पढ़ाई-लिखाई या जरूरी बौद्धिक कार्य झट से एआई से करा लिया। गुणा-भाग करना हो तो मोबाइल से कर लिया। तकनीक पर बढ़ती निर्भरता से दिमागी कसरत कम हो गई है। इसका सीधा असर याददाश्त पर पड़ रहा है। बच्चों-युवाओं को भी छोटी-छोटी बातें याद नहीं रह रही हैं। ऐसे में बुढ़ापे से पहले अल्जाइमर का खतरा बढ़ गया है। मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के निदेशक प्रो. दिनेश राठौर ने बताया कि पहले पढ़ाई-लिखाई या किसी तरह के प्रोजेक्ट पर दिमागी मंथन करते थे। कई बार प्रयास के बाद कोई हल नहीं निकलता था तो शिक्षक या जानकार की मदद लेते थे। अब कोई किसी तरह की उलझन होने पर उसे हल करने के लिए ज्यादा माथापच्ची नहीं करता है। तकनीक का सहारा दिमाग को कमजोर कर रहा है। इसका असर याददाश्त और बौद्धिक स्तर पर पड़ रहा है। उम्र बढ़ने पर दिमाग में मौजूद रसायनों के असंतुलन से नसें सिकुड़ने लगती हैं। इससे अल्जाइमर जैसी बीमारी पनप रही है।