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रूस को डीजल निर्यात से कितनी कमाई होगी: युद्ध पर कितना असर पड़ेगा; क्या यूक्रेन की मुश्किलें बढ़ेंगी?
Sun, 18 Oct 2026 07:53 AM IST
निर्मल कांत
अमर उजाला नेटवर्क, वॉशिंगटन/कीव।
अमर उजाला नेटवर्क, वॉशिंगटन/कीव।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sun, 18 Oct 2026 07:53 AM IST
सार
रूस को 48 लाख मीट्रिक टन डीजल की आपूर्ति से वैश्विक कीमतों पर बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है, लेकिन इससे मॉस्को को पश्चिमी देशों से और रियायतों की उम्मीद बढ़ सकती है। क्या अमेरिकी सैन्य तकनीक और खुफिया सहायता पर यूक्रेन की निर्भरता उसके लिए कितनी बड़ी चुनौती बन सकती है? पढ़िए इस रिपोर्ट में।
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क्या यूरोप बन पाएगा अमेरिकी मदद का विकल्प?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विस्तार
रूस को डीजल निर्यात की अनुमति देने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में कीमतों पर बहुत बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है, लेकिन इस फैसले के रणनीतिक परिणाम कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं। सीएनबीसी और अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विशेषज्ञों का आकलन है कि इस व्यवस्था से रूस को अतिरिक्त निर्यात आय तो मिलेगी, लेकिन उसके संघीय बजट को होने वाला लाभ सीमित रहेगा। इसके बावजूद मॉस्को इसे पश्चिमी दबाव में कमी और भविष्य में और रियायतें हासिल करने की संभावना के रूप में देख सकता है। दूसरी ओर, अमेरिकी सैन्य तकनीक और खुफिया सहायता पर यूक्रेन की निर्भरता युद्ध के मैदान में उसकी स्थिति को प्रभावित कर सकती है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब रूस-यूक्रेन युद्ध में ऊर्जा प्रतिष्ठानों, ड्रोन और नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की रणनीति महत्वपूर्ण बनी हुई है। ऐसे में डीजल कारोबार से मिलने वाली अतिरिक्त आय के मुकाबले यह सवाल अधिक अहम है कि क्या अमेरिकी नीतिगत फैसले रूस की युद्ध संबंधी गणना और यूक्रेन की रक्षा क्षमता को प्रभावित करेंगे।
रूस को 1.25 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त निर्यात आय का अनुमान
सीएनबीसी से बातचीत में नेस्ट सेंटर के वरिष्ठ शोधकर्ता सर्गेई अलेक्शेंको ने अनुमान लगाया कि समझौते के शुरुआती चरण में शामिल 18 लाख मीट्रिक टन डीजल से रूस को तीन महीने में 1.25 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त निर्यात आय हो सकती है। यह उस अवधि में रूस के कुल जिंस निर्यात राजस्व का लगभग एक प्रतिशत है।हालांकि, निर्यात से होने वाली कमाई का पूरा हिस्सा सरकारी खजाने में नहीं पहुंचता। अलेक्शेंको के मुताबिक रूसी संघीय बजट को इससे मिलने वाला अतिरिक्त लाभ 30 मिलियन डॉलर प्रतिमाह से कम रह सकता है। यह रूस के मासिक संघीय राजस्व के 0.07 प्रतिशत से भी कम है। इस आकलन से स्पष्ट है कि डीजल समझौता रूस की युद्ध संबंधी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने वाला निर्णायक स्रोत नहीं बनता।समझौते के तहत कुल 48 लाख मीट्रिक टन डीजल की आपूर्ति का प्रावधान है। यह मात्रा अमेरिका की घरेलू डीजल मांग के लगभग दस दिन या वैश्विक मांग के करीब एक दिन के बराबर बताई गई है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के तेल उद्योग और बाजार प्रभाग के पूर्व प्रमुख नील एटकिंसन ने सीएनबीसी से कहा कि इतनी कम आपूर्ति से बाजार की कीमतों पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।
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ये भी पढ़ें: इटली में महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हिंसक: मेलोनी बोलीं- विरोध करना अधिकार, शहरों को आग के हवाले करना नहीं
डीजल की कीमतें परिवहन, कृषि और माल ढुलाई की लागत को प्रभावित करती हैं। हालांकि, वैश्विक कीमतों में वास्तविक बदलाव केवल अतिरिक्त आपूर्ति पर नहीं, बल्कि मांग, उपलब्ध भंडार, दूसरे उत्पादक देशों की आपूर्ति और भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा।
पुतिन को आर्थिक से अधिक राजनीतिक लाभ
रूस के लिए इस व्यवस्था का बड़ा फायदा राजनीतिक हो सकता है। अलेक्शेंको के मुताबिक, प्रतिबंधों के दबाव में कमी और पश्चिमी देशों की एकजुटता कमजोर पड़ना मॉस्को के लिए अतिरिक्त राजस्व से अधिक महत्वपूर्ण है।सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज की वरिष्ठ फेलो मारिया स्नेगोवाया ने कहा कि इस तरह की रियायतें रूस के इस विश्वास को मजबूत कर सकती हैं कि यूक्रेन पर दबाव बनाए रखने से भविष्य में पश्चिमी देशों से और छूट हासिल की जा सकती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि रूस को तत्काल कोई निर्णायक सैन्य बढ़त मिल गई है। असल जोखिम यह है कि यदि मॉस्को को लगे कि आर्थिक दबाव के बावजूद उसे बिना किसी बड़े समझौते के राहत मिल सकती है, तो युद्ध समाप्त करने के लिए रियायत देने की उसकी प्रेरणा कमजोर पड़ सकती है।रूस के लिए तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों से होने वाली आय सरकारी वित्त और सैन्य खर्च को सहारा देती है। हालांकि, युद्ध के वित्तपोषण पर डीजल समझौते का वास्तविक असर सीमित रहने का अनुमान है। इसलिए इस घटनाक्रम को रूस की आर्थिक स्थिति में बड़े सुधार के बजाय पश्चिमी दबाव की प्रभावशीलता से जुड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
स्टारलिंक पर पाबंदियां यूक्रेन के लिए क्यों अहम?
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यूक्रेन की सैन्य तकनीक और खुफिया सहायता पर निर्भरता है। रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन में स्पेसएक्स की सैन्य-केंद्रित स्टारशील्ड सेवा पर प्रतिबंध लगाए जाने की खबरें सामने आई हैं। कंपनी के प्रमुख एलन मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कहा कि नेटवर्क पर पाबंदियों से जुड़े फैसलों की अंतिम जिम्मेदारी अमेरिकी सरकार और राष्ट्रपति की है।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने तीन अधिकारियों के हवाले से बताया कि यूक्रेन में स्टारशील्ड के इस्तेमाल को सीमित करने का आदेश व्हाइट हाउस के भीतर से आया था। इस दावे पर सीएनबीसी ने व्हाइट हाउस से प्रतिक्रिया मांगी थी।
रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेनी अधिकारियों ने दावा किया कि स्टारलिंक की गति पर सीमाएं लगाए जाने के बाद उनकी सेना को कुछ रूसी ड्रोन मार गिराने में कठिनाई हुई। यूक्रेन ने यह भी कहा कि उसे आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों के बारे में सहयोगी देशों से अग्रिम चेतावनी नहीं मिली और इससे नागरिकों की जान गई। इन घटनाओं के सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है।यूक्रेन के पुनर्निर्माण, बुनियादी ढांचे और परिवहन मंत्रालय के प्रथम उपमंत्री सर्ही देरकाच ने सीएनबीसी से कहा कि स्टारलिंक के सैन्य इस्तेमाल पर अमेरिकी सीमाओं से रूस का हौसला बढ़ा है। उनके अनुसार, मॉस्को को यूक्रेन के नागरिक बुनियादी ढांचे पर और अधिक हमले करने का अवसर दिखाई दे रहा है।
ये भी पढ़ें: रूस पर सख्ती से क्यों पीछे हटे ट्रंप?: प्रतिबंधों में छूट से भड़के जेलेंस्की, मॉस्को ने बताया ऐतिहासिक फैसला
इसका सामरिक महत्व इसलिए है, क्योंकि आधुनिक युद्ध में संचार नेटवर्क केवल संदेश भेजने का माध्यम नहीं होते। वे सैन्य इकाइयों के बीच समन्वय, ड्रोन संचालन और युद्धक्षेत्र की सूचनाओं के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि संचार या खुफिया सूचनाओं की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो यूक्रेन की प्रतिक्रिया क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है।
रूस की तेल रिफाइनरियों पर हमलों की रणनीति भी प्रभावित हो सकती है
यूक्रेन ने रूस की तेल रिफाइनरियों पर हमलों के जरिए उसकी ऊर्जा व्यवस्था और युद्ध अर्थव्यवस्था पर लागत बढ़ाने की कोशिश की है। स्नेगोवाया के मुताबिक, यदि अमेरिकी सैन्य और खुफिया सहायता का इस्तेमाल यूक्रेन के रूसी ठिकानों पर हमलों को सीमित करने के दबाव के रूप में किया जाता है, तो इसके परिणाम डीजल समझौते से कहीं अधिक व्यापक हो सकते हैं।हालांकि, इस संभावना को अमेरिकी नीति में स्थापित बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि सैन्य सहायता, खुफिया सूचनाओं और यूक्रेन की हमलावर क्षमताओं पर वास्तव में कौन-सी शर्तें लागू की जाती हैं।यहां आर्थिक और सैन्य पहलू एक-दूसरे से जुड़ते हैं। रूस को ऊर्जा निर्यात से मिलने वाली अतिरिक्त आय सीमित हो सकती है, लेकिन यदि यूक्रेन की रूस की युद्ध संबंधी आर्थिक गतिविधियों को बाधित करने की क्षमता प्रभावित होती है, तो मॉस्को पर पड़ने वाला दबाव घट सकता है। यह असर डीजल से होने वाली कमाई की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
यूरोप के सामने अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने की चुनौती
यूक्रेन और उसके यूरोपीय सहयोगियों के सामने सबसे बड़ी समस्या अमेरिकी सहायता का तत्काल विकल्प तैयार करना है। स्नेगोवाया के मुताबिक खुफिया सूचनाओं और मिसाइल रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में यूरोप तथा यूक्रेन अब भी अमेरिका पर काफी निर्भर हैं। इस निर्भरता को निकट भविष्य में पूरी तरह समाप्त करना कठिन होगा।
यूरोप के लिए चुनौती केवल अधिक हथियार खरीदना नहीं है। उसे खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, हवाई और मिसाइल रक्षा, सुरक्षित सैन्य संचार तथा युद्धक्षेत्र में तकनीकी समन्वय की अपनी क्षमताएं भी मजबूत करनी होंगी। इन व्यवस्थाओं को तैयार करने में समय और बड़े निवेश की जरूरत होगी। विशेषज्ञों के अनुसार रूस के लिए डीजल समझौते का तात्कालिक आर्थिक लाभ सीमित दिखता है, लेकिन इसके राजनीतिक और सामरिक प्रभाव अधिक दूरगामी हो सकते हैं। यदि इससे मॉस्को को पश्चिमी दबाव में कमी का संकेत मिलता है और यूक्रेन की अमेरिकी सहायता पर निर्भरता बनी रहती है, तो युद्ध के समीकरणों पर इसका असर पड़ सकता है। आने वाले समय में असली कसौटी यह होगी कि रूस को मिली आर्थिक राहत का विस्तार कितना होता है और अमेरिका यूक्रेन को सैन्य तथा खुफिया सहायता देने की अपनी नीति में क्या रुख अपनाता है।
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सीएनबीसी से बातचीत में नेस्ट सेंटर के वरिष्ठ शोधकर्ता सर्गेई अलेक्शेंको ने अनुमान लगाया कि समझौते के शुरुआती चरण में शामिल 18 लाख मीट्रिक टन डीजल से रूस को तीन महीने में 1.25 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त निर्यात आय हो सकती है। यह उस अवधि में रूस के कुल जिंस निर्यात राजस्व का लगभग एक प्रतिशत है।हालांकि, निर्यात से होने वाली कमाई का पूरा हिस्सा सरकारी खजाने में नहीं पहुंचता। अलेक्शेंको के मुताबिक रूसी संघीय बजट को इससे मिलने वाला अतिरिक्त लाभ 30 मिलियन डॉलर प्रतिमाह से कम रह सकता है। यह रूस के मासिक संघीय राजस्व के 0.07 प्रतिशत से भी कम है। इस आकलन से स्पष्ट है कि डीजल समझौता रूस की युद्ध संबंधी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने वाला निर्णायक स्रोत नहीं बनता।समझौते के तहत कुल 48 लाख मीट्रिक टन डीजल की आपूर्ति का प्रावधान है। यह मात्रा अमेरिका की घरेलू डीजल मांग के लगभग दस दिन या वैश्विक मांग के करीब एक दिन के बराबर बताई गई है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के तेल उद्योग और बाजार प्रभाग के पूर्व प्रमुख नील एटकिंसन ने सीएनबीसी से कहा कि इतनी कम आपूर्ति से बाजार की कीमतों पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।
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डीजल की कीमतें परिवहन, कृषि और माल ढुलाई की लागत को प्रभावित करती हैं। हालांकि, वैश्विक कीमतों में वास्तविक बदलाव केवल अतिरिक्त आपूर्ति पर नहीं, बल्कि मांग, उपलब्ध भंडार, दूसरे उत्पादक देशों की आपूर्ति और भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा।
पुतिन को आर्थिक से अधिक राजनीतिक लाभ
रूस के लिए इस व्यवस्था का बड़ा फायदा राजनीतिक हो सकता है। अलेक्शेंको के मुताबिक, प्रतिबंधों के दबाव में कमी और पश्चिमी देशों की एकजुटता कमजोर पड़ना मॉस्को के लिए अतिरिक्त राजस्व से अधिक महत्वपूर्ण है।सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज की वरिष्ठ फेलो मारिया स्नेगोवाया ने कहा कि इस तरह की रियायतें रूस के इस विश्वास को मजबूत कर सकती हैं कि यूक्रेन पर दबाव बनाए रखने से भविष्य में पश्चिमी देशों से और छूट हासिल की जा सकती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि रूस को तत्काल कोई निर्णायक सैन्य बढ़त मिल गई है। असल जोखिम यह है कि यदि मॉस्को को लगे कि आर्थिक दबाव के बावजूद उसे बिना किसी बड़े समझौते के राहत मिल सकती है, तो युद्ध समाप्त करने के लिए रियायत देने की उसकी प्रेरणा कमजोर पड़ सकती है।रूस के लिए तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों से होने वाली आय सरकारी वित्त और सैन्य खर्च को सहारा देती है। हालांकि, युद्ध के वित्तपोषण पर डीजल समझौते का वास्तविक असर सीमित रहने का अनुमान है। इसलिए इस घटनाक्रम को रूस की आर्थिक स्थिति में बड़े सुधार के बजाय पश्चिमी दबाव की प्रभावशीलता से जुड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
स्टारलिंक पर पाबंदियां यूक्रेन के लिए क्यों अहम?
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यूक्रेन की सैन्य तकनीक और खुफिया सहायता पर निर्भरता है। रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन में स्पेसएक्स की सैन्य-केंद्रित स्टारशील्ड सेवा पर प्रतिबंध लगाए जाने की खबरें सामने आई हैं। कंपनी के प्रमुख एलन मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कहा कि नेटवर्क पर पाबंदियों से जुड़े फैसलों की अंतिम जिम्मेदारी अमेरिकी सरकार और राष्ट्रपति की है।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने तीन अधिकारियों के हवाले से बताया कि यूक्रेन में स्टारशील्ड के इस्तेमाल को सीमित करने का आदेश व्हाइट हाउस के भीतर से आया था। इस दावे पर सीएनबीसी ने व्हाइट हाउस से प्रतिक्रिया मांगी थी।
रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेनी अधिकारियों ने दावा किया कि स्टारलिंक की गति पर सीमाएं लगाए जाने के बाद उनकी सेना को कुछ रूसी ड्रोन मार गिराने में कठिनाई हुई। यूक्रेन ने यह भी कहा कि उसे आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों के बारे में सहयोगी देशों से अग्रिम चेतावनी नहीं मिली और इससे नागरिकों की जान गई। इन घटनाओं के सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है।यूक्रेन के पुनर्निर्माण, बुनियादी ढांचे और परिवहन मंत्रालय के प्रथम उपमंत्री सर्ही देरकाच ने सीएनबीसी से कहा कि स्टारलिंक के सैन्य इस्तेमाल पर अमेरिकी सीमाओं से रूस का हौसला बढ़ा है। उनके अनुसार, मॉस्को को यूक्रेन के नागरिक बुनियादी ढांचे पर और अधिक हमले करने का अवसर दिखाई दे रहा है।
ये भी पढ़ें: रूस पर सख्ती से क्यों पीछे हटे ट्रंप?: प्रतिबंधों में छूट से भड़के जेलेंस्की, मॉस्को ने बताया ऐतिहासिक फैसला
इसका सामरिक महत्व इसलिए है, क्योंकि आधुनिक युद्ध में संचार नेटवर्क केवल संदेश भेजने का माध्यम नहीं होते। वे सैन्य इकाइयों के बीच समन्वय, ड्रोन संचालन और युद्धक्षेत्र की सूचनाओं के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि संचार या खुफिया सूचनाओं की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो यूक्रेन की प्रतिक्रिया क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है।
रूस की तेल रिफाइनरियों पर हमलों की रणनीति भी प्रभावित हो सकती है
यूक्रेन ने रूस की तेल रिफाइनरियों पर हमलों के जरिए उसकी ऊर्जा व्यवस्था और युद्ध अर्थव्यवस्था पर लागत बढ़ाने की कोशिश की है। स्नेगोवाया के मुताबिक, यदि अमेरिकी सैन्य और खुफिया सहायता का इस्तेमाल यूक्रेन के रूसी ठिकानों पर हमलों को सीमित करने के दबाव के रूप में किया जाता है, तो इसके परिणाम डीजल समझौते से कहीं अधिक व्यापक हो सकते हैं।हालांकि, इस संभावना को अमेरिकी नीति में स्थापित बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि सैन्य सहायता, खुफिया सूचनाओं और यूक्रेन की हमलावर क्षमताओं पर वास्तव में कौन-सी शर्तें लागू की जाती हैं।यहां आर्थिक और सैन्य पहलू एक-दूसरे से जुड़ते हैं। रूस को ऊर्जा निर्यात से मिलने वाली अतिरिक्त आय सीमित हो सकती है, लेकिन यदि यूक्रेन की रूस की युद्ध संबंधी आर्थिक गतिविधियों को बाधित करने की क्षमता प्रभावित होती है, तो मॉस्को पर पड़ने वाला दबाव घट सकता है। यह असर डीजल से होने वाली कमाई की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
यूरोप के सामने अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने की चुनौती
यूक्रेन और उसके यूरोपीय सहयोगियों के सामने सबसे बड़ी समस्या अमेरिकी सहायता का तत्काल विकल्प तैयार करना है। स्नेगोवाया के मुताबिक खुफिया सूचनाओं और मिसाइल रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में यूरोप तथा यूक्रेन अब भी अमेरिका पर काफी निर्भर हैं। इस निर्भरता को निकट भविष्य में पूरी तरह समाप्त करना कठिन होगा।
यूरोप के लिए चुनौती केवल अधिक हथियार खरीदना नहीं है। उसे खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, हवाई और मिसाइल रक्षा, सुरक्षित सैन्य संचार तथा युद्धक्षेत्र में तकनीकी समन्वय की अपनी क्षमताएं भी मजबूत करनी होंगी। इन व्यवस्थाओं को तैयार करने में समय और बड़े निवेश की जरूरत होगी। विशेषज्ञों के अनुसार रूस के लिए डीजल समझौते का तात्कालिक आर्थिक लाभ सीमित दिखता है, लेकिन इसके राजनीतिक और सामरिक प्रभाव अधिक दूरगामी हो सकते हैं। यदि इससे मॉस्को को पश्चिमी दबाव में कमी का संकेत मिलता है और यूक्रेन की अमेरिकी सहायता पर निर्भरता बनी रहती है, तो युद्ध के समीकरणों पर इसका असर पड़ सकता है। आने वाले समय में असली कसौटी यह होगी कि रूस को मिली आर्थिक राहत का विस्तार कितना होता है और अमेरिका यूक्रेन को सैन्य तथा खुफिया सहायता देने की अपनी नीति में क्या रुख अपनाता है।