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म्यांमार में सैनिक तख्ता पलट के खिलाफ आखिर क्यों चुप हैं वहां के नस्लीय बागी गुट?
Thu, 01 Apr 2021 03:15 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यंगून
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यंगून
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Thu, 01 Apr 2021 03:15 PM IST
सार
विश्लेषकों का कहना है कि बागी गुटों के बीच आपसी मतभेद भी कम नहीं हैं। कई नस्लीय समूहों में एक से ज्यादा बागी गुट हैं, जिनके बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता रही है। इस फूट का फायदा सैनिक शासन को मिला है...
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म्यामांर में मचा है बवाल
- फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
म्यांमार में सैनिक तख्ता पलट के खिलाफ चल रहे व्यापक जन आंदोलन के दौरान कई नस्लीय हथियारबंद गुटों ने अपने को इस प्रतिरोध से अलग रखा है। पिछले दो महीने से चल रहे आंदोलन के दौरान करेन और कचिन बगियों ने तो हमले किए हैं, लेकिन कई दूसरे नस्लीय बागी समूह या तो चुप बैठे हुए हैं या उनमें से कई ने सैनिक शासकों के साथ सहयोग किया है।
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गौरतलब है कि जब पिछले एक फरवरी को तख्ता पलट हुआ, तब नस्लीय बागी गुटों के संगठन इथनिक आर्म्ड ऑर्गनाइजेशन (ईएओ) ने सैनिक शासन के खिलाफ बयान जारी किया था। उन्होंने नए शासन को ‘हत्यारा’ तक कहा था। लेकिन वेबसाइट एशिया टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक उसके बाद से कुछ नस्लीय गुटों ने सशस्त्र हमले किए हैं, कुछ ने केवल सख्त बयान जारी किए हैं, जबकि कुछ ने पूरी चुप्पी साधे रखी है। ऐसे में कई विश्लेषकों के लिए ये समझना मुश्किल हो गया है कि जब ये तमाम गुट म्यांमार की सेना को अपना दुश्मन नंबर एक मानते रहे हैं, तो वे ऐसे मौकों पर क्यों निष्क्रिय हैं, जब आम माहौल सेना के खिलाफ है?
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सैनिक शासन के खिलाफ अब तक खुल कर सामने आया एकमात्र नस्लीय बागी गुट करेन नेशनल यूनियन (कएनयू) है। ये सबसे पुराना बागी गुट है, जो 1947 से सक्रिय है। पिछले 26 मार्च को इसने एक बयान में आठ मांगें रखीं। उनमें सेना विरोधी प्रदर्शनकारियों पर हिंसा रोकना, सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई, देशभर में तुरंत युद्धविराम लागू करना, आदि शामिल हैं।
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केएनयू के बयान को उसकी मीडिया शाखा डेमोक्रेटिक वॉयस ऑफ बर्मा ने जारी किया। फेसबुक पर उसे लगभग डेढ़ लाख लोगों ने देखा। 27 मार्च को जब सैनिक शासक सेना दिवस मना रहे थे, तब केएनयू की सशस्त्र शाखा ने सलवीन नदी के पास एक सैनिक चौकी पर हमला करके कई सैनिकों को बंदी बना लिया। इसके जवाब में सैनिक शासकों ने उसी रात करेन बहुल इलाकों पर हवाई बमबारी की।
उधर म्यांमार की सुदूर उत्तरी सीमा पर कचिन नस्लीय समूह की कचिन इंडिपेंडेन्स आर्मी (केआईए) ने भी हमले तेज कर दिए हैं। बताया जाता है कि इस गुट ने हाल में ऐसे हमले किए हैं, जैसे 2013 के बाद नहीं देखे गए। केआईए ने चेतावनी दी है कि अगर सैनिकों ने कचिन बहुल इलाकों पर हमले जारी रखे, तो वह देश के शहरों को भी निशाना बनाएगी।
लेकिन इन दोनों के अलावा देश के बाकी नस्लीय बागी गुटों की कोई गतिविधि पिछले दो महीने में दर्ज नहीं हुई है। बल्कि करेन बागियों के बीच 2007 में हुए विभाजन के बाद बने गुट केएनयू/केएनएल पीस काउंसिल ने सेना दिवस के मौके पर हुए समारोह में अपने प्रतिनिधि भेजे। कुछ बागी गुटों के नुमाइंदों ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि अगर सेना का दमन चलता रहा, तो देर-सबेर सभी बागी गुट सेना विरोधी संघर्ष में हिस्सा लेंगे। लेकिन अभी वे इंतजार करने की मुद्रा में हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि बागी गुटों के बीच आपसी मतभेद भी कम नहीं हैं। कई नस्लीय समूहों में एक से ज्यादा बागी गुट हैं, जिनके बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता रही है। इस फूट का फायदा सैनिक शासन को मिला है। कुछ बागी गुटों को शिकायत है कि जब सेना उन पर दमन कर रही थी, तब देश की बहुसंख्यक आबादी का समर्थन सेना के साथ था। ऐसे में जब सेना बहुसंख्यक समुदाय को निशाना बना रही है, तो उसमें बागी गुटों की कोई भूमिका नहीं है।
जो गुट पूरी तरह चुप हैं, उनमें यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी भी शामिल है। इसे देश का सबसे बड़ा हथियारबंद गुट माना जाता है। लेकिन एक समझ यह है कि ये गुट चीन के प्रभाव में है। इसलिए यह सैनिक शासकों के खिलाफ खुलकर सामने नहीं आया है। गौरतलब है कि चीन ने सैनिक तख्ता पलट का सिर्फ जुबानी विरोध किया है।
अराकान आर्मी भी एक बड़ा गुट है, जिसने म्यांमार में निर्दोष लोगों के मारे जाने पर दुख तो जताया है, लेकिन साथ ही कहा है कि उत्पीड़ित नस्लीय गुटों की लड़ाई अपनी आजादी के लिए है। इन गुटों के ऐसे रुख से सैनिक शासकों को राहत मिली है। इससे एक साथ कई मोर्चों पर लड़ने की समस्या से वे बच गए हैं।