शरमन-फेंग बातचीत: चीन की मांगों पर क्या रुख अपनाएगा अमेरिका, अगर नहीं माना तो और बढ़ेगा तनाव
अमेरिका की उप विदेश मंत्री वेंडी शरमन और चीन के उप विदेश मंत्री शिये फेंग के बीच बीते रविवार और सोमवार को चीन के शहर तियानजिन में बातचीत हुई। वहां चीन ने मोटे तौर पर ये तीन मांगें अमेरिका के सामने रखीं...
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बताया जाता है कि अमेरिका के साथ वार्ता के ताजा दौर में चीन ने संबंध सुधारने के लिए अपनी शर्तें दो-टूक सामने रख दीं। हालांकि उसने तनाव और बढ़ाने वाली भावनात्मक बातें नहीं की। लेकिन अपनी शर्तों पर उसने कड़ा रुख अपनाया। विश्लेषकों की राय है कि चीन ने जो मांगें रखी हैं, उनसे मुमकिन है कि तनाव और बढ़ जाए। खासकर ऐसा तब हो सकता है, जब अमेरिका ने उन मांगों की अनदेखी कर दी।
अमेरिका की उप विदेश मंत्री वेंडी शरमन और चीन के उप विदेश मंत्री शिये फेंग के बीच बीते रविवार और सोमवार को चीन के शहर तियानजिन में बातचीत हुई। वहां चीन ने मोटे तौर पर ये तीन मांगें अमेरिका के सामने रखीं, अमेरिका चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों पर लगाए गई वीजा संबंधी रोक हटाए, कनाडा में रोक रखे गए एक चीनी टेक कंपनी के अधिकारी मेंग वानझाऊ के प्रत्यर्पण की मांग वह छोड़े, और वह शर्त हटाए जिसके तहत अमेरिका में चीनी पत्रकारों को अपने को विदेशी एजेंट श्रेणी में दर्ज कराना पड़ता है। चीनी प्रतिनिधिमंडल ने एक वाक्य में इसे यह कहा कि अमेरिका ने जो ‘गलत कदम’ उठाए हैं, उन्हें वह वापस ले।
वेंडी शरमन की चीन के विदेश मंत्री वांग यी से भी मुलाकात हुई। इस दौरान वांग ने कहा कि अमेरिका चीन की शासन प्रणाली को चुनौती देना बंद करे। साथ ही शिनजियांग और हांगकांग को लेकर उसने जो प्रतिबंध लगाए हैं, उन्हें वह वापस ले। वांग ने यह भी कहा कि अमेरिका को चीन की प्रादेशिक अखंडता का सम्मान करना चाहिए। इसका मतलब यह समझा गया है कि उन्होंने ताइवान मामले पर अमेरिका से रुख नरम करने को कहा।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने मंगलवार तक यह नहीं बताया कि वेंडी शरमन ने इस मांगों पर क्या प्रतिक्रिया जताई। अमेरिका ने सिर्फ यह कहा है कि शरमन ने हांगकांग, शिनजियांग और तिब्बत में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर अमेरिकी चिंता चीन को बताई। साथ ही उन्होंने नई जांच से कोविड-19 वायरस की उत्पत्ति के कारणों की तलाश में चीन के सहयोग ना करने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने चीन में हिरासत में रखे गए अमेरिकी और कनाडा के नागरिकों के मसले पर भी बात की।
बैठक के बाद चीन के विश्लेषकों ने कहा कि चीन ने जो शर्तें रखी हैं, अमेरिका चाहे तो उन्हें पूरा कर सकता है। चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज में अमेरिकी मामलों के विशेषज्ञ लिउ वेइदोंग ने हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा- ‘रणनीतिक और सैद्धांतिक मामलों में दोनों पक्षों के पास रियायत बरतने की ज्यादा गुंजाइश नहीं है। लेकिन कुछ खास मुद्दों पर वे सद्भावना दिखाने वाले कदम उठा सकते हैं।’
लेकिन अमेरिकी विदेश मंत्रालय के पूर्व अधिकारी ड्रिउ थॉम्पसन ने कहा है- चीन ने ऐसी मांगें रखी हैं जिसका मतलब है कि वह चाहता है कि अमेरिका बिना कुछ ठोस हासिल किए अपनी नीति बदल दे। उन्होंने कहा- ‘चीन ने कहा है कि जब तक ये मांगें नहीं मानी जातीं, वह वैश्विक मुद्दों पर सहयोग नहीं करेगा। ऐसे में अमेरिका के पास शायद ही कोई वजह है कि वह जलवायु परिवर्तन, ईरान और उत्तर कोरिया के मामलों में चीन से सहयोग के लिए कदम आगे बढ़ाए।’