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रूस पर सख्ती से क्यों पीछे हटे ट्रंप?: प्रतिबंधों में छूट से भड़के जेलेंस्की, मॉस्को ने बताया ऐतिहासिक फैसला

Sun, 18 Oct 2026 07:37 AM IST
निर्मल कांत अमर उजाला नेटवर्क, वॉशिंगटन/कीव।
अमर उजाला नेटवर्क, वॉशिंगटन/कीव। Published by: निर्मल कांत Updated Sun, 18 Oct 2026 07:37 AM IST
सार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर नए शुल्क लगाने और रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर भारी आर्थिक दंड से जुड़े दो प्रावधानों को फिलहाल लागू करने से छूट दे दी है। इस फैसले से यूक्रेन नाराज है, जबकि रूस ने इसे ऐतिहासिक बताया है। आखिर ईंधन संकट के बीच अमेरिका ने रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति क्यों बदली? पढ़िए इस रिपोर्ट में।

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ईंधन की कीमतों के दबाव में बदला अमेरिका का रुख? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा फैसले से बड़ा झटका लगा है। ट्रंप ने रूस पर नए शुल्क लगाने और रूसी ऊर्जा के प्रमुख खरीदार देशों पर भारी आर्थिक दंड लगाने से जुड़े एक नए कानून के दो अहम प्रावधानों को फिलहाल लागू नहीं करने का निर्णय लिया है। अमेरिका के इस कदम से यूक्रेन की चिंता बढ़ गई है, जबकि रूस ने इसे अपने लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक और आर्थिक घटनाक्रम बताया है। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने फैसले को गलत ठहराते हुए कहा है कि इससे रूस को ही फायदा होगा और युद्ध जारी रखने का उसका हौसला बढ़ेगा।
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सीएनबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक यह छूट अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है। यह फैसला कानून के प्रावधानों को लागू करने की निर्धारित समयसीमा से महज दो दिन पहले आया। हालांकि, इससे रूस पर पहले से लागू अमेरिकी प्रतिबंध समाप्त नहीं हुए हैं।जिस कानून के प्रावधानों को लागू करने से ट्रंप ने छूट दी है, उसका नाम लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 है। दक्षिण कैरोलिना के रिपब्लिकन सीनेटर रहे दिवंगत लिंडसे ग्राहम इस कानून के प्रमुख समर्थक थे। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को इसे पारित किया था और दो दिन बाद ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दिया था। रूस की ओर से यूक्रेन के खिलाफ जारी व्यापक सैन्य अभियान की आर्थिक कीमत बढ़ाना इसका प्रमुख उद्देश्य था।कानून के तहत राष्ट्रपति को इसके लागू होने के 30 दिनों के भीतर अमेरिका में आयात होने वाली सभी रूसी वस्तुओं पर 500 प्रतिशत तक शुल्क बढ़ाने की व्यवस्था करनी थी। इसके अलावा, रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों में शामिल देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का प्रावधान भी था। इस व्यवस्था की जद में चीन और भारत जैसे देश आ सकते थे, जो रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार हैं।
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ट्रंप के ताजा आदेश ने इन दोनों प्रावधानों को फिलहाल लागू करने से छूट दे दी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत या चीन पर इस कानून के तहत 100 प्रतिशत शुल्क लगा दिया गया था और अब उसे हटा लिया गया है। वास्तव में, संबंधित प्रावधानों को लागू करने से पहले ही छूट दी गई है। आदेश में रूस पर पहले के कार्यकारी आदेशों के तहत लागू प्रतिबंधों को बरकरार रखा गया है।
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जेलेंस्की बोले- रूस को ही मिलेगा सबसे अधिक फायदा
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने शनिवार को अमेरिकी फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि प्रतिबंधों को रोकना या उनके प्रभाव को कम करना गलत कदम है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि इस फैसले से केवल रूस को मदद मिलेगी। उनके मुताबिक, इससे रूसी नेतृत्व का आत्मविश्वास बढ़ेगा और लोगों की जान लेने का सिलसिला जारी रखने की उसकी इच्छा को बल मिलेगा।जेलेंस्की ने यह आशंका भी जताई कि रूस को मिलने वाली राहत केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी। उन्होंने कहा कि डीजल से जुड़े समझौते और ग्राहम कानून के प्रावधानों को रोकने का फैसला शायद इसकी शुरुआत भर हैं। उनके अनुसार, आगे गैस, अन्य क्षेत्रों, बैंकिंग व्यवस्था, कुछ व्यक्तियों और रासायनिक उद्योग से जुड़े प्रतिबंधों में भी ढील दी जा सकती है।

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ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के नेताओं के शिखर सम्मेलन के दौरान भी जेलेंस्की ने अमेरिकी नीति में संभावित बदलावों को लेकर चिंता जताई थी। उनका कहना था कि रूस के खिलाफ प्रतिबंधों में लगातार राहत मिलने से युद्ध रोकने के लिए मॉस्को पर बनाया गया आर्थिक दबाव कमजोर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यूक्रेन अब भी अमेरिकी सैन्य तकनीक और खुफिया सूचनाओं पर निर्भर है, हालांकि वह इनके विकल्प विकसित करने की कोशिश कर रहा है।

मॉस्को ने फैसले को बताया ऐतिहासिक
अमेरिका के इस कदम का रूस ने स्वागत किया है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आर्थिक दूत किरिल दिमित्रिएव ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कहा कि ग्राहम कानून के कुछ प्रावधानों को स्थगित किया जाना महत्वपूर्ण और वास्तव में ऐतिहासिक क्षण है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और रूस के बीच आर्थिक संवाद तथा शांति स्थापित करने के प्रयास जारी रहेंगे।इसके उलट, अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसद रिचर्ड ब्लूमेंथल ने ट्रंप के फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई। ग्राहम कानून का मसौदा तैयार करने में भूमिका निभाने वाले ब्लूमेंथल ने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति का कदम रूस की युद्ध मशीन को मदद पहुंचाने वाला है। उन्होंने कहा कि यह अमेरिकी जनता, कांग्रेस के दोनों सदनों में उसके प्रतिनिधियों और यूरोपीय सहयोगियों की स्थिति के विपरीत है।

ईंधन संकट के बीच बदली अमेरिकी रणनीति
रूस पर प्रतिबंधों में ताजा छूट ऐसे समय दी गई है, जब ईरान में युद्ध के कारण ईंधन आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। ट्रंप प्रशासन ने इससे पहले रूसी डीजल के निर्यात पर लागू प्रतिबंधों में भी अस्थायी राहत दी थी, जो अप्रैल 2027 तक प्रभावी रहने वाली है। इस फैसले का उद्देश्य आपूर्ति में आई बाधाओं से पैदा हुई परेशानी को कम करना बताया गया है।अमेरिका में पेट्रोल और अन्य ईंधनों की कीमतें राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील मुद्दा हैं। तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले ईंधन की महंगाई ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है। पार्टी को कांग्रेस के दोनों सदनों में मामूली बहुमत हासिल है।रूस की तेल बिक्री से होने वाली आय उसके युद्ध खर्च के वित्तपोषण का महत्वपूर्ण स्रोत है। ऐसे में रूसी ऊर्जा कारोबार और उसके प्रमुख खरीदारों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की व्यवस्था को रोकना यूक्रेन के लिए चिंता का विषय है। हालांकि, ट्रंप के फैसले से रूस पर पहले से लागू सभी प्रतिबंध समाप्त नहीं हुए हैं और न ही इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका भविष्य में रूस के साथ आर्थिक संबंधों को किस सीमा तक सामान्य करेगा।

फिलहाल, इस फैसले ने अमेरिकी रूस नीति को लेकर नया सवाल खड़ा कर दिया है। एक ओर वाशिंगटन ईंधन आपूर्ति और घरेलू कीमतों के दबाव से निपटने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यूक्रेन और उसके यूरोपीय सहयोगियों की चिंता है कि प्रतिबंधों में राहत से रूस पर युद्ध समाप्त करने के लिए दबाव कम हो सकता है।

 

 ट्रंप ने रूस पर प्रतिबंधों में छूट क्यों दी?

अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और अमेरिकी रणनीतिक हितों के संदर्भ में संभावित कारण।

1. ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण का दबाव
ईरान युद्ध से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने और ईंधन की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ने के बीच अमेरिका आपूर्ति संकट को और गहराने से रोकना चाहता है। रूसी डीजल निर्यात पर पहले दी गई अस्थायी छूट भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

2. भारत और चीन के साथ व्यापारिक टकराव से बचाव
रूस से तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने से अमेरिका के भारत और चीन के साथ आर्थिक संबंधों में तनाव बढ़ सकता था। इससे व्यापारिक जवाबी कार्रवाई और वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर दबाव का जोखिम पैदा होता।

3. रूस के साथ बातचीत की गुंजाइश बनाए रखना
मॉस्को के साथ आर्थिक संवाद और शांति प्रयास जारी रखने की बात रूसी राष्ट्रपति के आर्थिक दूत ने कही है। प्रतिबंधों में सीमित राहत बातचीत के लिए जगह बना सकती है, हालांकि ट्रंप ने इसे शांति वार्ता से सीधे जोड़कर स्पष्ट कारण नहीं बताया है।

4. तीन नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले ईंधन की कीमतें ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के लिए संवेदनशील मुद्दा हैं। महंगा ईंधन मतदाताओं की नाराजगी बढ़ा सकता है। इसलिए ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव कम करना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

5. प्रतिबंधों की लागत और प्रभाव का संतुलन
रूसी वस्तुओं पर 500 प्रतिशत तक शुल्क लगाने और रूसी ऊर्जा के प्रमुख खरीदारों पर भारी शुल्क लगाने से वैश्विक व्यापार प्रभावित होने की आशंका थी। ट्रंप प्रशासन ने फिलहाल इन दो प्रावधानों को लागू करने से छूट दी है, जबकि पहले के प्रतिबंध बरकरार रखे हैं।

6. रूस नीति में व्यावहारिकता बनाम यूक्रेन का दबाव
वाशिंगटन के सामने ऊर्जा बाजार स्थिर रखने, रूस पर दबाव बनाए रखने और यूक्रेन को समर्थन देने के बीच संतुलन की चुनौती है। जेलेंस्की की आलोचना बताती है कि प्रतिबंधों में राहत को कीव रूस के खिलाफ दबाव कमजोर होने के रूप में देख रहा है।

रूस पर नरमी से बदल सकते हैं वैश्विक शक्ति-संतुलन के समीकरण


अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सामरिक रणनीति और ऊर्जा सुरक्षा पर संभावित असर।

1. रूस को युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक गुंजाइश
रूस की सरकारी आय में तेल और गैस से होने वाली कमाई की अहम भूमिका है। रूसी ऊर्जा के खरीदार देशों पर प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क लागू नहीं होने से उन देशों के लिए रूस से कारोबार जारी रखना आसान हो सकता है। इससे मॉस्को की ऊर्जा आय पर दबाव सीमित रहने की संभावना है। हालांकि, केवल इस फैसले के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि रूस की युद्ध क्षमता में तत्काल वृद्धि होगी।
विशेषज्ञ दृष्टिकोण: अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के प्रभाव का आकलन करने वाले अर्थशास्त्रियों के अनुसार, प्रतिबंधों की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रमुख खरीदार, वित्तीय संस्थान और व्यापारिक साझेदार उनका कितना पालन करते हैं।

2. यूक्रेन की रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ने का जोखिम
यूक्रेन की रणनीति में रूस की युद्ध क्षमता को आर्थिक रूप से कमजोर करना महत्वपूर्ण है। यदि रूस की ऊर्जा बिक्री पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता, तो कीव की इस रणनीति को अपेक्षित लाभ मिलने में देरी हो सकती है। जेलेंस्की की नाराजगी इसी चिंता को दर्शाती है। फिर भी, अमेरिकी सैन्य सहायता, खुफिया सहयोग और यूरोपीय प्रतिबंधों की स्थिति भी युद्ध के सामरिक समीकरण तय करेगी।
विशेषज्ञ दृष्टिकोण: सैन्य और सुरक्षा विश्लेषकों के लिए मुख्य सवाल यह होगा कि क्या आर्थिक प्रतिबंधों में राहत के साथ पश्चिमी सैन्य सहायता की नीति में भी बदलाव आता है। फिलहाल प्रस्तुत रिपोर्ट से ऐसा निष्कर्ष नहीं निकलता।

3.अमेरिका-रूस संबंधों में सीमित सुधार की संभावना
रूसी राष्ट्रपति के आर्थिक दूत किरिल दिमित्रिएव ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए आर्थिक संवाद और शांति प्रयास जारी रहने की बात कही है। इससे दोनों देशों के बीच सीमित आर्थिक संपर्क और कूटनीतिक बातचीत के लिए जगह बन सकती है। हालांकि, प्रतिबंधों में छूट अपने आप में व्यापक रणनीतिक समझौते या संबंधों के सामान्य होने का प्रमाण नहीं है।

विशेषज्ञ दृष्टिकोण: अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विश्लेषक ऐसे कदमों को तभी बड़े नीतिगत बदलाव का संकेत मानेंगे, जब इनके साथ वार्ता, सुरक्षा आश्वासन या युद्ध समाप्त करने की दिशा में ठोस प्रगति दिखाई दे।


4-पश्चिमी गठबंधन में नीतिगत मतभेद उभरने की आशंका
यूक्रेन इस फैसले का विरोध कर रहा है, जबकि रूस ने इसका स्वागत किया है। यदि अमेरिका प्रतिबंधों में राहत देता है और यूरोपीय देश रूस पर दबाव बनाए रखते हैं, तो पश्चिमी देशों की रणनीति में अंतर बढ़ सकता है। इससे मॉस्को को कूटनीतिक अवसर मिल सकता है। लेकिन यूरोपीय देशों की वास्तविक नीति और प्रतिबंधों में किसी बदलाव के प्रमाण के बिना गठबंधन में दरार पड़ने को तयशुदा परिणाम नहीं माना जा सकता।

विशेषज्ञ दृष्टिकोण: सामरिक मामलों के विश्लेषकों के लिए महत्वपूर्ण संकेत यह होगा कि अमेरिका और यूरोप रूस पर दबाव, यूक्रेन को सहायता और संभावित शांति वार्ता के मामले में कितना साझा रुख बनाए रखते हैं।
 
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