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एक्सप्लेनर: ट्रंप से मुलाकात में चीन के लिए क्या चाहते हैं जिनपिंग, दोनों साथ आए तो भारत पर होगा कैसा असर?
Wed, 23 Sep 2026 06:31 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 23 Sep 2026 06:31 PM IST
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सार
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'ट्रंप-शी जिनपिंग की बैठक में कई ज्वलंत मुद्दों पर होगी चर्चा।
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विस्तार
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग बुधवार को जब अमेरिका पहुंचेंगे तो एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने के लिए खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मौजूद रहेंगे। दरअसल, जिनपिंग का अमेरिका का दौरा एक दशक से भी ज्यादा समय में किसी चीनी राष्ट्रपति का पहला आधिकारिक दौरा होगा। इस दौरान जिनपिंग और ट्रंप के बीच व्हाइट हाउस में उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठक होगी, जिसमें दुनिया को प्रभावित करने वाले कई मुद्दों पर गहराई से चर्चा होगी।ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे का कार्यक्रम क्या होगा? उनके और डोनाल्ड ट्रंप के बीच कितनी बार मुलाकात होनी है और इसमें कौन-कौन शामिल होगा? दोनों के बीच किन-किन मुद्दों पर गहराई से चर्चा होगी, जिनका दुनिया पर असर होना तय है? क्यों भारत इस बैठक पर करीब से नजर रखेगा? आइये जानते हैं...
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे का क्या कार्यक्रम?
जिनपिंग का अमेरिकी दौरा 23 सितंबर से 25 सितंबर तक तीन दिनों का है। इस दौरान उनके कई कार्यक्रम तय हैं।
अमेरिका-चीन के राष्ट्रपतियों के बीच मुलाकात।
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ट्रंप-जिनपिंग के बीच मुलाकातों का दौर।
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अमेरिका में टेक दिग्गजों से मिलेंगे शी जिनपिंग।
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इस यात्रा के दौरान शी जिनपिंग के साथ चीन के प्रमुख उद्योगपतियों का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद है, जिसमें इलेक्ट्रिक कार निर्माता कंपनी- बीवाईडी जैसे कई विनिर्माण कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हैं।
ट्रंप-शी के बीच वार्ता के मुद्दे।
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ट्रंप-शी के बीच वार्ता के मुद्दे।
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क्यों भारत इस बैठक पर करीब से नजर रखेगा?
भारत के लिए ट्रंप-शी के बीच होने वाला शिखर सम्मेलन बेहद अहम रहने वाला है। नई दिल्ली इस बैठक पर कई आर्थिक, औद्योगिक और भू-राजनीतिक वजहों से करीब से नजर रखेगा।1. 'चीन+1' रणनीति और विदेशी निवेश
अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव के कारण वैश्विक कंपनियों (जैसे एपल, फॉक्सकॉन) ने अपने विनिर्माण का विस्तार भारत में करना शुरू किया था। अगर इस बैठक में ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच टैरिफ में कटौती या एक लंबा व्यापारिक युद्धविराम हो जाता है, तो विदेशी कंपनियों की ओर से चीन से भारत में उत्पादन स्थानांतरित करने की गति अस्थायी रूप से धीमी हो सकती है।
2. भारतीय उद्योगों की आपूर्ति श्रृंखला
भारत की पीएलआई योजनाओं के तहत चल रहे इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल विनिर्माण केंद्र भारी मात्रा में चीन से आयातित कंपोनेंट्स, प्रोसेसिंग उपकरण और कच्चे सामान पर निर्भर हैं। अगर यह शिखर सम्मेलन विफल होता है और अमेरिका-चीन में फिर से व्यापार युद्ध भड़कता है, तो भारतीय उद्योगों को सप्लाई चेन में रुकावट और लागत में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, अगर सबकुछ ठीक रहता है तो चीन अपने बाजार को और स्वतंत्र रूप से खोल सकता है।
3. दुर्लभ खनिज और ग्रीन एनर्जी
भारत के सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) क्षेत्र चीन से मिलने वाले रेयर अर्थ मैग्नेट और अहम खनिजों पर निर्भर हैं, जिसका चीन सबसे बड़ा स्रोत है। अगर बैठक सफल रहती है तो दुनिया के लिए दुर्लभ खनिज पाने का रास्ता खुला रहेगा। हालांकि, अगर अमेरिकी धमकियों के बाद चीन दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लागू करता है, तो भारतीय निर्माताओं के सामने कच्चे माल की भारी कमी हो सकती है। इसकी एक वजह यह है कि भारत से जाने वाले कई इलेक्ट्रॉनिक, ग्रीन एनर्जी उपकरण और ऑटो उत्पादों में भी चीन के दुर्लभ खनिजों का इस्तेमाल होता है। इसलिए चीन, भारत को भी इनकी सप्लाई रोक सकता है।
4. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और टेक मानक
अमेरिका और चीन दुनिया की दो प्रमुख तकनीक महाशक्तियां हैं। अगर वे एआई की सीमाएं या टेक मानकों पर द्विपक्षीय समझौते करते हैं या फिर उनके बीच तकनीक का विभाजन बढ़ता है, तो भारत के विशाल आईटी क्षेत्र और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) को नए अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार ढलना होगा।
भारत के सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) क्षेत्र चीन से मिलने वाले रेयर अर्थ मैग्नेट और अहम खनिजों पर निर्भर हैं, जिसका चीन सबसे बड़ा स्रोत है। अगर बैठक सफल रहती है तो दुनिया के लिए दुर्लभ खनिज पाने का रास्ता खुला रहेगा। हालांकि, अगर अमेरिकी धमकियों के बाद चीन दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लागू करता है, तो भारतीय निर्माताओं के सामने कच्चे माल की भारी कमी हो सकती है। इसकी एक वजह यह है कि भारत से जाने वाले कई इलेक्ट्रॉनिक, ग्रीन एनर्जी उपकरण और ऑटो उत्पादों में भी चीन के दुर्लभ खनिजों का इस्तेमाल होता है। इसलिए चीन, भारत को भी इनकी सप्लाई रोक सकता है।
4. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और टेक मानक
अमेरिका और चीन दुनिया की दो प्रमुख तकनीक महाशक्तियां हैं। अगर वे एआई की सीमाएं या टेक मानकों पर द्विपक्षीय समझौते करते हैं या फिर उनके बीच तकनीक का विभाजन बढ़ता है, तो भारत के विशाल आईटी क्षेत्र और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) को नए अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार ढलना होगा।
5. भारतीय एमएसएमई पर सस्ते आयात का खतरा
अमेरिकी बाजार में अगर चीन के लिए रास्ते कठिन होते हैं, तो चीन अपनी अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता का सामान जैसे- स्टील, रसायन और उपभोक्ता उत्पाद भारत जैसे विकासशील देशों में डंप कर सकता है, जिससे भारतीय छोटे उद्योगों पर दबाव बढ़ेगा।
6. वैश्विक शक्ति संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता
अमेरिका और चीन का यह प्रयास हो सकता है कि वे आपस में दुनिया के नियम तय करें। इसमें ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ जैसे मंचों के जरिए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की भारत की कोशिशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। हालांकि, अगर दोनों देशों में दूरियां बढ़ती हैं तो भारत के सामने खुद को मजबूती से एक ध्रुव के तौर पर स्थापित करने का मौका मिला जाएगा।
अमेरिकी बाजार में अगर चीन के लिए रास्ते कठिन होते हैं, तो चीन अपनी अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता का सामान जैसे- स्टील, रसायन और उपभोक्ता उत्पाद भारत जैसे विकासशील देशों में डंप कर सकता है, जिससे भारतीय छोटे उद्योगों पर दबाव बढ़ेगा।
6. वैश्विक शक्ति संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता
अमेरिका और चीन का यह प्रयास हो सकता है कि वे आपस में दुनिया के नियम तय करें। इसमें ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ जैसे मंचों के जरिए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की भारत की कोशिशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। हालांकि, अगर दोनों देशों में दूरियां बढ़ती हैं तो भारत के सामने खुद को मजबूती से एक ध्रुव के तौर पर स्थापित करने का मौका मिला जाएगा।