Sri Lanka Crisis: राजपक्षे मुसीबत में हैं, लेकिन उसका सूर्यास्त हुआ- यह कहना अभी जल्दबाजी होगी
पर्यवेक्षकों का कहना है कि वरिष्ठ विपक्षी राजनेता रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राजी कर लेना राजपक्षे परिवार की एक बड़ी कामयाबी रही है। रानिल अपनी पार्टी के अकेले सांसद हैं। उनके प्रधानमंत्री बन जाने से अब सारा ध्यान उन पर केंद्रित हो गया है...
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श्रीलंका के मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक संकट के बीच राजपक्षे परिवार घिरा नजर आता है। इसके बावजूद श्रीलंकाई राजनीति के ज्यादातर जानकारों के मुताबिक यह मान लेना गलत होगा कि राजपक्षे परिवार का सूर्यास्त हो गया है। प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद महिंदा राजपक्षे कुछ समय तक सीन से गायब रहे। लेकिन पिछले हफ्ते अचानक वे संसद में उपस्थित हुए। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इसके जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि उनके राजनीतिक करियर को खत्म न समझा जाए।
श्रीलंकाई राजनीति के अध्ययनकर्ता जयदेव उयनगोडा ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से बातचीत में राय जताई है- ‘राजपक्षे ब्रांड धूमिल हो गया है। फिलहाल यह मार्केटिंग करने लायक नहीं रह गया है। लेकिन उसकी वापसी हो सकती है। ब्रांड को नया रूप में देने में समय लगेगा। इसी काम में (प्रधानमंत्री) रानिल विक्रमसिंघे उनकी मदद कर रहे हैं।’
सत्ता में राजपक्षे खानदान से 39 लोग
समझा जाता है कि राजपक्षे परिवार के सदस्यों ने फिलहाल लो प्रोफाइल में रहने का फैसला किया है। जो लोग अभी सीन से बाहर हैं, उनमें बासिल राजपक्षे भी हैं, जो मौजूदा संकट शुरू होने के पहले देश के वित्त मंत्री थे। बासिल राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे और प्रधानमंत्री महिंद राजपक्षे के भाई हैँ। एक रिपोर्ट के मुताबिक राजपक्षे खानदान में 39 व्यक्ति हैं, जो किसी ना किसी रूप में सत्ता से जुड़े रहे हैँ।
हाल तक राजपक्षे परिवार के छह सदस्य सरकारी पदों पर थे। उनके अधिकार क्षेत्र में देश का लगभग 70 फीसदी बजट था। अभी सिर्फ गोटबया ही सत्ता में हैं। इस परिवार का प्रभाव कायम करने का श्रेय 72 वर्षीय महिंदा राजपक्षे को दिया जाता है। उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत एक सैनिक अधिकारी के रूप में की थी। बाद में वे राजनीति में आए।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि वरिष्ठ विपक्षी राजनेता रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राजी कर लेना राजपक्षे परिवार की एक बड़ी कामयाबी रही है। रानिल अपनी पार्टी के अकेले सांसद हैं। उनके प्रधानमंत्री बन जाने से अब सारा ध्यान उन पर केंद्रित हो गया है। अब चर्चा ऐसे सवालों पर हो रही है कि क्या रानिल सरकार देश को आर्थिक दुर्दशा के गर्त से निकाल पाएगी। इससे राजपक्षे को सांस लेने का वक्त मिल गया है।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक राजपक्षे परिवार के चीन से निकट संबंध रहे हैं। अतीत में ये संबंध उनकी ताकत रहा है। समझा जाता है कि राजपक्षे परिवार अभी अपने सबसे गहरे संकट में हैं। जयदेव उयनगोडा ने कहा- ‘राजपक्षे परिवार ने कभी अपने तड़क-भड़क वाली जीवन शैली को छिपाने की कोशिश नहीं की। तब भी नहीं, जब 2020 में कोरोना महामारी के कारण देश के लोग दरिद्रता का शिकार होने लगे।’
अभी सीन में बना हुआ है रापक्षे परिवार
उधर कम से दो बार राजपक्षे परिवार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। राजपक्षे परिवार से जुड़े जलिया विक्रमसूरिया को अमेरिका में श्रीलंका दूतावास के लिए जायदाद खरीदने के मामले में तीन लाख 30 डॉलर की धोखाधड़ी का दोषी पाया गया था। उधर पंडोरा पेपर्स में राष्ट्रपति की भतीजी और पूर्व उप मंत्री निरुपमा राजपक्षे और उनके पति का नाम आया था। उन पर फर्जी कंपनियों के जरिए टैक्स हैवेन्स में धन जमा कराने का आरोप लगा था।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक इन सभी मौकों पर राजपक्षे परिवार अपनी हैसियत बचाने में सफल रहा। इस बात उसके सामने मुश्किल चुनौती है। लेकिन जानकार इसे असंभव नहीं मानते। यहां राजनीतिक विश्लेषकों में ये जुमला अक्सर बोला जा रहा है कि राजपक्षे परिवार अभी भले डाउन हुआ हो, लेकिन वह आउट नहीं हुआ है।