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COP 29: भारत की मांग- विकासशील देशों को 1.3 लाख करोड़ डॉलर की जरूरत; निवेश लक्ष्य नहीं बन सकता जलवायु वित्त

Thu, 14 Nov 2024 11:57 PM IST
शिव शुक्ला वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बाकू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बाकू Published by: शिव शुक्ला Updated Thu, 14 Nov 2024 11:57 PM IST
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USD 1.3 trillion needed for developing countries: India at UN climate talks
कॉप 29 - फोटो : ANI

भारत ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में छठ उच्च स्तरीय संवाद के दौरान इस बात पर जोर दिया कि विकसित देशों को 2030 तक हर साल कम से कम 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर विकासशील देशों को मुहैया कराने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। 

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समान विचारधारा बोले विकासशील देशों की तरफ से बोलते हुए भारतीय प्रतिनिधि नरेश पाल गंगवार ने कहा कि यह समर्थन अनुदान, रियायती वित्त पोषण और गैर-ऋण सहायता के माध्यम से मिलना चाहिए और जलवायु वित्त को निवेश लक्ष्य नहीं बनाया जाना चाहिए। जलवायु वित्त पैकेज निर्धारित करते समय विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए व उन्हें प्रतिबंधात्मक शर्तों से मुक्त होना चाहिए। उधर जलवायु वित्त पर स्वतंत्र उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह की एक नई रिपोर्ट में भी कहा गया है कि कॉप-29 में वार्ताकारों को 2030 तक हर साल 1 खरब डॉलर जुटाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त विशेषज्ञों के समूह के अनुसार, यह धन सार्वजनिक व निजी स्रोतों से है। 
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सभी फंडिंग स्त्रोतों का इस्तेमाल जरूरी
समूह ने कहा कि जलवायु वित्त जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी फंडिंग स्रोतों का इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है। जलवायु वित्त विशेषज्ञों अमर भट्टाचार्य, वेरा सोंगवें और निकोलस स्टर्न की सह-अध्यक्षता में स्वतंत्र उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समूह का गठन कॉप- 26 से शुरू होने वाले क्रमिक सीओपी अध्यक्षों को सलाह देने के लिए किया गया था। यह समूह की तीसरी रिपोर्ट है। इसमें कहा गया कि कॉप-29 में देशों को एनसीक्यूजी को लेकर एक समझौते पर पहुंचने की आवश्यकता है। 
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नई दिल्ली में प्रदूषण : भारत को प्रदूषकों पर लगाम लगाना होगा
दिल्ली में बुरे प्रदूषण स्तर के बाद यहां कॉप-29 जलवायु सम्मेलन में विशेषज्ञों ने भारत से मीथेन और ब्लैक कार्बन जैसे अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों (एसएलसीपी) को घटाने को कहा। नई दिल्ली की वायु गुणवत्ता इस सीजन में पहली बार 'गंभीर' स्तर पर पहुंचकर एक्यूआई स्तर पर 418 तक हो गई। 'इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट' (आईजीएसडी) में भारत की कार्यक्रम निदेशक जेरीन ओशो व आईजीएसडी के अध्यक्ष ड्यूरवुड जेल्के ने कहा, एसएलसीपी में कटौती प्रदूषण व ग्लोबल वार्मिंग से निपटने में जरूरी है। यदि हम एसएलसीपी पर ध्यान देते हैं, तो हम तेजी से शीतलन पा सकते हैं।

भारत पर बुरा असर, नौकरियां भी प्रभावित
ओशो ने बैठक में कहा कि जलवायु परिवर्तन के चलते भारत की आर्थिक और पर्यावरणीय स्थिरता प्रभावित हो रही है। इसका श्रम क्षेत्र, कृषि और खाद्य सुरक्षा पर विपरीत असर पड़ रहा है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत में जलवायु परिवर्तन के असर से असंगठित क्षेत्र में 3.4 करोड़ से ज्यादा नौकरियां प्रभावित हुई हैं।


लगातार तीसरे वर्ष, पृथ्वी के अनुमानित तापमान में कोई सुधार नहीं
बृहस्पतिवार को कॉप-29 में रखे एक विश्लेषण के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रयासों में लगातार तीसरे वर्ष पृथ्वी के अनुमानित तापमान में कोई सुधार नहीं आया है। इसके मुताबिक, चीन और अमेरिका में हाल के घटनाक्रमों से दृष्टिकोण थोड़ा खराब होने की संभावना है। क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर के अनुसार, पृथ्वी पूर्व-औद्योगिक समय की तुलना में 2.7 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म होने की राह पर है। इसके मुताबिक, उत्सर्जन अभी भी बढ़ रहा है और तापमान अनुमान में गिरावट नहीं हुई तो मान लेना चाहिए कि सीओपी के रूप में होने वाली संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता कोई अच्छा काम नहीं कर रही है। इसके लिए सभी देशों को गंभीरता से काम लेना होगा।

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