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अमेरिका ने कैसे भड़काया ईरान में प्रदर्शन: ट्रंप ने डॉलर को बनाया हथियार, क्यों यह बाकी देशों के लिए 'अलर्ट'
Sat, 14 Feb 2026 06:44 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 14 Feb 2026 06:44 PM IST
सार
ट्रंप सरकार में वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ऐसा क्या कहा है, जिससे दुनिया में हलचल मच गई है? यह डॉलर शॉर्टेज क्या होता है? अमेरिका की यह नीति कितनी कारगर रही है? और अब आगे क्या हो सकता है? आइये जानते हैं...
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ईरान के खिलाफ अमेरिका का बड़ा कदम।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ईरान में नवंबर-दिसंबर से जारी प्रदर्शनों को लेकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने संसद में एक सुनवाई के दौरान बताया कि ईरान में प्रदर्शनों के पीछे अमेरिका का हाथ था। बेसेंट के मुताबिक, वॉशिंगटन ने 'डॉलर की कमी' (डॉलर शॉर्टेज) पैदा कर ईरान की मुद्रा- ईरानी रियाल को ऐतिहासिक निम्नतम स्तर पर पहुंचा दिया और लोगों को सड़कों पर आंदोलन के लिए उतरने पर मजबूर कर दिया।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ट्रंप सरकार में वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ऐसा क्या कहा है, जिससे दुनिया में हलचल मच गई है? यह डॉलर शॉर्टेज क्या होता है? अमेरिका की यह नीति कितनी कारगर रही है? और अब आगे क्या हो सकता है? आइये जानते हैं...
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ट्रंप सरकार में वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ऐसा क्या कहा है, जिससे दुनिया में हलचल मच गई है? यह डॉलर शॉर्टेज क्या होता है? अमेरिका की यह नीति कितनी कारगर रही है? और अब आगे क्या हो सकता है? आइये जानते हैं...
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क्या बोले अमेरिकी वित्त मंत्री, जिससे पूरी दुनिया सतर्क?
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने दावा किया है कि वॉशिंगटन ने ईरान में जानबूझकर डॉलर की कमी पैदा की ताकि वहां की मुद्रा- ईरानी रियाल के मूल्य में भारी गिरावट आए और देश के लोग सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए मजबूर हों। उन्होंने एक संसदीय सुनवाई के दौरान बताया कि अमेरिकी वित्त विभाग की इस रणनीति की वजह से दिसंबर में ईरान का एक सबसे बड़ा बैंक डूब गया, वहां की मुद्रा की कीमत गिर गई और महंगाई में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई।ये भी पढ़ें: ईरान पर कार्रवाई की मांग तेज: रेजा पहलवी ने दुनिया ने नेताओं को चेताया, कहा- चुप्पी साधने से तानाशाही बढ़ती है
उन्होंने इस पूरी रणनीति को इकोनॉमिक स्टेटक्राफ्ट यानी आर्थिक कूटनीति करार दिया है, जिसमें बिना किसी सैन्य कार्रवाई या गोली चलाए दुश्मन देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश की गई है। बेसेंट ने कहा कि इस नीति ने काम किया है, क्योंकि दिसंबर में उनकी अर्थव्यवस्था चरमरा गई। वे आयात करने में सक्षम नहीं हैं और यही कारण रहा कि लोग सड़कों पर उतर आए।
इससे पहले पिछले साल मार्च में बेसेंट ने यह भी बताया था कि अमेरिका ने ईरान के बुनियादी निर्यात ढांचे के खिलाफ प्रतिबंध अभियान को तेज किया है, जिसमें उसकी तेल आपूर्ति शृंखला को निशाना बनाया गया, ताकि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली तक ईरान की पहुंच को बंद किया जा सके।
अब जब किसी भी देश के पास दुनिया के बाकी हिस्सों से अपनी जरूरत की चीजें खरीदने के लिए जरूरत के मुताबिक डॉलर नहीं होते तो यह डॉलर शॉर्टेज कहलाता है।
यह डॉलर शॉर्टेज क्या होता है?
डॉलर शॉर्टेज का सीधा मतलब है 'डॉलर की कमी' पैदा करना। चूंकि डॉलर इस वक्त दुनिया की सबसे प्रचलित और केंद्रीय मुद्रा है, इसलिए अधिकतर देश अपने व्यापार (आयात-निर्यात) के लिए इसी के जरिए लेन-देन करते हैं। खासकर तेल, सोना, मशीनरी की खरीद-बिक्री और कर्ज के भुगतान के लिए। इसलिए देशों को इसकी लगातार आपूर्ति की जरूरत होती है।अब जब किसी भी देश के पास दुनिया के बाकी हिस्सों से अपनी जरूरत की चीजें खरीदने के लिए जरूरत के मुताबिक डॉलर नहीं होते तो यह डॉलर शॉर्टेज कहलाता है।
अमेरिका ने कैसे डॉलर शॉर्टेज से ईरान की अर्थव्यवस्था को तोड़ा?
1. ईरान में डॉलर पहुंचने से रोकाजब किसी देश का निर्यात गिर जाता है या प्रतिबंधों की वजह से उसकी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली तक पहुंच बाधित हो जाती है, तो उसे डॉलर में लेनदेन में दिक्कत आती है। ईरान के मामले में अमेरिका ने उसके तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर और अपने बैंकिंग चैनलों को बंद करके जानबूझकर यह स्थिति पैदा की, ताकि नए डॉलर ईरान के बाजार में न आ सकें और उसके मौजूदा डॉलर के भंडार विदेशों में ही फंस जाएं।
2. ईरानी मुद्रा में गिरावट आई
जब किसी देश के पास डॉलर कम हो जाते हैं, तो स्थानीय मुद्रा, जैसे ईरान के रियाल की कीमत तेजी से गिरने लगती है। जैसा ईरान में रियाल की कीमत में भारी गिरावट आई और यह रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। नवंबर से लेकर अब तक एक डॉलर के मुकाबले रियाल 12 लाख से 14 लाख के निम्नतम स्तर के बीच झूलता रहा है।
3. आयात में हुई कमी और महंगाई बढ़ी
जर्मनी की मारबर्ग यूनिवर्सिटी से जुड़े अर्थशास्त्री मोहम्मद रजा फर्जानेगन ने अल-जजीरा को बताया कि डॉलर की कमी के कारण आमतौर पर देश बाहर से सामान मंगवाने (आयात करने) में असमर्थ हो जाते हैं। बहुत ही कम देश डॉलर के अलावा किसी और करेंसी में खरीद की सुविधा देते हैं। ऐसे में जब ईरान के पास दूसरे देशों से उत्पाद खरीदने के लिए डॉलर की भारी कमी आई तो आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ गई। नतीजतन ईरान में महंगाई भी आसमान पर पहुंच गई। ईरान में महंगाई दर 40 फीसदी पर है। दूसरी तरफ खाद्य पदार्थों की कीमतों में पिछले वर्ष की तुलना में औसतन 72 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई।
ये भी पढ़ें: Iran-US Clash: '47 साल से सिर्फ बातचीत होती रही, इसे हमेशा के लिए सुलझा देंगे', ईरान को ट्रंप की धमकी
जर्मनी की मारबर्ग यूनिवर्सिटी से जुड़े अर्थशास्त्री मोहम्मद रजा फर्जानेगन ने अल-जजीरा को बताया कि डॉलर की कमी के कारण आमतौर पर देश बाहर से सामान मंगवाने (आयात करने) में असमर्थ हो जाते हैं। बहुत ही कम देश डॉलर के अलावा किसी और करेंसी में खरीद की सुविधा देते हैं। ऐसे में जब ईरान के पास दूसरे देशों से उत्पाद खरीदने के लिए डॉलर की भारी कमी आई तो आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ गई। नतीजतन ईरान में महंगाई भी आसमान पर पहुंच गई। ईरान में महंगाई दर 40 फीसदी पर है। दूसरी तरफ खाद्य पदार्थों की कीमतों में पिछले वर्ष की तुलना में औसतन 72 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई।
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4. उत्पादन पर भी पड़ने लगा असर
अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते ईरान उन मशीनों और कच्चे माल के लिए डॉलर में भुगतान नहीं कर पा रहा जो घरेलू उत्पादन के लिए बेहद जरूरी होते हैं। इस स्थिति को 'इम्पोर्ट कम्प्रेशन' कहा जाता है यानी आयात में सिकुड़न। इसका असर यह हुआ कि ईरान में दवा जैसी मानवीय जरूरतों का आयात मुश्किल हो गया और लोगों में गुस्सा बढ़ता चला गया।
कुल मिलाकर अमेरिका ने ईरान में डॉलर शॉर्टेज पैदा कर ऐसे हालात बना दिए कि विदेशी मुद्रा की कमी से पूरा वित्तीय तंत्र चरमरा गया। इससे न सिर्फ ईरान की मुद्रा गिरी, बल्कि महंगाई बढ़ी, लोगों की खरीद की शक्ति प्रभावित हुई और उन्होंने जो सेविंग्स (बचत) की थी, उसकी कीमत भी नहीं रही।
अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते ईरान उन मशीनों और कच्चे माल के लिए डॉलर में भुगतान नहीं कर पा रहा जो घरेलू उत्पादन के लिए बेहद जरूरी होते हैं। इस स्थिति को 'इम्पोर्ट कम्प्रेशन' कहा जाता है यानी आयात में सिकुड़न। इसका असर यह हुआ कि ईरान में दवा जैसी मानवीय जरूरतों का आयात मुश्किल हो गया और लोगों में गुस्सा बढ़ता चला गया।
कुल मिलाकर अमेरिका ने ईरान में डॉलर शॉर्टेज पैदा कर ऐसे हालात बना दिए कि विदेशी मुद्रा की कमी से पूरा वित्तीय तंत्र चरमरा गया। इससे न सिर्फ ईरान की मुद्रा गिरी, बल्कि महंगाई बढ़ी, लोगों की खरीद की शक्ति प्रभावित हुई और उन्होंने जो सेविंग्स (बचत) की थी, उसकी कीमत भी नहीं रही।
5. भड़का जन आक्रोश और विरोध प्रदर्शन
इस गंभीर आर्थिक संकट की वजह से दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में ईरान में बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए, जो 1979 की क्रांति के बाद के सबसे बड़े प्रदर्शन माने जा रहे हैं। इन प्रदर्शनों को दबाने के लिए की गई सरकार की तरफ से की गई कार्रवाई में कम से कम 150 बच्चों समेत 6,800 से अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस स्थिति ने आम ईरानियों को इतना गरीब बना दिया है कि अब उनके लिए किसी सफल क्रांति की तुलना में दिन-प्रतिदिन का अस्तित्व बचाना पहली प्राथमिकता बन गया है।
इस गंभीर आर्थिक संकट की वजह से दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में ईरान में बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए, जो 1979 की क्रांति के बाद के सबसे बड़े प्रदर्शन माने जा रहे हैं। इन प्रदर्शनों को दबाने के लिए की गई सरकार की तरफ से की गई कार्रवाई में कम से कम 150 बच्चों समेत 6,800 से अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस स्थिति ने आम ईरानियों को इतना गरीब बना दिया है कि अब उनके लिए किसी सफल क्रांति की तुलना में दिन-प्रतिदिन का अस्तित्व बचाना पहली प्राथमिकता बन गया है।
ईरान में क्या है मौजूद स्थिति?
अमेरिका और ईरान के बीच वर्तमान में तनाव कम करने के लिए बातचीत चल रही है। इस बीच अरब सागर में एक अमेरिकी नौसैनिक बेड़ा तैनात है। दूसरी तरफ ट्रंप ने एक और युद्धक बेड़ा ईरान की तरफ भेजने का आदेश दिया है।ईरान के लिए अब आगे क्या, अमेरिका क्या चाहता है?
अमेरिका और ईरान के बीच भविष्य की राह तनावपूर्ण और अनिश्चित दिखाई दे रही है, जिसमें दोनों पक्ष एक जटिल 'आर्थिक युद्ध' और कूटनीतिक गतिरोध में फंसे हुए हैं। असल में दोनों ही पक्षों की मांग अलग-अलग है।
ईरान में लक्ष्य हासिल करने के लिए अमेरिका बढ़ा सकता है दबाव
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी अधिकतम दबाव की रणनीति को और कड़ा कर सकते हैं। अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, यह रणनीति आर्थिक कूटनीति का हिस्सा है, हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर संशय जता रहे हैं कि अमेरिका सिर्फ आर्थिक दबाव से अपने लक्ष्य हासिल कर पाएगा।पूर्व अमेरिकी उप-सहायक अटॉर्नी जनरल ब्रूस फेन ने कहा है कि उनका मानना है कि आर्थिक प्रतिबंध शायद ही कभी शासन को गिराने में सफल होते हैं। उनके मुताबिक, ईरानियों की बढ़ती गरीबी सफल क्रांति की संभावना को कम कर देगी, क्योंकि लोगों के लिए दिन-प्रतिदिन का अस्तित्व पहली प्राथमिकता बन जाएगा, न कि विद्रोह।
वहीं, अर्थशास्त्री रजा फरजानेगेन बताते हैं कि ईरान के पास प्रतिबंधों से बचने के लिए एक बहुत ही विकसित तंत्र है, जो इस स्थिति को एक स्थायी चूहे-बिल्ली के खेल में बदल देता है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि पूरी बैंकिंग प्रणाली को निशाना बनाने से भोजन और दवा जैसे मानवीय चैनल भी बेकार हो जाते हैं, जिससे अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक स्थिति जटिल हो सकती है।
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