतगंज ब्लॉक के केदारीपुर गांव में तबाही मचा रखी है। नदी की विनाशकारी धारा से बचने के लिए ग्रामीण अपने पक्के आशियानों और झोपड़ियों को तोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। अब तक तीन सौ बीघे उपजाऊ जमीन नदी में समा चुकी है, जिससे किसानों की रोजी-रोटी पर गहरा संकट मंडराने लगा है। कटान का कहर और ग्रामीणों की बेबसी केदारीपुर गांव में नदी का कटान जारी है। नदी का रुख गांव की ओर देखकर ग्रामीण दहशत में हैं। लालता प्रसाद और राजकुमार के घरों की जमीन पहले ही नदी में विलीन हो चुकी है, जबकि इंदर, अमृतलाल, छोटेलाल, अनंत, नान, मोन सहित कई अन्य ग्रामीणों के घरों को भी नदी का खतरा सता रहा है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए लोग अपने घरों को तोड़कर ईंटों और अन्य सामग्री को सुरक्षित करने में जुटे हैं, ताकि भविष्य में उनका कुछ सहारा बन सके। बाढ़ खंड के प्रयासों पर सवाल, ग्रामीणों की मांगें अनसुनी कटान को रोकने के लिए बाढ़ खंड विभाग ने परक्यून पाइप लगाने का कार्य शुरू किया है। हालांकि, ग्रामीण इस उपाय को अप्रभावी मानते हुए जीओ बैग लगाने की मांग कर रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर ग्रामीणों और बाढ़ खंड के कर्मचारियों के बीच वाद-विवाद भी हो चुका है। ग्रामीणों का आरोप है कि बाढ़ खंड विभाग कागजों में अधिक काम दिखाकर बजट का दुरुपयोग कर रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। बारिश के बीच भी लोग अपना आशियाना बचाने के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं। खड़ी फसलें नदी में विलीन, किसानों में गहरा आक्रोश किसानों के लिए यह दोहरा आघात है। एक ओर जहां उनके घर नदी की चपेट में आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी खड़ी फसलें भी नदी में विलीन हो रही हैं। गुड्डू, बड़कऊ, हैदर, खलील, अमीन, किस्मत अली, राजेश, मैकू, भुलन, लालता प्रसाद, राम लखन आदि किसानों का कहना है कि नदी ने लगभग तीन सौ बीघे खेतों को अपने आगोश में ले लिया है, जिनमें धान, परवल और उड़द जैसी फसलें खड़ी थीं। फसल कटने का दर्द उनके चेहरों पर साफ झलक रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि सरयू नदी के उग्र रूप ने केदारीपुर गांव को बेघर और बर्बाद कर दिया है। ग्रामीणों की सुरक्षा और उनके पुनर्वास के लिए तत्काल सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। बाढ़ खंड द्वारा किए जा रहे कार्यों की गुणवत्ता और प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें दूर करने की जरूरत है। किसानों को हुए फसल नुकसान का मुआवजा और भविष्य में ऐसी तबाही से बचाव के लिए ठोस उपाय किए जाने चाहिए।