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आजादी की लड़ाई में गहरौली ने दिए कई सेनानी

Fri, 10 Aug 2012 12:00 PM IST
Hamirpur
Hamirpur Updated Fri, 10 Aug 2012 12:00 PM IST
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गहरौली (हमीरपुर)। गांव में आजादी की लड़ाई में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एक दो नहीं बल्कि दर्जनों है। सेनानी रहे रघुनंदन शर्मा के निधन के बाद उनका परिवार मुफलिसी में जी रहा है। बच्चों को उच्चशिक्षा दिलाने में धन आड़े आ रहा है। मौजूदा समय में परिवार के लोग दैनिक मजदूरी कर रहे हैं। 14 बीघे पैतृक जमीन का मालिकाना हक रखने वाले इस सेनानी ने 4 बीघे जमीन बेचकर गांव में मनी तालाब के किनारे नेहरू की प्रतिमा लगाई थी। इसके अलावा पर्यावरण को संरक्षित रखने के उद्देश्य से बगिया भी तैयार की लेकिन प्रशासन ने ग्रामसभा की जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगा उसे उजड़वा दिया। हालांकि सेनानी परिवार के लोगों ने इस बगिया को फिर हराभरा कर लिया। सेनानी की विधवा को कष्ट इस बात का है कि पति द्वारा स्थापित नेहरू की प्रतिमा पर कोई दो फूल चढ़ाने नहीं जाता है।
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देश की आजादी के लिए दो बार जेल जा चुके रघुनन्दन शर्मा ने चार साल कारावास काटा। आजादी के इस दीवाने ने जवाहर लाल नेहरू का साथ पकड़ा और 1936 में जिले का पहला सम्मेलन अपने गांव गहरौली में करवाया। जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू बतौर मुख्य अतिथि आए थे। मुख्य अतिथि के रुप में सम्मिलित हुए। देश के आजाद होने के बाद आजादी के दीवाने शासन प्रशासन के लिए बेगाने हो गए। आज शर्मा के परिवार की हालत की पड़ताल की गई तो पाया कि यह परिवार मुफलिसी में जीवन यापन कर रहा है। सेनानी की 83 वर्षीय पत्नी बंसती शर्मा ने कहा कि आजादी लाने में उनके पति ने लंबा संघर्ष किया। ईमानदारी उनमें कूट कूटकर भरी थी। लिहाजा 32 बीघे के मालिक होने के बावजूद उन्हें 16 बीघे जमीन बेचनी पड़ी। प. जवाहरलाल नेहरू के प्रति अटूट श्रद्धा होने के चलते व सम्मेलन स्थल को यादगार बनाने के लिए उन्होंने इसी पैसों से उनकी प्रतिमा लगवाई थी। प्रशासन ने सहयोग करने के बजाय इस बगिया को करीब तीस वर्ष पूर्व उजाड़ दिया था। वृद्धा ने बताया कि जब तक वह जीवित रहे पर्यावरण को संरक्षित करने पर विशेष काम किया। प्रतिदिन सवा किलो सामग्री से हवन यज्ञ करते रहे। बताया कि उसके तीन जवान पुत्रों में दो की स्वाभाविक मौत हो चुकी है। कहती है कि परिवार की आर्थिक स्थित कमजोर होने वह अपने बेटों को उच्च शिक्षा नहीं दिला सकीं। उनके दो नाती है जिन्हें धन के अभाव में उच्च तकनीकी शिक्षा नहीं दिला पाईं। जिससे वह मौजूदा समय में एफसीआई में प्राइवेट तौर पर दैनिक कर्मी के रूप में काम कर रहे है। बसंती शर्मा ने कहा कि आजादी दिलाने में अहम भूमिका अदा करने वाले इस गांव को पीने के पानी समस्या से जूझना पड़ रहा है। अगर सेनानियों को सच्ची श्रद्धांजलि देना है तो न कुछ सही उनके परिवारों को मीठे पानी की ही व्यवस्था प्रशासन कर दे।
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