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म्यांमार: गृह युद्ध में सैन्य शासन के पक्ष में झुक गया पलड़ा, एनयूजी के गुटों को दुनिया से नहीं मिल रही मदद
Wed, 01 Feb 2023 10:16 PM IST
निर्मल कांत
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, यंगून
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, यंगून
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 01 Feb 2023 10:16 PM IST
सार
पर्यवेक्षकों के मुताबिक, म्यांमार के विद्रोही समूहों की एक बड़ी समस्या यह है कि उनके पास कोई करिश्माई नेता नहीं है। आंग सान सू की सहित सभी प्रमुख नेताओं को सैन्य शासकों ने जेल में बंद कर रखा है।
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म्यांमार जनरल मिन आंग हलिंग
- फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
म्यांमार में पिछले दो साल से सैन्य शासन का प्रतिरोध कर रहे संगठन इस बात से मायूस हैं कि उनके संघर्ष पर दुनिया ने ध्यान नहीं दिया है। सैन्य शासन का विरोध कई संगठन कर रहे हैं। मुख्यधारा की पार्टियों ने मिलकर नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (एनयूजी) बनायी है, जिसे वे म्यांमार की वैध सरकार बताते हैं। एनयूजी के अलावा कई हथियारबंद गुट हैं, जो अलग-अलग इलाकों में सेना के साथ ‘गृह युद्ध’ की स्थिति में हैं।
देश में सेना ने एक फरवरी 2021 को निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ से सत्ता छीन ली थी। तब से सेना विरोधी गुटों ने कई बार पश्चिमी देशों से हथियार देने की गुजारिश की। लेकिन किसी देश ने उनकी मांग पर ध्यान नहीं दिया। इन गुटों के कार्यकर्ता आज अक्सर यह शिकायत जताते सुने जाते हैं कि पश्चिमी देश जहां यूक्रेन को अरबों डॉलर की मदद दे रहे हैं, वहीं उनकी लड़ाई पर उन्हें ध्यान देने तक की फुर्सत नहीं है।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक, म्यांमार के विद्रोही समूहों की एक बड़ी समस्या यह है कि उनके पास कोई करिश्माई नेता नहीं है। आंग सान सू की सहित सभी प्रमुख नेताओं को सैन्य शासकों ने जेल में बंद कर रखा है। एनयीजू के कार्यवाहक अध्यक्ष दुवा लाशी ला कभी-कभार यूट्यूब पर अपना वीडियो जारी करते हैं या दूसरे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर आते हैं। लेकिन उनकी समस्या यह है कि कचिन नस्लीय समुदाय में तो उनकी भारी लोकप्रियता है, लेकिन देश के बाकी हिस्सों में उनके बारे में लोग कम ही जानते हैं। दुनिया के बाहर उनकी कोई खास पहचान नहीं है।
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ऑस्ट्रेलिया के यूनिवर्सिटी ऑफ तस्मानिया में प्रोफेसर निकोलस फेरेली और यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया में प्राध्यापक एडम सिम्पसन ने सैनिक शासन दो साल पूरे होने के मौके पर लिखे एक विश्लेषण में कहा है कि म्यांमार की नस्लीय, भाषाई, भौगोलिक और ऐतिहासिक जटिलताएं सैन्य शासन विरोधी संघर्ष की समस्या बनी हुई है। इनकी वजह से ये संगठन एक समान कथानक देश और दुनिया के सामने पेश नहीं कर पाए हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया धीमी रहने के पीछे एक कारण 2017 के बाद से रोहिंग्या शरणार्थी मसले का चर्चा में रहना भी है। उसके पहले आंग सान सू की को म्यांमार के लोकतंत्र के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। लेकिन उनकी पार्टी की सरकार के तहत ही रोहिंग्या मुसलमानों का दमन हुआ। सू की की उस दौरान रही भूमिका से उनकी छवि प्रभावित हुई। साथ ही उनकी पार्टी के लिए अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति खत्म हो गई। इसका असर अब देखने को मिल रहा है।
वेबसाइट कन्वर्सेशन.कॉम में छपे एक विश्लेषण में कहा गया है कि सैन्य शासन के पिछले दौर में म्यांमार के बागियों को चोरी-छिपे हथियारों की सप्लाई होती थी। इनमें ज्यादातर हथियार भारत या थाईलैंड के रास्ते भेजे जाते थे। लेकिन अब भारत और थाईलैंड म्यांमार के मसले में उलझने से बच रहे हैं।
इस बीच, सैन्य शासन ने हथियारों का जखीरा जुटा लिया है। रूस और चीन ने उसे बड़े पैमाने पर आधुनिक हथियारों की सप्लाई की है। इसलिए, बागियों पर सेना घातक हमले कर रही है। इससे गृह युद्ध में पलड़ा फिलहाल उसकी तरफ झुका दिख रहा है।
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देश में सेना ने एक फरवरी 2021 को निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ से सत्ता छीन ली थी। तब से सेना विरोधी गुटों ने कई बार पश्चिमी देशों से हथियार देने की गुजारिश की। लेकिन किसी देश ने उनकी मांग पर ध्यान नहीं दिया। इन गुटों के कार्यकर्ता आज अक्सर यह शिकायत जताते सुने जाते हैं कि पश्चिमी देश जहां यूक्रेन को अरबों डॉलर की मदद दे रहे हैं, वहीं उनकी लड़ाई पर उन्हें ध्यान देने तक की फुर्सत नहीं है।
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पर्यवेक्षकों के मुताबिक, म्यांमार के विद्रोही समूहों की एक बड़ी समस्या यह है कि उनके पास कोई करिश्माई नेता नहीं है। आंग सान सू की सहित सभी प्रमुख नेताओं को सैन्य शासकों ने जेल में बंद कर रखा है। एनयीजू के कार्यवाहक अध्यक्ष दुवा लाशी ला कभी-कभार यूट्यूब पर अपना वीडियो जारी करते हैं या दूसरे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर आते हैं। लेकिन उनकी समस्या यह है कि कचिन नस्लीय समुदाय में तो उनकी भारी लोकप्रियता है, लेकिन देश के बाकी हिस्सों में उनके बारे में लोग कम ही जानते हैं। दुनिया के बाहर उनकी कोई खास पहचान नहीं है।
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ऑस्ट्रेलिया के यूनिवर्सिटी ऑफ तस्मानिया में प्रोफेसर निकोलस फेरेली और यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया में प्राध्यापक एडम सिम्पसन ने सैनिक शासन दो साल पूरे होने के मौके पर लिखे एक विश्लेषण में कहा है कि म्यांमार की नस्लीय, भाषाई, भौगोलिक और ऐतिहासिक जटिलताएं सैन्य शासन विरोधी संघर्ष की समस्या बनी हुई है। इनकी वजह से ये संगठन एक समान कथानक देश और दुनिया के सामने पेश नहीं कर पाए हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया धीमी रहने के पीछे एक कारण 2017 के बाद से रोहिंग्या शरणार्थी मसले का चर्चा में रहना भी है। उसके पहले आंग सान सू की को म्यांमार के लोकतंत्र के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। लेकिन उनकी पार्टी की सरकार के तहत ही रोहिंग्या मुसलमानों का दमन हुआ। सू की की उस दौरान रही भूमिका से उनकी छवि प्रभावित हुई। साथ ही उनकी पार्टी के लिए अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति खत्म हो गई। इसका असर अब देखने को मिल रहा है।
वेबसाइट कन्वर्सेशन.कॉम में छपे एक विश्लेषण में कहा गया है कि सैन्य शासन के पिछले दौर में म्यांमार के बागियों को चोरी-छिपे हथियारों की सप्लाई होती थी। इनमें ज्यादातर हथियार भारत या थाईलैंड के रास्ते भेजे जाते थे। लेकिन अब भारत और थाईलैंड म्यांमार के मसले में उलझने से बच रहे हैं।
इस बीच, सैन्य शासन ने हथियारों का जखीरा जुटा लिया है। रूस और चीन ने उसे बड़े पैमाने पर आधुनिक हथियारों की सप्लाई की है। इसलिए, बागियों पर सेना घातक हमले कर रही है। इससे गृह युद्ध में पलड़ा फिलहाल उसकी तरफ झुका दिख रहा है।