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Hindi News ›   World ›   Statue of 'Bapu' unveiled in South African state, Indians were banned here for more than 100 years

South Africa: अफ्रीकी राज्य में 'बापू' की प्रतिमा का अनावरण, यहां 100 से ज्यादा साल तक भारतीयों पर था प्रतिबंध

Thu, 17 Apr 2025 11:00 AM IST
बशु जैन वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, जोहान्सबर्ग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, जोहान्सबर्ग Published by: बशु जैन Updated Thu, 17 Apr 2025 11:00 AM IST
सार

1994 में जब नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति चुने गए थे तो पहला ऑरेंज फ्री स्टेट भारतीयों को रंगभेद कानून द्वारा प्रतिबंधित करता था। भारतीय उच्चायुक्त प्रभात कुमार ने एंग्लो-बोअर युद्ध संग्रहालय में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की बड़ी प्रतिमा का अनावरण किया। 

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Statue of 'Bapu' unveiled in South African state, Indians were banned here for more than 100 years
महात्मा गांधी। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

दक्षिण अफ्रीकी राज्य के एंग्लो-बोअर युद्ध संग्रहालय में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की बड़ी प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह एक ऐसा राज्य है जहां पर रंगभेद कानून के चलते 100 साल से ज्यादा समय तक भारतीयों पर प्रतिबंध था। पद्म भूषण पुरस्कार विजेता राम वांगी सुतार द्वारा बनाई गई कांस्य प्रतिमा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ने संग्रहालय को दान की थी। प्रतिमा का अनावरण 11 अप्रैल को भारतीय उच्चायुक्त प्रभात कुमार ने 1899-1902 के एंग्लो-बोअर युद्ध में भारतीयों की भागीदारी की अब तक की अनकही कहानी पर एक वृत्तचित्र और एक किताब के साथ किया।
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1994 में जब नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति चुने गए थे तो पहला ऑरेंज फ्री स्टेट भारतीयों को रंगभेद कानून द्वारा प्रतिबंधित करता था। ब्लूमफोंटेन में बने युद्ध संग्रहालय में दक्षिण अफ्रीकी एंग्लो-बोअर युद्ध की याद बनाया गया है। इस युद्ध में सभी नस्लों के दक्षिण अफ्रीकी शामिल थे। इनमें श्वेत, अफ्रीकी, रंगीन और भारतीय शामिल थे। ब्लूमफोंटेन में युद्ध संग्रहालय के निदेशक टोकी प्रीटोरियस ने कहा कि संग्रहालय ने इस प्रकाशन के माध्यम से दक्षिण अफ्रीकी भारतीयों और भारत से आए लोगों दोनों की भागीदारी को मान्यता देने के लिए एक परियोजना शुरू की है।
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उन्होंने कहा कि किताब भारतीयों और युद्ध के लिए विशेष रूप से आए सैनिकों द्वारा निभाई गई भूमिकाओं को दर्शाती है, जो सुलह और राष्ट्र निर्माण के प्रयासों पर प्रकाश डालती है। सुलह और राष्ट्र निर्माण में पूरी सच्चाई को स्वीकार करने के महत्व पर जोर देना आवश्यक है। युद्ध के दौरान भारतीयों को पक्षपात और अलगाव का सामना करना पड़ा। अब कहानी बदल रही है और आखिरकार भारतीयों के योगदान को मान्यता दी गई है।  

 'क्रॉसफ़ायर में फंस गए दक्षिण अफ्रीकी युद्ध में भारतीय भागीदारी' नामक पुस्तक में युद्ध के दौरान दक्षिण अफ़्रीका में सेवा देने वाली ब्रिटिश भारतीय सेना पर केंद्रित एक अध्याय शामिल है। यह दिवंगत डॉ. टीजी राममूर्ति द्वारा लिखित एक लेख का अनुवाद है। यह भारत में प्रकाशित हुआ था और डरबन में भारतीय वाणिज्य दूतावास की अनुमति के साथ पुनर्मुद्रित किया गया था।


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भारतीय उच्चायुक्त प्रभात कुमार ने कहा कि युद्ध में भारतीय भागीदारी के बारे में प्रकाशन एक ऐसे विषय पर एक नया दृष्टिकोण विकसित करेगा जिसे अब तक वर्षों से उपेक्षित किया गया है और युद्ध के दौरान भारतीय लोगों विशेष रूप से दक्षिण अफ्रीकी भारतीयों के बलिदान और कठिनाइयों को प्रकाश में लाएगा। उन्होंने सुझाव दिया कि इस परियोजना को भारत में युद्धबंदियों और उनके अनुभवों, भारत में स्थापित युद्धबंदी शिविरों के बारे में अधिक शोध तक बढ़ाया जाना चाहिए।

कुमार ने कहा कि इससे न केवल हमें युद्ध को व्यापक रूप से समझने में मदद मिलेगी बल्कि उस समय भारत द्वारा निभाई गई भूमिका की सराहना करने में भी मदद मिलेगी। एंग्लो-बोअर युद्ध दक्षिणी अफ्रीका में लड़ा गया अब तक का सबसे बड़ा औपनिवेशिक युद्ध था। इसमें भारत सहित ब्रिटिश साम्राज्य से 500,000 से अधिक सैनिकों को देश में लाया गया था।

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