आर्थिक संकट: सोना बेचकर अंतर्राष्ट्रीय साख बचाने में जुटी है श्रीलंका सरकार
श्रीलंका सरकार ने अपने भंडार में मौजूद सोने का आधा हिस्सा बुधवार को बेच दिया। उससे प्राप्त रकम से अंतरराष्ट्रीय सॉवरेन बॉन्ड्स का भुगतान किया जा रहा है। श्रीलंका सरकार के 50 करोड़ डॉलर के बॉन्ड 18 जनवरी को मैच्योर हुए थे...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सीमित विदेशी मुद्रा को कहां खर्च करें, इस बारे में श्रीलंका सरकार ने अर्थशास्त्रियों और कारोबारियों के सुझाव की अनदेखी कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के इस रुख का देशवासियों पर बहुत खराब असर पड़ रहा है। देश के कारोबारियों के संगठन सिलोन चैंबर ऑफ कॉमर्स और कुछ प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने मांग की थी कि सरकार मैच्योर हुए बॉन्ड्स के भुगतान को फिलहाल रोक दे और विदेशी मुद्रा को वह रोजमर्रा के लिए जरूरी चीजों के आयात पर खर्च करे। लेकिन राष्ट्रपति गोताबया राजपक्षे की सरकार ने कर्ज डिफॉल्ट करने का ये सुझाव नहीं माना।
अंतरराष्ट्रीय सॉवरेन बॉन्ड्स का भुगतान
पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस सुझाव पर सरकार ने कोई प्रतिक्रिया देने की जरूरत भी नहीं समझी। इसके पहले उसने फौरी उपायों के जरिए समस्या टालने की कोशिश की थी, जिससे कोई स्थायी लाभ नहीं हुआ। बीते महीने सरकार ने डॉलर लाने के लिए करेंसी स्वैप (मुद्राओं की अदला-बदली) का सहारा लिया। इससे उसे चीन से डेढ़ बिलियन डॉलर प्राप्त हुए। लेकिन उससे तात्कालिक राहत ही मिली।
अब खबर है कि श्रीलंका सरकार ने अपने भंडार में मौजूद सोने का आधा हिस्सा बुधवार को बेच दिया। उससे प्राप्त रकम से अंतरराष्ट्रीय सॉवरेन बॉन्ड्स का भुगतान किया जा रहा है। श्रीलंका सरकार के 50 करोड़ डॉलर के बॉन्ड 18 जनवरी को मैच्योर हुए थे। ताजा खबर से साफ है कि सरकार ने लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने से ज्यादा बॉन्ड खरीदारों के हितों और उनकी निगाह में अपनी छवि की ज्यादा परवाह की है।
पिछले महीने सरकार ने लाइसेंस प्राप्त कॉमर्शियल बैंकों से कहा था कि वे उन्हें होने वाली मौजूद विदेशी मुद्रा प्राप्तियों के एक चौथाई हिस्से को हर हफ्ते सेंट्रल बैंक को दे दें। संसद में विपक्ष के नेता हर्षा डि सिल्वा ने आरोप लगाया है कि इस कदम से कॉमर्शियल बैंकों में अपना खाता रखने वाले आयातकों की भुगतान क्षमता भी सीमित हो गई है। इस कारण वे भी अब जरूरत के मुताबिक चीजों का आयात नहीं कर पा रहे हैं।
देश में उवर्रकों की भारी कमी
जिन आयातकों पर असर पड़ा है, उनमें प्राकृतिक गैस के सप्लायर भी हैं। देश की दो प्रमुख गैस कंपनियों में से एक लॉगफ्स गैस ने कुछ दिन पहले ये साफ कहा था कि डॉलर की कमी के कारण वह गैस का आयात नहीं कर पा रही है। उधर खाद्य सामग्रियों की उत्पादक एक कंपनी के एक अधिकारी ने टीवी चैनल अल-जजीरा से कहा कि कच्चे माल का आयात ना कर पाने के कारण कंपनी को अपने उत्पादन को आधा करना पड़ा है। अधिकारी ने कहा कि देश में उवर्रकों की भारी कमी है। उसका असर फसलों पर पड़ा है। इस कारण किसान भी इस कंपनी को अनाज की सप्लाई नहीं कर पा रहे हैं।
मौजूदा हालत का छोटे कारोबार पर भी बहुत खराब असर हुआ है। इस वजह से बाजार में मौजूद हर चीज की कीमत 20 से 30 फीसदी तक बढ़ गई है। आलोचकों का कहना है कि इस संकट के बीच सरकार के हालिया कदमों से स्थितियां बदतर हुई हैं। इस कारण विपक्ष के इस आरोप पर अब ज्यादा से ज्यादा लोग भरोसा करने लगे हैं कि राजपक्षे सरकार न सिर्फ संकट को संभालने में अक्षम है, बल्कि उसे आम लोगों की कोई परवाह भी नहीं है।