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‘मेरी कोशिश है मेरा हर लहजा, खास होकर भी आम हो जाए’
Badaun
Updated Fri, 16 May 2014 05:30 AM IST
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बदायूं। अपने गीत और गजलों से हृदय को झंकृत कर देने वाले डॉ. उर्मिलेश शंखधार ने बदायूं को जो पहचान दी, उसके लिए बदायूं हमेशा उनका ऋणी रहेगा। सफलता को अपने आगोश में लेकर काव्य मंचों पर छाए रहने वाले डॉ. उर्मिलेश की याद का आज खास मौका है। 16 मई, 2005 को 12 दिन काल से संघर्ष करते हुए साहित्य के पुरोधा को पराजय मिली।
मेरी कोशिश है मेरा हर लहजा
खास होकर भी आम हो जाए
डॉ. उर्मिलेश की यह पंक्तियां उनकी जिंदगी को खुली किताब की तरह पढ़ने जैसी है। प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के विशेष निर्देश पर उनकी अंत्येष्टि कछला गंगा घाट पर राजकीय सम्मान के साथ की गई थी। प्रदेश सरकार ने वर्ष 2007 में मरणोपरांत उन्हें यश भारती से सम्मानित किया।
छह जुलाई, 1951 में इस्लानगर अपनी ननिहाल में जन्मे डॉ. उर्मिलेश जनकवि पं. भूपराम शर्मा भूप के कुलदीपक थे। पैतृक गावं भतरी गोवर्धनपुर, वजीरगंज, चंदौसी और बदायूं में शिक्षा प्राप्त कर काव्य कला में अपनी पहचान बनाते चले गए। गीत और गजलों में उनकी अपनी अलग धमक थी। उनकी प्रकाशित रचनाओं में धुआं चीरते हुए, डॉ. उर्मिलेश की गजलें, फैसला वह भी गलत था, धूप निकलेगी, सोत नदी बहती है, चिरंजीव हैं हम, बाढ़ में डूबी नदी, जागरण की देहरी पर, बिम्ब कुछ उभरते हैं, घर बुनते अक्षर, वरदानों की पांडुलिपि, गंधों की जागीर, आइने आह भरते हैं और अक्षत युगमान के सरीखे जैसी कृतियां कलम की कल्पनाओं की अल्पना सदृश रही हैं।
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1907 से स्थापित एलन क्लब के बदले नाम और स्वरूप बदायूं क्लब में सचिव बनने के साथ उन्होंने बदायूं महोत्सव की परंपरा की नींव रखी। इससे आज भी जिले की प्रतिभाओं का उदय हो रहा है। कवि सम्मेलनों में उनका एक छत्र संचालन अपनी अलग पहचान के लिए जाना जाता रहेगा। डॉ. उर्मिलेश ने कभी व्यंग्य, तो कभी लुप्त होती संस्कृति और कभी मानवीय रिश्तों के अछूते अंशों को छूकर साहित्य में अपनी सुगंधित आहुतियां दी हैं।
देश की शताधिक संस्थाओं द्वारा डॉ. उर्मिलेश को गीत गंधर्व, कवि भूषण, राष्ट्रकवि, भारतश्री, लोकतांत्रिक गीतकार, साहित्य सारस्वत, आचार्यश्री, युगचारण जैसे उपाधियों से अलंकृत किया गया। आजीवन मानद रोटेरियन, पर्यावरण, साक्षरता, राष्ट्रीय एकता, पोलियो उन्मूलन के लिए महत्वपूर्ण योगदान किया। कविता चली गांव की ओर जैसी नई सोच का नया अभियान चलाया और साहित्य के माध्यम से समाज सेवा में अपना नाम जुड़वाया।
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मेरी कोशिश है मेरा हर लहजा
खास होकर भी आम हो जाए
डॉ. उर्मिलेश की यह पंक्तियां उनकी जिंदगी को खुली किताब की तरह पढ़ने जैसी है। प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के विशेष निर्देश पर उनकी अंत्येष्टि कछला गंगा घाट पर राजकीय सम्मान के साथ की गई थी। प्रदेश सरकार ने वर्ष 2007 में मरणोपरांत उन्हें यश भारती से सम्मानित किया।
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छह जुलाई, 1951 में इस्लानगर अपनी ननिहाल में जन्मे डॉ. उर्मिलेश जनकवि पं. भूपराम शर्मा भूप के कुलदीपक थे। पैतृक गावं भतरी गोवर्धनपुर, वजीरगंज, चंदौसी और बदायूं में शिक्षा प्राप्त कर काव्य कला में अपनी पहचान बनाते चले गए। गीत और गजलों में उनकी अपनी अलग धमक थी। उनकी प्रकाशित रचनाओं में धुआं चीरते हुए, डॉ. उर्मिलेश की गजलें, फैसला वह भी गलत था, धूप निकलेगी, सोत नदी बहती है, चिरंजीव हैं हम, बाढ़ में डूबी नदी, जागरण की देहरी पर, बिम्ब कुछ उभरते हैं, घर बुनते अक्षर, वरदानों की पांडुलिपि, गंधों की जागीर, आइने आह भरते हैं और अक्षत युगमान के सरीखे जैसी कृतियां कलम की कल्पनाओं की अल्पना सदृश रही हैं।
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1907 से स्थापित एलन क्लब के बदले नाम और स्वरूप बदायूं क्लब में सचिव बनने के साथ उन्होंने बदायूं महोत्सव की परंपरा की नींव रखी। इससे आज भी जिले की प्रतिभाओं का उदय हो रहा है। कवि सम्मेलनों में उनका एक छत्र संचालन अपनी अलग पहचान के लिए जाना जाता रहेगा। डॉ. उर्मिलेश ने कभी व्यंग्य, तो कभी लुप्त होती संस्कृति और कभी मानवीय रिश्तों के अछूते अंशों को छूकर साहित्य में अपनी सुगंधित आहुतियां दी हैं।
देश की शताधिक संस्थाओं द्वारा डॉ. उर्मिलेश को गीत गंधर्व, कवि भूषण, राष्ट्रकवि, भारतश्री, लोकतांत्रिक गीतकार, साहित्य सारस्वत, आचार्यश्री, युगचारण जैसे उपाधियों से अलंकृत किया गया। आजीवन मानद रोटेरियन, पर्यावरण, साक्षरता, राष्ट्रीय एकता, पोलियो उन्मूलन के लिए महत्वपूर्ण योगदान किया। कविता चली गांव की ओर जैसी नई सोच का नया अभियान चलाया और साहित्य के माध्यम से समाज सेवा में अपना नाम जुड़वाया।