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कोरोना का पता लगाने में टी-सेल्स भी मददगार, लंदन के इंपीरियल कॉलेज के वैज्ञानिकों का दावा
Tue, 21 Jul 2020 02:04 PM IST
Tanuja Yadav
अमर उजाला रिसर्च टीम
अमर उजाला रिसर्च टीम
Published by: Tanuja Yadav
Updated Tue, 21 Jul 2020 02:04 PM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : PTI
कोरोना संक्रमण का स्तर एंटीबॉडी टेस्ट की जगह टी-सेल्स (कोशिकाओं) की जांच से भी चल सकता है। लंदन के इंपीरियल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने साइंस इम्यूनोलॉजी में प्रकाशित शोध में बताया है कि हल्के लक्ष्मण वाले कोरोना मरीजों में एंटीबॉडीज नहीं होती हैं लेकिन टी सेल इम्यूनिटी का स्तर अधिक होता है। इससे पता किया जा सकता है कि कौन सा व्यक्ति या किसी क्षेत्र की कितनी आबादी वायरस की चपेट में हैं।
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इंपीरियल कॉलेज के इम्यूनोलॉजी विभाग की प्रो. रोसमैरी बॉयटन और प्रो. डेनियल ऑल्टमैन का कहना है कि कम लागत और कम समय में टी-सेल कोशिकाओं की जांच से वायरस का पता लगाया जा सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार कोशिकाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता में अहम भूमिका होती है। कोशिकाओं से निकला एंटीबॉडीज प्रोटीन वायरस को न्यूट्रलाइज करता है। टी-सेल्स या कोशिकाएं बोन मैरो में होती हैं। हृदय के ऊपरी भाग में स्थित थायमस से टी-सेल्स निकलती हैं।
साथ रहती हैं हेल्पर और किलर कोशिका
टी-सेल्स दो तरह की होती हैं, एक को हेल्पर टी-सेल्स और दूसरे को किलर टी-सेल्स कहते हैं। किलर टी-सेल्स संक्रमित कोशिकाओं को खत्म करती हैं। हेल्पर टी-सेल्स केमिकल संदेशों के जरिए किलर टी-सेल्स को अलर्ट करती है, जिससे वह वायरस को मार पाती है।
ऑक्सफोर्ड वैक्सीन: 14 से 28 दिन में डोज का दिखा असर
लंदन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के महामारी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एरिक फेगल डिंग ने बताया कि वैक्सीन का नकारात्मक असर नहीं मिला है। थकावट और सिरदर्द वैक्सीन के दो अहम दुष्प्रभाव थे जो सामान्य हैं। नतीजों के अनुसार, वैक्सीन लगने के बाद 14 दिन के भीतर टी-सेल्स को सक्रिय होते देखा गया है जबकि एंटीबॉडीज 28 दिन के भीतर बनने लगी थीं।
दूसरी खुराक के और बेहतर नतीजे होंगे
प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर एंड्रू पोलार्ड ने कहा कि ट्रायल में शामिल लोगों पर टीके के दूसरे डोज के बाद नतीजे और बेहतर होंगे। पहले दस लोगों में नतीजे सचमुच शानदार रहे हैं। पहले और दूसरे चरण के नतीजों में कोई दुष्प्रभाव नहीं दिखा। मानव ट्रायल के पहले चरण के नतीजे ठीक उतने ही बेहतर हैं जितने कि पशुओं पर थे। आगे हम इंसानों पर इसके दूसरे डोज के और बेहतर नतीजों की उम्मीद करते हैं।
सर्दी के कमजोर वायरस का इस्तेमाल
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने वैक्सीन के लिए विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया है। इसमें सामान्य सर्दी के सबसे कमजोर वायरस का जेनेटिक मैटेरियल इस्तेमाल किया है जो आसानी से शरीर में दोबारा नहीं पनप सकता है।