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Explainer: क्या है डिजिटल सेवा कर, जिसे लेकर ट्रंप ने दी 100% टैरिफ की धमकी, क्या जद में आ सकता है भारत भी?
Sat, 27 Jun 2026 04:23 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 27 Jun 2026 04:23 PM IST
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सार
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डिजिटल सेवा कर पर अमेरिका के राष्ट्रपति मुखर।
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विस्तार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को एक बड़ा एलान किया। ट्रंप ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर कोई देश अमेरिका की डिजिटल सेवा से जुड़ी कंपनियों पर टैक्स लगाता है, तो उनकी सरकार ऐसे देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाएगी। ट्रंप ने साफ किया कि यह टैरिफ उन देशों पर ऊपर से लगेगा, जिनके साथ अमेरिका का व्यापार समझौता लागू होगा।डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब यूरोपीय संघ (ईयू) ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की शर्तें लगभग तय कर ली हैं और दोनों देशों के बीच इस पर मुहर लगने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। इस के साथ अमेरिका ने भारत के साथ व्यापार समझौते के लिए बातचीत में तेजी दिखाई है और इस साल के अंत तक या अगले साल की शुरुआत तक ट्रेड डील फाइल करने की कोशिशें जारी हैं।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह डिजिटल सेवा टैक्स क्या है, जिसे लेकर अमेरिका की तरफ से सख्त रुख अपनाया गया है? ट्रंप ने अलग-अलग देशों से व्यापार समझौते की चर्चा के बीच इसे लेकर अब बयान क्यों दिया है? क्या इसका अमेरिका के बाकी देशों से होने वाले व्यापार समझौते पर हो सकता है? भारत इस डिजिटल सेवा टैक्स से किस तरह प्रभावित होगा? आइये जानते हैं...
ये भी पढ़ें: US: 'अमेरिकी कंपनियों पर टैक्स लगा तो सामान पर लगाऊंगा 100% टैरिफ', ट्रंप की यूरोपीय देशों को चेतावनी
पहले जानें- क्या है डिजिटल सेवा टैक्स?
डिजिटल सेवा कर (डीएसटी) एक ऐसा टैक्स है, जो अलग-अलग देशों की सरकारों की तरफ से बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों पर लगाया जाता है। खासकर उन कंपनियों पर जो उन देश की सीमाओं के अंदर रहकर राजस्व कमाती हैं। यह कर मुख्य रूप से ऑनलाइन विज्ञापन, डिजिटल मार्केटप्लेस और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसी सेवाओं से होने वाली कमाई पर लागू होता है।ये भी पढ़ें: US: 'अमेरिकी कंपनियों पर टैक्स लगा तो सामान पर लगाऊंगा 100% टैरिफ', ट्रंप की यूरोपीय देशों को चेतावनी
डिजिटल सेवा कर।
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पारंपरिक कॉरपोरेट कर, जो आमतौर पर मुनाफे पर आधारित होते हैं, के उलट डिजिटल सेवा कर की गणना किसी देश में पैदा किए गए कंपनी के कुल राजस्व पर की जाती है। इसका सीधा मतलब यह है कि कंपनियों को यह कर चुकाना ही पड़ता है, भले ही वे उस देश में बहुत कम या बिल्कुल न के बराबर स्थानीय मुनाफा दिखा रही हों। यानी यह टैक्स मुनाफे पर न हो कर राजस्व पर आधारित होता है।
क्यों डिजिटल सेवा कर लगाते हैं अलग-अलग देश?
डिजिटल सेवा कर आमतौर पर देशों की तरफ से इसलिए लागू किया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मल्टीनेशनल (बहुराष्ट्रीय) तकनीकी कंपनियां उस देश के कर ढांचे में अपना योगदान दें, जहां के ग्राहकों से वे कमाई कर रही हैं। अक्सर इन कंपनियों का कमाई करने वाले देश में कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता है और वे अपना मुनाफा किसी अन्य देश में दर्ज करती हैं।अब जानें- कौन-कौन से देश लगाते रहे हैं डिजिटल सेवा कर?
भारत: भारत विदेशी डिजिटल कंपनियों के राजस्व पर कर लगाने वाले दुनिया के शुरुआती देशों में से एक था। देश में 2016 में एक इक्वलाइजेशन लेवी (जिसे गूगल टैक्स भी कहा जाता है) की शुरुआत की थी। इसके जरिए गैर-प्रवासी डिजिटल कंपनियों की ऑनलाइन विज्ञापन सेवाओं पर छह फीसदी की दर से टैक्स लगता था। बाद में 2020 में इसका दायरा बढ़ाते हुए विदेशी ई-कॉमर्स ऑपरेटरों पर भी दो फीसदी की लेवी लगाई गई थी। हालांकि, अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव को कम करने के लिए भारत ने बाद में इन करों को अस्थायी तौर पर हटा लिया।ब्रिटेन: ब्रिटेन ने 2020 से दो फीसदी का डिजिटल सेवा कर लागू कर रखा है। यह कर उन प्रमुख सर्च इंजनों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और ऑनलाइन मार्केटप्लेस पर लागू होता है जिनका वैश्विक राजस्व 50 करोड़ पाउंड से ज्यादा और यूके से मिलने वाला राजस्व 2.5 करोड़ पाउंड से अधिक है।
फ्रांस: फ्रांस ने 2019 में तीन फीसदी का डिजिटल सेवा कर लागू किया था, जो फेसबुक, अमेजन, एपल और गूगल (एल्फाबेट) जैसी बड़ी अमेरिकी फर्मों पर लागू हुआ था। यह कर फ्रांस के अंदर कमाए गए राजस्व पर लगाया जाता है। अमेरिका के लगातार दबाव और धमकियों के बावजूद फ्रांस इसे हटाने से इनकार करता रहा है।
अन्य यूरोपीय देश: फ्रांस के अलावा इटली, स्पेन और ऑस्ट्रिया जैसे देश भी अपने यहां काम करने वाली बड़ी तकनीकी कंपनियों पर तीन फीसदी का डिजिटल सेवा कर लगाते हैं। इनके साथ ही यूरोपीय संघ (ईयू) के कई अन्य देशों ने भी इस तरह के कर को लागू किया है या प्रस्तावित किया है।
अन्य यूरोपीय देश: फ्रांस के अलावा इटली, स्पेन और ऑस्ट्रिया जैसे देश भी अपने यहां काम करने वाली बड़ी तकनीकी कंपनियों पर तीन फीसदी का डिजिटल सेवा कर लगाते हैं। इनके साथ ही यूरोपीय संघ (ईयू) के कई अन्य देशों ने भी इस तरह के कर को लागू किया है या प्रस्तावित किया है।
डिजिटल सेवा कर लगाने वाले देश।
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अमेरिका क्यों करता है डिजिटल सेवा कर का विरोध?
अमेरिका डिजिटल सेवा कर का कड़ा विरोध मुख्य तौर पर इसलिए करता है, क्योंकि उसका मानना है कि यह कर अनुचित तरीके से अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को निशाना बनाता है और उनके साथ भेदभाव करता है।दरअसल, वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था पर अल्फाबेट (गूगल), मेटा (फेसबुक), एपल और अमेजन जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियों का एकाधिकार है। चूंकि दुनिया की अधिकांश प्रमुख तकनीकी कंपनियां अमेरिका में स्थित हैं, इसलिए डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रशासन का मानना है कि यह कर सीधे तौर पर अमेरिकी निर्यात के लिए बाधाएं पैदा करता है।
अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) ने कुछ समय पहले फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन और ऑस्ट्रिया जैसे देशों की ओर से लगाए गए डिजिटल करों की जांच की है और स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकाला है कि ये नीतियां अमेरिकी फर्मों के खिलाफ भेदभाव करने वाली हैं। ट्रंप ने इन करों को अमेरिकी तकनीक को नुकसान पहुंचाने या उसके साथ भेदभाव करने के लिए डिजाइन किया गया कदम बताया है। राष्ट्रपति ट्रंप का यह भी आरोप है कि दूसरे देश अमेरिकी कंपनियों पर कर लगाकर आसानी से पैसा कमाना चाहते हैं और वे इस तरह से अमेरिका का अनुचित लाभ उठा रहे हैं।
व्यापार समझौते की बातचीत के बीच क्यों आया ट्रंप का डीएसटी पर बयान?
डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से डिजिटल सेवा कर को लेकर 100% टैरिफ लगाने की चेतावनी से जुड़ा यह बयान हाल ही में यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ हुए व्यापार समझौते के घटनाक्रम और उसमें डिजिटल टैक्स के मुद्दे को शामिल न किए जाने से गहराई से जुड़ा है। दरअसल, यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने ट्रंप की तरफ से व्यापार समझौते के लिए तय की गई 4 जुलाई की समय-सीमा को पूरा करने के लिए आनन-फानन में अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ कम करने के समझौते को मंजूरी दी है। यूरोपीय देशों ने गुरुवार को ही इस समझौते से जुड़े कानून को औपचारिक रूप से अपनाया था और ठीक अगले दिन शुक्रवार को ट्रंप ने नई शर्त के साथ यह अल्टीमेटम दे दिया।अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच पिछले साल जो अंतरिम व्यापार समझौता हुआ था, उसमें अमेरिका की तरफ से यूरोप से होने वाले आयातों पर टैरिफ को 15% तक सीमित करने की बात थी, लेकिन इस समझौते में डिजिटल सेवा कर के मुद्दे को शामिल नहीं किया गया था। चूंकि, यह कर अमेरिका और ईयू के बीच असहमति का एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है, इसलिए ट्रंप अब पूर्ण व्यापार समझौते से पहले दबाव बनाने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
तो क्या डिजिटल सेवा कर पर विवाद से व्यापार समझौते बेकार हो जाएंगे?
ट्रंप ने अपने बयान में स्पष्ट किया है कि अगर कोई देश अमेरिकी टेक कंपनियों पर डिजिटल टैक्स लगाता है, तो अमेरिका उनके सभी निर्यातों पर तुरंत 100% टैरिफ लगाएगा और यह कदम अमेरिका के साथ उस देश के किसी भी व्यापार समझौते से ऊपर माना जाएगा। ट्रंप का साफ कहना है कि चाहे व्यापार समझौता लागू हो चुका हो, उस पर हस्ताक्षर हो चुके हों या वह अभी बातचीत के दौर में हो, नया टैरिफ उन सभी समझौतों को रद्द कर देगा।ट्रंप का यह नया अल्टीमेटम अमेरिका और यूरोप के हालिया व्यापार समझौते को खतरे में डाल सकता है, जिसमें डिजिटल सेवा कर को शामिल ही नहीं किया गया था। हालांकि, ट्रंप की धमकियों के जवाब में, यूरोपीय संघ ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि समझौते का सम्मान नहीं किया गया तो वह अपने अधिकारों की रक्षा के लिए तेजी से और निर्णायक रूप से जवाबी कार्रवाई करेगा।
क्या भारत पर भी पड़ सकता है इन धमकियों का असर?
मौजूदा समय में भारत में कोई डिजिटल सेवा कर लागू नहीं है। भारत सरकार ने 'फाइनेंस एक्ट 2024' के माध्यम से विदेशी ई-कॉमर्स ऑपरेटरों पर लगने वाले 2% इक्वलाइजेशन लेवी को पिछले साल 1 अगस्त से हटा दिया था। इसके साथ ही विदेशी तकनीकी कंपनियों, जिनका भारत में कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है, की डिजिटल विज्ञापन सेवाओं पर लगने वाले छह फीसदी लेवी को भी 'फाइनेंस बिल 2025' के तहत 1 अप्रैल 2025 से पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था।चूंकि भारत ने यह कर हटा लिया है, इसलिए भारतीय निर्यातों पर ट्रंप द्वारा तुरंत 100% टैरिफ लगाए जाने का कोई खतरा नहीं है। पहले इन करों को हटाने का एक प्रमुख मकसद अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव को कम करना और एक व्यापक भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की राह आसान करना ही था।
हालांकि, भले ही अभी भारत पर इसका कोई सीधा असर न पड़े, लेकिन व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच जो द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर वार्ता चल रही है, उसमें डिजिटल टैक्स का मुद्दा एक प्रमुख सौदेबाजी का बिंदु बना रहेगा। ट्रंप प्रशासन के इस कड़े रुख को देखते हुए, अमेरिका भविष्य की वार्ताओं में भारत से यह आश्वासन मांग सकता है कि वह ओईसीडी के वैश्विक कर ढांचे से अलग भविष्य में दोबारा कोई एकतरफा डिजिटल टैक्स लागू नहीं करेगा।
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