एशियन गेम्स 2026 में जींद की बेटी कीर्ति शर्मा ने अपनी मेहनत और संघर्ष से देश के साथ अपने गांव रिटोली का नाम भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर रोशन कर दिया। भारतीय महिला रिकर्व तीरंदाजी टीम ने एशियन गेम्स के इतिहास में पहली बार स्वर्ण पदक हासिल किया। फाइनल में अंकिता भकत, कीर्ति शर्मा और कुमकुम अनिल मोहोद की भारतीय तिकड़ी ने दक्षिण कोरिया को 5-3 से हराकर यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। फाइनल मुकाबले में दोनों टीमों के बीच शुरुआत से ही कड़ी टक्कर देखने को मिली। भारतीय तीरंदाजों ने दबाव के बीच संयम बनाए रखा और महत्वपूर्ण मौकों पर सटीक निशाने लगाए। तीसरे सेट में भारत ने बढ़त हासिल की। अंतिम सेट बराबरी पर रहने के बाद भारतीय टीम ने 5-3 से मुकाबला अपने नाम कर लिया। इस जीत के साथ महिला रिकर्व टीम इवेंट में भारत के खाते में एशियन गेम्स का पहला स्वर्ण दर्ज हुआ। बेटी के सपने के लिए पिता ने लिया था 60 हजार का कर्ज कीर्ति की सफलता की चमक के पीछे उनके परिवार का संघर्ष भी जुड़ा है। रिटोली गांव के रहने वाले उनके पिता विजय कुमार खेती करते हैं और परिवार की आजीविका करीब तीन एकड़ जमीन पर निर्भर है। आर्थिक स्थिति सीमित होने के बावजूद उन्होंने बेटी के खेल के रास्ते में संसाधनों की कमी को आड़े नहीं आने दिया। वर्ष 2022 में कीर्ति के लिए रिकर्व बो खरीदने के लिए विजय कुमार ने 60 हजार रुपये का कर्ज लिया था। उस समय शायद परिवार ने भी नहीं सोचा होगा कि यही धनुष एक दिन बेटी को एशियन गेम्स के स्वर्ण पदक तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाएगा। स्कूल में प्रतिभा तलाशने पहुंचे कोच ने पहचानी छिपी क्षमता कीर्ति का तीरंदाजी सफर गांव से ही शुरू हुआ। पिल्लूखेड़ा क्षेत्र के स्कूल में प्रतिभा तलाशने पहुंचे कोच उधम सिंह की नजर कीर्ति पर पड़ी। शुरुआती दौर में उनकी शारीरिक बनावट को देखते हुए कोच को लगा कि वह तीरंदाजी के लिए उपयुक्त नहीं होंगी। लेकिन कीर्ति ने इस आकलन को अपनी मेहनत से बदल दिया। अभ्यास में लगातार खुद को साबित करते हुए उन्होंने तीरंदाजी को अपना लक्ष्य बना लिया। इसके बाद जिला और राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन करते हुए कीर्ति ने भारतीय टीम के ट्रायल में भी शानदार प्रदर्शन किया और शीर्ष स्थान हासिल कर एशियन गेम्स की टीम में जगह बनाई। अब वही बेटी देश की ऐतिहासिक स्वर्ण पदक विजेता टीम की सदस्य बन चुकी है। कीर्ति की जीत की खबर मिलते ही रिटोली गांव और जींद के खेल जगत में खुशी का माहौल है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंची कीर्ति की कहानी परिवार के संघर्ष, पिता के भरोसे और बेटी की लगातार मेहनत की मिसाल बन गई है।