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जलवायु परिवर्तन: कितनी व्यावहारिक है यूरोप की ‘फिट फॉर फिफ्टी फाइव’ योजना?
Thu, 15 Jul 2021 03:17 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Thu, 15 Jul 2021 03:17 PM IST
सार
इस जलवायु योजना का नाम ‘फिट फॉर फिफ्टी फाइव’ पहल दिया गया है। मसविदे में कहा गया है कि उसमें तय लक्ष्य यूरोपियन ग्रीन डील का हिस्सा हैं, जिनके जरिए साल 2050 तक यूरोप को जलवायु तटस्थ बना दिया जाएगा...
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विस्तार
यूरोपीय आयोग ने दावा किया है कि जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए उसकी तरफ से पेश योजना दुनिया की इस मकसद से बनाई गई सबसे महत्वाकांक्षी योजना है। इसके तहत साल 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 55 फीसदी कटौती करने का लक्ष्य रखा गया है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक अगर इस योजना को स्वीकार कर कदम उठाए गए, तो यूरोप की अर्थव्यवस्था का लगभग हर क्षेत्र इससे प्रभावित होगा।
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जलवायु योजना का मसौदा बुधवार को जारी किया गया। इसके तहत 13 कानूनों का ड्राफ्ट पेश किया गया है, जिनका मकसद प्रदूषण फैलाने वाले आयात पर कर लगाना, जीवाश्म (फॉसिल) ईंधन को चरणबद्ध ढंग से खत्म करना, वैकल्पिक ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देना, वर्तमान उत्सर्जन ट्रेडिंग सिस्टम का विस्तार करना, एक सामाजिक जलवायु कोष बनाना, और अगले दस साल में अक्षय ऊर्जा का उपयोग बढ़ा कर दो गुना करना है।
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इस जलवायु योजना का नाम ‘फिट फॉर फिफ्टी फाइव’ पहल दिया गया है। मसविदे में कहा गया है कि उसमें तय लक्ष्य यूरोपियन ग्रीन डील का हिस्सा हैं, जिनके जरिए साल 2050 तक यूरोप को जलवायु तटस्थ बना दिया जाएगा। जलवायु तटस्थ का मतलब ऐसी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह अपना लेना है, जिससे जलवायु को नुकसान पहुंचाने वाला कोई उत्सर्जन नहीं होगा।
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ये मसौदा जारी करते हुए यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उरसुला वॉन डेर लियेन ने कहा कि जीवाश्म ईंधन पर आधारित अर्थव्यवस्था अपनी सीमा पर पहुंच गई है। हम अगली पीढ़ी के लिए ऐसी दुनिया छोड़ कर जाना चाहते हैं, जो स्वस्थ हो और जहां अच्छी नौकरियों और आर्थिक विकास के अवसर हों।
इस योजना में सबसे अहम बात कार्बन उत्सर्जन को खत्म करने की दिशा में उठाए जाने वाले कदम हैं। इस दिशा में धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ाते हुए 2025 तक लक्ष्य हासिल करने की योजना सामने रखी गई है। इसके तहत सबसे पहले अधिक कार्बन उत्सर्जन से तैयार होने होने वाले उत्पादों के आयात को निशाना बनाया जाएगा। सीमेंट, लौह, इस्पात, एलुमिनियम, उर्वरक, और बिजली ऐसे उत्पाद हैं। बाद में इस लिस्ट में दूसरे उत्पाद भी शामिल किए जाएंगे।
जानकारों का कहना है कि इस कदम से सबसे ज्यादा प्रभावित टर्की, रूस, यूक्रेन, मिस्र और चीन होंगे। ये देश इन उत्पादों के सबसे बड़े निर्यातक हैं। यूरोपीय आयोग ने कहा है कि इन उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से इनके उत्पादक देश उत्सर्जन घटाने और ग्रीन नीतियों को अपनाने के लिए प्रेरित होंगे।
लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इन शुल्कों से उन देशों के साथ ईयू का विवाद खड़ा हो सकता है, जो उसके सदस्य नहीं हैं। ये मामला विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में जा सकता है, क्योंकि नए शुल्क व्यापार में भेदभाव वाले व्यवहार की परिभाषा के तहत आ सकते हैँ। आलोचकों ने कहा है कि यूरोपीय आयोग ने अति महत्वाकांक्षी योजना बना ली है, जिस पर अमल आसान नहीं होगा। मसलन, अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने की योजना पर लक्जमबर्ग, माल्टा और नीदरलैंड्स जैसे देशों को एतराज हो सकता है, जिनके यहां कुल ऊर्जा उपभोग में अक्षय ऊर्जा की मात्रा अभी दस फीसदी भी नहीं है।
वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू की एक टिप्पणी में कहा गया है कि ये योजना ऐसी दुनिया के लिए है, जो आदर्श स्थिति में हो। वैसी दुनिया में ईयू के लिए सदस्य देशों को यह समझना आसान रहता कि कार्बन उत्सर्जन की कीमत सभी लोग समान रूप से उठा रहे हैं। लेकिन फिलहाल, यह साफ नहीं है कि ईयू के सदस्य देश यूरोपीय आयोग को नई व्यवस्था के तहत अपने अंदरूनी मामलों की निगरानी का अधिकार देने को राजी होंगे।