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Bhutto Family: भुट्टो कुनबे का भारत विरोध, कई सवाल अब भी अनसुलझे

Thu, 22 Dec 2022 04:38 AM IST
vivek shukla vivek shukla
Updated Thu, 22 Dec 2022 04:38 AM IST
सार

जुल्फिकार भुट्टो का कई अर्थों में भारत से करीबी संबंध था। उनके मुंबई और जूनागढ़ से रिश्तों की जानकारी जगजाहिर है। भुट्टो जब मुंबई के प्रतिष्ठित कैथड्रल स्कूल में पढ़ रहे थे, तब उनके परम मित्र थे पीलू मोदी, जो राज्यसभा में भी रहे।

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Why Bhutto family oppose India? many questions still unresolved
बिलावल भुट्टो - फोटो : Twitter

विस्तार

बिलावल भुट्टो जरदारी ने मुंबई के कैथड्रल स्कूल का नाम संभवत: अपनी मां बेनजीर भुट्टो से सुना होगा। जब पाकिस्तान 1947 में बना तो बिलावल के नाना जुल्फिकार अली भुट्टो इस स्कूल से निकल चुके थे। भुट्टो परिवार पाकिस्तान 1947 में नहीं गया था। 1950 में स्थायी रूप से भुट्टो खानदान मुस्लिमों के लिए बने पाकिस्तान चला गया। उनके राजनीतिक दुश्मन इस मुद्दे पर उनकी पाकिस्तान को लेकर निष्ठा पर सवाल उठाते रहते हैं। इस निशाने से बचने के लिए भुट्टो कुनबे को एक ही काट नजर आती है। वह है, भारत का कसकर विरोध करना। बिलावल भुट्टो जरदारी ने कुछ दिन पहले न्यूयॉर्क में अपनी प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'गुजरात का कसाई' कहा। बिलावल की इस गटर बयानबाजी पर हैरत करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उन्हें पता है कि उनके भारत विरोध में ही उनके भविष्य की संभावनाएं छिपी हुई हैं। वह जितना ज्यादा भारत और हिंदू विरोध करेंगे, उतने ही अपने मुल्क में लोकप्रिय होंगे। यह उन्होंने अपने नाना जुल्फिकार अली भुट्टो के भारत को लेकर दिए बीसियों बयानों को पढ़कर सीख लिया होगा। 

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जुल्फिकार भुट्टो का कई अर्थों में भारत से करीबी संबंध था। उनके मुंबई और जूनागढ़ से रिश्तों की जानकारी जगजाहिर है। भुट्टो जब मुंबई के प्रतिष्ठित कैथड्रल स्कूल में पढ़ रहे थे, तब उनके परम मित्र थे पीलू मोदी, जो राज्यसभा में भी रहे। पीलू मोदी ने अपनी किताब जुल्फी माई फ्रैंड में एक जगह लिखा भी है कि हालांकि हम दोनों घनिष्ठ मित्र थे, 1946 में, पर जुल्फिकार टू नेशन थिअरी पर यकीन करते थे। वह जिन्ना के आंदोलन को सही मानते थे। भुट्टो के पिता सर शाहनवाज भुट्टो देश के विभाजन से पहले मौजूदा गुजरात की जूनागढ़ रियासत के प्रधानमंत्री थे। 
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भुट्टो की मां हिंदू थीं। उनका निकाह से पहले नाम लक्खीबाई था। बाद में हो गया खुर्शीद बेगम। वह मूलत: राजपूत परिवार से संबंध रखती थीं। उन्होंने निकाह करने से पहले ही इस्लाम स्वीकार किया था। कहने वाले कहते हैं कि शाहनवाज और लक्खीबाई के बीच पहली मुलाकात जूनागढ़ के नवाब के किले में हुई। वहां पर लक्खीबाई भुज से आई थीं। शाहनवाज भुट्टो जूनागढ़ के प्रधानमंत्री के पद पर 30 मई,1947 से लेकर आठ नवंबर,1947 तक रहे। यानी पाकिस्तान के बनने के कई महीनों के बाद तक। जब बेनजीर भुट्टो की निर्मम हत्या हुई थी, तब जूनागढ़ में भी शोक की लहर दौड़ गई थी। यहां के बाशिंदे बेनजीर भुट्टो को कहीं न कहीं अपना ही मानते थे। 
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एक बड़ा सवाल यह भी है कि देश के विभाजन के वक्त भुट्टो और उनका परिवार पाकिस्तान क्यों नहीं चला गया था? जब गांधी जी की वर्ष 1948 में हत्या हुई, तब वह अमेरिका में पढ़ रहे थे। संयोग से वहां पर पीलू मोदी भी थे। वह मोदी को सांत्वना दे रहे थे। वह 11 सितंबर,1948 को जिन्ना की मौत के वक्त भी मुंबई में थे। भुट्टो 1973 से 1977 तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे। जरा सोचिए कि जिस शख्स का पाकिस्तान के दो फाड़ करवाने में अहम रोल था, वह 1973 के पाकिस्तान के आम चुनाव में जीतकर मुल्क का प्रधानमंत्री ही बन गया। बना इसलिए, क्योंकि उन्होंने उसी न्यूयॉर्क शहर में भारत-पाकिस्तान युद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र की सभा को संबोधित करते हुए भारत को अनाप-शनाप बका था। इसके चलते पाकिस्तानी अवाम ने उनकी पाकिस्तान को तोड़ने की खता को माफ कर दिया। 51 वर्षों के बाद उनके पौत्र ने भारत पर निशाना साधा। 


भुट्टो को चार अप्रैल, 1979 को फांसी पर लटका दिया गया था। जुल्फिकार अली भुट्टो की मौत के नौ साल के बाद उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं। बेनजीर का भारत विरोध अपने पिता जितना तीखा नहीं था। बहरहाल, दो सवालों के जवाब अभी तक नहीं मिल सके कि एक हिंदू मां का बेटा इतना घोर भारत विरोधी क्यों था और दूसरा भुट्टो खानदान देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान तुरंत क्यों नहीं गया? बिलावल भुट्टो जरदारी अपने नाना के नक्शे कदमों पर चल रहे हैं। आखिर उनका लक्ष्य भी तो पाकिस्तान का वजीर-ए-आजम ही बनना है।
 

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