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चिली में वामपंथी जीते, लैटिन अमेरिका में आगे बढ़ा लेफ्ट कारवां

Mon, 17 May 2021 03:26 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, सांतियागो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, सांतियागो Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 17 May 2021 03:26 PM IST
सार

विश्लेषकों का कहना है कि चिली के घटनाक्रम का असर दूसरे लैटिन अमेरिकी देशों पर भी पड़ सकता है। बोलिविया और वेनेजुएला के चुनावों में वामपंथ की बड़ी जीत के बाद चिली भी अब इस श्रेणी में शामिल हुआ है...

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The left party candidates win in the election of the Constituent Assembly in Chile
चिली - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

चिली में संविधान सभा के चुनाव में वामपंथी उम्मीदवारों को बड़ी सफलता मिली है। इसे लैटिन अमेरिका में बदल रहे राजनीतिक मूड का संकेत समझा जा रहा है। चिली लैटिन अमेरिका में वह देश है, जहां 1970 के दशक में सैनिक तख्ता पलट के बाद सबसे पहले नव-उदारवादी आर्थिक नीतियां अपनाई गई थीं। उसी सैनिक शासन के समय जो संविधान बना, वह कमोबेश अब तक लागू है। अब निर्वाचित हुई संविधान सभा देश के लिए नया संविधान बनाएगी।

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चिली में शनिवार और रविवार को संविधान सभा के 155 सदस्यों के चुनाव के लिए मतदान हुआ था। रविवार को मतदान खत्म होते ही मतगणना शुरू हुई। सोमवार दोपहर (भारतीय समय के अनुसार) तक ज्यादातर नतीजे आ गए। इसके मुताबिक दक्षिणपंथी दलों को 155 में से सिर्फ 36 सीटें मिली हैं। यानी संविधान सभा में उनकी ताकत एक चौथाई से भी कम होगी। उधर वामपंथी रूझान वाले दो गुटों को मिसाल कर 52 सीटें मिली हैं। इनमें वामपंथी और स्वतंत्र विचारधारा वाले दलों के गुट को मिली 24 और कम्युनिस्ट विचारधारा वाले मोर्चे को मिली 28 सीटें शामिल हैं। 15 अन्य सीटें स्वतंत्र उम्मीदवारों को मिली हैं। संविधान सभा में 17 सीटें मूलवासी समुदाय के लिए आरक्षित रखी गई हैं। नुएवा कॉन्स्टीट्यूशन नाम एक गुट ने 9 सीटें जीती हैं।  
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कुल मिला कर इन चुनाव नतीजों को वामपंथी और नव-उदारवाद विरोधी ताकतों की महत्त्वपूर्ण जीत समझा गया है। गौरतलब है कि दक्षिणपंथी पार्टियों ने नया संविधान बनाने की मांग का विरोध किया था। ऐसी संभावना जताई गई थी कि अगर वे जीतीं, तो थोड़े-बहुत बदलाव के साथ वे पुराने संविधान को बनाए रखेंगी। लेकिन अब एक ऐसा नया बनने की संभावना है, जिसके मार्गदर्शक सिद्धांतों में बुनियादी बदलाव होगा और जिसके जरिए एक नया सामाजिक- आर्थिक मॉडल देश में अपनाया जाएगा।
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नया संविधान बनाने की मांग अक्टूबर 2019 में देश में हुए व्यापक जन आंदोलन के दौरान उठी थी। ये आंदोलन पिछले साल भी जारी रहा। तब मौजूदा सरकार को ये मांग माननी पड़ी। तब एलान हुआ था कि अगली संसद संविधान सभा के रूप में काम करेगी। अब चुनी गई संविधान सभा आम संसद के रूप में भी काम करेगी। इसलिए अब देश में वामपंथी रुझान वाली सरकार बनने का रास्ता भी साफ हो गया है।

2019 के जन आंदोलन का नेतृत्व चिली की कम्युनिस्ट पार्टी- फ्रंते एम्पलियो ने किया था। उसे और उसके साथ मिल कर चुनाव लड़ने वाली पार्टियों को इस चुनाव में सबसे अधिक सफलता मिली है। उनके अलावा दक्षिणपंथी गुट छोड़ कर जीते ज्यादातर गुट भी नया संविधान बनाने के समर्थक हैँ। इसलिए नए सदन में मौजूदा संविधान को पूरी तरह बदल देने के समर्थक सदस्यों का बहुमत होगा।

शनिवार और रविवार को संविधान सभा चुनने के साथ- साथ प्रांतों के गवर्नरों, मेयरों और नगर पार्षदों के चुनाव के लिए भी वोट डाले गए थे। संविधान सभा की मतगणना अंतिम रूप से खत्म होने के बाद उन चुनावों के वोट गिने जाएंगे। इन चुनावों में भी वामपंथी रुझान वाले उम्मीदवारों को अधिक सफलता मिलने की संभावना है।


विश्लेषकों का कहना है कि चिली के घटनाक्रम का असर दूसरे लैटिन अमेरिकी देशों पर भी पड़ सकता है। बोलिविया और वेनेजुएला के चुनावों में वामपंथ की बड़ी जीत के बाद चिली भी अब इस श्रेणी में शामिल हुआ है। अब निगाहें अगले साल ब्राजील में होने वाले चुनाव पर हैं, जिसमें एक बार फिर से लूला नाम से मशहूर पूर्व राष्ट्रपति और लोकप्रिय वामपंथी उम्मीदवार लुइज इनेशियो लूला दा सिल्वा मैदान में उतरेंगे। उनके जीतने की संभावना इस बार उज्ज्वल मानी जा रही है।

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