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Hindi News ›   World ›   The new map of Nepal officially released, includes Lipulekh and Kalapani

नेपाल का नया नक्शा आधिकारिक तौर पर जारी, लिपुलेख और कालापानी भी शामिल

Wed, 20 May 2020 07:36 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 20 May 2020 07:36 PM IST
सार

  • मानसरोवर तक बनी सड़क के बाद नेपाल पर था नया नक्शा जारी करने का दबाव
  • लिपुलेख से होकर गुजरने वाली सड़क भारत-चीन ने बगैर नेपाल की सहमति के बनाई
  • नेपाल ने चीन के कहने पर नहीं बनाया नया नक्शा – आनंद स्वरूप वर्मा

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The new map of Nepal officially released, includes Lipulekh and Kalapani
KP Sharma Oli

विस्तार

आखिरकार तमाम विवादों के बावजूद नेपाल ने आधिकारिक तौर पर अपना नया राजनीतिक और प्रशासनिक नक्शा जारी कर दिया। इसमें लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को भी नेपाल की सीमा में शामिल कर लिया गया है।

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बुधवार को नेपाल टेलीविजन पर भूमि प्रबंधन मंत्री पद्मा कुमारी अर्याल और ट्विटर पर प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के प्रमुख सलाहकार बिष्णु रिमाल ने नए नक्शे को आम लोगों के लिए जारी कर दिया।
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नेपाल की कैबिनेट ने इसे 18 मई को मंजूरी दी थी।

इससे पहले राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी और प्रधानमंत्री ओली ने नेपाली संसद को भरोसा दिलाया था कि जल्दी ही नेपाल का नया नक्शा जारी किया जाएगा, जिसमें भारत की ओर से कब्जा किए गए क्षेत्रों को भी शामिल किया जाएगा।
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पिछली 8 मई को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीन के मानसरोवर तक जाने वाले सड़क मार्ग का उद्घाटन किया था। यह सड़क नेपाल से होकर गुजरती है। नेपाल ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी और कहा था कि बगैर उसकी सहमति के कोई भी देश ऐसा कैसे कर सकता है। इसके बाद से ही दोनों देशों में इन क्षेत्रों को लेकर खासा विवाद मचा हुआ है।

नेपाल मामलों के जानकार आनंद स्वरूप वर्मा का कहना है कि भारत में यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि नेपाल ने अपने नक्शे में यह बदलाव चीन के कहने पर किया है। दरअसल इसकी पृष्ठभूमि 1962 के भारत-चीन युद्ध से जुड़ी है जब तत्कालीन राजा महेन्द्र ने भारतीय सेना को चीन के खिलाफ मोर्चेबंदी के लिए कालापानी में अस्थाई तौर पर रहने की सहूलियत दी थी।

बाद में इसे भारत ने अपने हिस्से में शामिल कर लिया। नेपाल में 1990 के बाद से ही इस क्षेत्र को लेकर आवाज उठती रही है, लेकिन वहां की राजनीतिक अस्थिरता की वजह से ऐसा पहले नहीं हो पाया।

उन्होंने याद दिलाया कि 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के दौरान भारत और चीन ने जो संयुक्त वक्तव्य जारी किया था उसमें लिपुलेख को द्विपक्षीय व्यापार मार्ग कहे जाने पर नेपाल ने भारी आपत्ति की थी और साफ कहा था कि किसी देश को ये अधिकार नहीं है कि वह नेपाल की गैरमौजूदगी में नेपाल के किसी क्षेत्र के बारे में विचार करे।

ऐसे में नेपाल का ये कदम भारत औऱ चीन दोनों को इस बात का अहसास दिलाने वाला है कि सड़क मार्ग तैयार करने और इसे खोलने से पहले नेपाल की सहमति क्यों नहीं ली गई।


उधर उत्तराखंड से लगी नेपाल सीमा के आसपास के इलाकों में नेपाल के नए नक्शे का विरोध हो रहा है और लिपुलेख, कालापानी को नेपाल का हिस्सा बताये जाने के खिलाफ प्रदर्शन भी हुए हैं। इस क्षेत्र से होकर गुजरने वाली सड़क को लेकर नेपाल के लोगों में भी खासी नारजगी है और इसके खिलाफ स्थानीय लोग अपना विरोध पहले भी दर्ज कराते रहे हैं।
 

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