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इच्छादेवी मंदिर: देवीदास की तपस्या, मराठा सूबेदार का संकल्प और 176 सीढ़ियां; रोचक हैं सदियों पुरानी मान्यताएं

Sun, 11 Oct 2026 04:10 PM IST
बुरहानपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बुरहानपुर

मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा के निकट बुरहानपुर जिले के ग्राम इच्छापुर में स्थित मां इच्छादेवी मंदिर सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और लोकमान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 176 प्राचीन सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मान्यता है कि यहां मां स्वयंभू स्वरूप में विराजित हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। ताप्ती महात्म्य में भी इस स्थान की महिमा का उल्लेख बताया जाता है।

मंदिर की पहचान देवीदास नामक ब्राह्मण की तपस्या, मराठा शासनकाल के एक सूबेदार के संकल्प और भुस्कुटे परिवार के योगदान से जुड़ी कथाओं से बनी है। चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मध्यप्रदेश के अलावा महाराष्ट्र के जलगांव, भुसावल और आसपास के क्षेत्रों से भी भक्त मां के दर्शन करने आते हैं।

देवीदास की तपस्या से जुड़ी है प्राकट्य की मान्यता
स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवीदास नामक ब्राह्मण ने मां शक्ति के दर्शन और आशीर्वाद की कामना से कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां ने उन्हें दर्शन दिए। इसी प्रसंग को इच्छादेवी धाम की उत्पत्ति से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि मां भक्तों की इच्छाएं पूरी करती हैं। इसी विश्वास के कारण देवी को इच्छादेवी कहा जाने लगा और गांव का नाम इच्छापुर पड़ने की जनश्रुति भी प्रचलित हुई। श्रद्धालु यहां परिवार की सुख-समृद्धि, सुख-शांति और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। मंदिर में मां के स्वरूप को स्वयंभू और पिंड रूप में पूजा जाता है। भक्त इसे देवी शक्ति की उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं। नारियल, चुनरी और पुष्प अर्पित कर पूजा-अर्चना की जाती है। मनोकामना पूरी होने पर कई श्रद्धालु दोबारा दर्शन के लिए भी पहुंचते हैं। देवीदास की तपस्या से जुड़ा प्रसंग धार्मिक आख्यान और जनश्रुति के रूप में प्रचलित है। इसे मंदिर की आस्था और स्थानीय परंपरा के संदर्भ में देखा जाता है।

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मराठा सूबेदार ने बनवाया मंदिर और कुआं
मां इच्छादेवी मंदिर के इतिहास से जुड़ी एक अन्य जनश्रुति ग्वालियर के मराठा सूबेदार से संबंधित है। स्थानीय परंपरा और पर्यटन संबंधी विवरणों के अनुसार, सूबेदार ने संतान प्राप्ति की कामना से मां के दरबार में संकल्प लिया था। उन्होंने मनोकामना पूरी होने पर मंदिर बनवाने और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए कुएं का निर्माण कराने का वचन दिया। मान्यता है कि इच्छा पूरी होने के बाद उन्होंने मंदिर और कुएं का निर्माण कराया। मंदिर की प्राचीनता को लेकर विभिन्न विवरणों में लगभग 400 से 500 वर्ष पुरानी परंपरा का उल्लेख मिलता है। ये कथाएं मंदिर के धार्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और पीढ़ियों से श्रद्धालुओं के बीच सुनाई जाती रही हैं।

भुस्कुटे परिवार ने बनवाईं प्राचीन सीढ़ियां
पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक पहुंचने के लिए बनी 176 प्राचीन सीढ़ियां भी इसकी प्रमुख पहचान हैं। प्रचलित विवरणों के अनुसार, मंदिर के निर्माण के बाद श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए भुस्कुटे परिवार ने इन सीढ़ियों का निर्माण कराया था। स्थानीय परंपरा में मंदिर के विकास और आवागमन की सुविधा के लिए परिवार के योगदान को याद किया जाता है। सीढ़ियां चढ़ते हुए श्रद्धालु मां का स्मरण करते हैं और दर्शन के लिए मंदिर तक पहुंचते हैं। कई भक्तों के लिए यह यात्रा भी उनकी धार्मिक साधना का हिस्सा होती है। समय के साथ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने पर मंदिर तक पहुंचने की सुविधाओं को बेहतर बनाने के प्रयास किए गए। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, पर्यटन विकास के अंतर्गत उतरने के लिए लगभग 225 अतिरिक्त सीढ़ियों का निर्माण भी कराया गया है।

पर्यटन विकास पर भी जोर
मंदिर ट्रस्ट और दानदाताओं के सहयोग से परिसर के विकास के प्रयास किए गए हैं। श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए आवासीय व्यवस्था सहित कुछ आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम के माध्यम से लगभग 93 लाख 25 हजार रुपये की लागत से मंदिर क्षेत्र के विकास और कायाकल्प का कार्य कराया गया। इन प्रयासों का उद्देश्य मंदिर तक पहुंचने के मार्ग को सुविधाजनक बनाना और श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थाओं में सुधार करना है।
प्राचीन सीढ़ियों और धार्मिक परंपराओं के साथ आधुनिक सुविधाओं का विकास इस तीर्थस्थल के बदलते स्वरूप को दर्शाता है।

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दोनों नवरात्र में उमड़ते हैं श्रद्धालु
मां इच्छादेवी मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। प्रतिपदा से नवमी तक पूजा-अर्चना और दर्शन के लिए भक्तों की आवाजाही बनी रहती है। बुरहानपुर के अलावा महाराष्ट्र के जलगांव, भुसावल और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। कई परिवारों में पीढ़ियों से यहां दर्शन करने की परंपरा चली आ रही है। कुछ भक्त प्रत्येक नवरात्र में आते हैं, जबकि कुछ मनोकामना पूरी होने के बाद मां के प्रति आभार व्यक्त करने पहुंचते हैं। भीड़ बढ़ने के दौरान दर्शन व्यवस्था, आवागमन और सुरक्षा महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में मंदिर ट्रस्ट और प्रशासन की भूमिका भी बढ़ जाती है।

आस्था, इतिहास और लोकपरंपरा का संगम
मां इच्छादेवी मंदिर की पहचान देवीदास की तपस्या, मराठा सूबेदार के संकल्प और भुस्कुटे परिवार के योगदान से जुड़ी परंपराओं से बनी है। ये कथाएं इस धाम की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। मंदिर के इतिहास को अधिक प्रमाणिक रूप में सामने लाने के लिए ताप्ती महात्म्य के मूल पाठ, मंदिर ट्रस्ट के पुराने अभिलेखों और स्थानीय परिवारों से जुड़ी ऐतिहासिक जानकारी का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण महत्वपूर्ण हो सकता है। मां इच्छादेवी का यह प्राचीन धाम आज भी मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के श्रद्धालुओं को जोड़ता है। नवरात्र में उमड़ने वाली भीड़ और पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक पहुंचने के लिए चढ़ी जाने वाली सीढ़ियां इस क्षेत्र की धार्मिक आस्था और परंपरा की पहचान बनी हुई हैं। मां इच्छादेवी मंदिर   मां इच्छादेवी मंदिर की सीढ़ियां    

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