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सीहोर: 109 साल पुराने कर्ज पर ब्रिटेन का पल्ला झाड़ने वाला जवाब! सीहोर के समाजसेवी ने उठाए सवाल

Sun, 18 Oct 2026 08:19 PM IST
सीहोर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को कथित तौर पर दिए गए 35 हजार रुपये के कर्ज का मामला 109 साल बाद फिर चर्चा में है। सीहोर के समाजसेवी विनय रुठिया के परिवार का दावा है कि उनके पूर्वज सेठ जुम्मा लाल रुठिया ने वर्ष 1917 में ब्रिटिश सरकार को यह राशि कर्ज के रूप में दी थी। अब इस मामले में कानूनी नोटिस के जवाब में ब्रिटेन के यूके डेट मैनेजमेंट ऑफिस ने कहा है कि जांच के दौरान ऐसा कोई रिकॉर्ड या प्रमाण नहीं मिला, जिससे संबंधित कर्ज के भुगतान की जिम्मेदारी ब्रिटिश सरकार पर स्थापित हो सके। विभाग के इस जवाब ने पुराने दावे पर नया विवाद खड़ा कर दिया है। वहीं, रुठिया परिवार ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर मामले में स्पष्ट जवाब मांगा है।

विनय रुठिया, विनय रुठिया के अनुसार, उनके परिवार ने कथित कर्ज की राशि और उससे जुड़े दस्तावेजों के आधार पर ब्रिटिश सरकार के समक्ष अपना पक्ष रखा था। कानूनी नोटिस भेजे जाने के बाद संबंधित विभाग ने कर्ज से जुड़े दस्तावेज और अन्य जरूरी जानकारी मांगी। इसके बाद रुठिया ने अपने वकील के माध्यम से प्रमाणित दस्तावेज ईमेल से भेजे। हालांकि, विभाग के हालिया जवाब में कहा गया कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ब्रिटिश सरकार की वित्तीय जिम्मेदारी स्थापित नहीं हो सकी।

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दस्तावेज देने के बाद भी रिकॉर्ड नहीं मिलने पर रुठिया ने उठाए सवाल
रुठिया ने विभाग के जवाब पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब मामले में दस्तावेज मांगे गए और उनकी ओर से उपलब्ध कराए गए, तो जांच के बाद रिकॉर्ड नहीं मिलने की बात कैसे कही जा रही है। उनका दावा है कि परिवार के पास कथित कर्ज से संबंधित लिखित दस्तावेज और राजनीतिक एजेंट के हस्ताक्षर वाले रिकॉर्ड मौजूद हैं। परिवार चाहता है कि इन दस्तावेजों की जांच कर कर्ज की वास्तविक स्थिति और भुगतान संबंधी दावे पर स्पष्ट जानकारी दी जाए।

16 अक्तूबर को आया ईमेल, वकील की पूछताछ के बाद दिया जवाब
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यूके डेट मैनेजमेंट ऑफिस के कम्युनिकेशंस विभाग की ओर से 16 अक्टूबर को ईमेल भेजा गया। यह जवाब रुठिया परिवार के वकील श्रेयांश रानीवाला की ओर से की गई पूछताछ के बाद आया। ईमेल में विभाग ने बताया कि मामले की जांच की गई, लेकिन ऐसा प्रमाण नहीं मिला, जिससे संबंधित कर्ज को यूनाइटेड किंगडम सरकार की वित्तीय जिम्मेदारी माना जा सके। यानी परिवार के दावे और विभाग के निष्कर्ष के बीच अब भी स्पष्ट अंतर बना हुआ है।

प्रथम विश्व युद्ध के समय 35 हजार रुपये देने का दावा
रुठिया परिवार के मुताबिक, उनके पूर्वज सेठ जुम्मा लाल रुठिया ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1917 में ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का कर्ज दिया था। परिवार का कहना है कि इस राशि का भुगतान अब तक नहीं हुआ। इसी कथित बकाया राशि का हिसाब मांगने के लिए परिवार ने कानूनी प्रक्रिया का सहारा लिया। हालांकि, कर्ज की शर्तों, मूल दस्तावेजों की प्रामाणिकता और भुगतान की कानूनी बाध्यता की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।

क्या पुराने दस्तावेजों से सुलझेगा 109 साल पुराना मामला?
इस पूरे विवाद में सबसे अहम सवाल यह है कि परिवार के पास मौजूद बताए जा रहे दस्तावेजों की जांच किस तरह होगी और क्या उनके आधार पर ब्रिटिश सरकार की कोई कानूनी देनदारी साबित की जा सकती है। फिलहाल यूके डेट मैनेजमेंट ऑफिस ने उपलब्ध जानकारी के आधार पर भुगतान की जिम्मेदारी स्थापित नहीं होने की बात कही है, जबकि रुठिया परिवार अपने दावे पर कायम है। अब मामले की दिशा दस्तावेजों की प्रामाणिकता, कर्ज की शर्तों और संबंधित कानूनी प्रावधानों की जांच से तय होगी।   ये है वो पुराना दस्तावेज, जिसमें कर्ज की बात लिखी गई है।  मेल पर मिला जवाब

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