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ऑकुस पर स्पष्टीकरण: चीन के प्रति अमेरिका कभी गरम तो कभी नरम क्यों पड़ जाता है?

Fri, 01 Oct 2021 04:28 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांग कांग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांग कांग Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 01 Oct 2021 04:28 PM IST
सार

विश्लेषकों के मुताबिक ऑकुस समझौते में यह नहीं कहा गया है कि इसका मकसद किसी देश को निशाना बनाना है। लेकिन आम संदेश यही गया कि उसका मकसद चीन की घेराबंदी है। इस समझौते को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की गतिविधियों को नियंत्रित करने की पहले से जारी अमेरिकी कोशिशों से जोड़ कर देखा गया है...

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The US military tried to clear doubts about AUKUS by talking to China
जो बिडेन और बोरिस जॉनसन के साथ स्कॉट मॉरिसन - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

हाल में अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के साथ एक नया रक्षा करार कर ये संदेश दिया कि वह चीन की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने के लिए कमर कस रहा है। लेकिन अब अमेरिकी सेना ने चीन से सीधी बात कर इस बारे में उसकी शंकाओं को दूर करने की कोशिश की है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल मार्टिन मीनर्स ने एक बयान में इस बातचीत की पुष्टि की।

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मीनर्स ने कहा कि अमेरिकी सेना ने चीन के साथ ‘गहरी वार्ता’ की। इसमें अमेरिका ने दोहराया कि वह अपने क्षेत्रीय सहयोगी देशों के प्रति अपनी वचनबद्धताओं पर कायम है। उन्होंने कहा- ‘दोनों पक्षों के बीच गहराई से, खुला विचार-विमर्श हुआ। ये बातचीत ऐसे कई मुद्दों पर हुई, जिनका असर अमेरिका और चीन के रक्षा संबंधों पर पड़ रहा है।’ मीनर्स ने कहा- ‘ये बातचीत अमेरिका और चीन के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा को जिम्मेदारी से संभालने की अमेरिकी कोशिशों के बीच एक महत्त्वपूर्ण कदम है।’
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मीडिया विश्लेषणों में कहा गया है कि पेंटागन के इस बयान की भाषा उन बयानों की तुलना में काफी नरम थी, जो अक्सर अमेरिकी अधिकारी चीन के बारे में देते रहे हैं। खास कर ऐसे समय रुख की इस नरमी ने ध्यान खींचा है, जब रक्षा सौदे ऑकुस (ऑस्ट्रेलिया- यूनाइटेड किंगडम- यूनाइटेड स्टेट्स) को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनाव और बढ़ गया है। ऑकुस समझौते के तहत अमेरिका और ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया को परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बी बनाने की तकनीक देंगे। ऑस्ट्रेलिया ने ये करार पनडुब्बी निर्माण के लिए फ्रांस के साथ उसके पहले हो चुके समझौते की कीमत पर किया। उससे फ्रांस और यूरोपियन यूनियन से भी उसके संबंध बिगड़े हैं।

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विश्लेषकों के मुताबिक ऑकुस समझौते में यह नहीं कहा गया है कि इसका मकसद किसी देश को निशाना बनाना है। लेकिन आम संदेश यही गया कि उसका मकसद चीन की घेराबंदी है। इस समझौते को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की गतिविधियों को नियंत्रित करने की पहले से जारी अमेरिकी कोशिशों से जोड़ कर देखा गया है। अमेरिकी मीडिया में छपी टिप्पणियों में भी आम राय यही दिखी है कि ऑकुस के निशाने पर चीन है।

ऑकुस समझौते के एलान के बाद चीन ने इसकी कड़ी निंदा की थी। उसने इस ऑस्ट्रेलिया को परमाणु क्षमता वाली पनडुब्बियां बनाने में मदद करने के अमेरिकी फैसले को ‘बेहद गैर-जिम्मेदाराना’ बताया था। चीन ने कहा था कि ऑकुस से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता पर बहुत खराब असर पड़ेगा और संभव है कि इससे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में हथियारों की होड़ शुरू हो जाए।

एक मीडिया में इंटरव्यू में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया चीन के साथ बातचीत के पक्ष में है। लेकिन उन्होंने कहा कि चीन की बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं है। मॉरीसन के इस बयान पर अपनी प्रतिक्रिया में चीन ने कहा कि अभी दोनों के बीच जो राजनयिक हालात बने हैं, उनके लिए पूरी तरह से ऑस्ट्रेलिया ही जिम्मेदार है।

ऑकुस करार का एलान करने के कुछ दिनों के अंदर भी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने व्हाइट हाउस में क्वैंड्रेगुलर सिक्युरिटी डॉयलॉग (क्वैड) में शामिल चारों देशों के नेताओं की शिखर बैठक की अध्यक्षता की। इस समूह का मकसद भी चीन की ताकत को नियंत्रित करना माना जाता है। विश्लेषकों के मुताबिक इस घेरेबंदी के बीच अमेरिकी सेना का चीन से नरम लहजे में बातचीत करने से भ्रामक संदेश गया है।

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