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Russia-Ukraine War: पुतिन के इस हमले ने दिला दी क्यूबा मिसाइल संकट की याद, जब अमेरिकी जलवे के आगे झुका था सोवियत संघ

Dr. Mohammad Rizwan डॉ. मोहम्मद रिजवान
Updated Fri, 25 Feb 2022 03:50 PM IST
सार

वास्तव में यूक्रेन का वर्तमान संकट पूरे विश्व पर अनेक आर्थिक, राजनीतिक व सैनिक प्रभाव डालेगा। यह तय है क्योंकि इस प्रकरण ने रूसी ताकत का प्रदर्शन करने के साथ साथ उसे पुनः एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, जिसकी परिणति में विश्व को एक नए शीत युद्ध की आहट भी दिखने लगी है, यह कहना आवश्यक होगा कि ऐसी चरम तनाव की रणनीतिक परिस्थितियों में गलती की गुंजाइश कदापि नहीं होती...

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Russia-Ukraine War: Putin attack on ukraine reminded of the Cuba Missile Crisis, when the Soviet Union bowed before the American nuclear threat
रूस-यूक्रेन युद्ध - फोटो : पीटीआई

विस्तार

यूक्रेन में उत्पन्न वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय संकट ने तमाम स्त्रातेजिक चिंतकों व कूटनीतिज्ञों को अक्तूबर 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट की याद दिला दी है, जब अमेरिकी सीमा से लगे साम्यवादी देश क्यूबा में सोवियत संघ की मदद से परमाणु प्रक्षेपास्त्र तैनात किए जा रहे थे और इनका प्रयोग केवल अमेरिका के विरुद्ध ही होना था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी ने अपनी सीमा के नज़दीक इस चुनौती को अस्मिता का प्रश्न बनाते हुए सोवियत संघ को यह धमकी दी कि यदि 48 घंटे में ये मिसाइलें क्यूबा से नहीं हटाई गईं तो सोवियत संघ मास्को पर परमाणु हमले के लिए तैयार रहे।

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सारी दुनिया जानती है कि यह शीत युद्ध का सबसे ज़्यादा तनाव भरा समय था, और दुनिया तबाही के कगार पर खड़ी थी। छोटी सी ग़लती भी विश्व युद्ध की चिंगारी बन सकती थी, फिर भी अमेरिका ने यह जोखिम लिया और सोवियत संघ को अपनी मिसाइलें हटानी पड़ीं और साथी देश क्यूबा को अमेरिकी दया पर छोड़ना पड़ा।

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अमेरिकी धमकी से नहीं डरा रूस

आज नाटकीय रूप से विश्व राजनीति फिर उसी मोड़ पर खड़ी है जब तमाम आश्वासनों के बाद भी अमेरिका अपने कथित मित्र यूक्रेन के लिए ज़मीन पर कुछ करता दिखाई नहीं देता, 23 फरवरी को जब रूस ने दो यूक्रेनी प्रांतों डोनेटस्क और लुहांस्क को स्वतंत्र देश का दर्ज़ा दिया तब भी राष्ट्रपति मिस्टर बाइडेन रूस पर आर्थिक प्रतिबंध की धमकी तक ही सीमित रहे और उसके अगले दिन जब रूसी फौजों ने राजधानी कीव और खारकीव समेत कई यूक्रेनी इलाकों में हवाई हमले किये, तब भी अमेरिकी राष्ट्रपति यह कहते नज़र आए कि नाटो की फौजें यूक्रेन नहीं जाएंगी, रूस पर और कड़े प्रतिबंध लगाए जाएंगे और रूस को यूक्रेन से हट जाना चाहिए।

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ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा जैसे नाटो के सहयोगी देश सिर्फ़ कड़ी निंदा तक सीमित हैं और रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने की बात कह कर अपने उत्तरदायित्वों को पूर्ण मान रहे हैं अथवा अपनी प्रतिष्ठा बचाने का प्रयास कर रहे हैं यह समझना मुश्किल है। दूसरी तरफ रूस की नीतियां इस विषय पर शीशे की तरह स्पष्ट हैं, यूक्रेन के अनेक रक्षा व हवाई ठिकानों पर लगातार हमलों के बाद राष्ट्रपति पुतिन ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, 'रूस अपनी सीमा से सटे यूक्रेन में नाटो का प्रसार किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा, यूक्रेनी सरकार को अपने किये का दंड भुगतना होगा।' अमेरिका व नाटो देशों को स्पष्ट चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा, 'दुनिया का कोई भी देश बीच में आया तो उसके लिए इतना बुरा होगा जितना कभी उसने सोचा भी नहीं होगा, रूस अब पीछे हटने वाला नहीं है।'

परमाणु प्रतिरोधकता का सिद्धांत

रूस के इतने कड़े रुख का अनुमान संभवतया अमेरिका ने भी नहीं लगाया होगा और अगर अमेरिकी सामरिक विशेषज्ञों ने ऐसा अनुमान लगाया भी होगा तो फिलहाल उनके सामने कोई विशेष विकल्प बचते भी नहीं, वास्तव में यहां विश्व की एक बड़ी शक्ति अपनी सीमा तक पहुंच चुकी असुरक्षा के विरुद्ध कोई भी कीमत चुकाने को तैयार है। यहां तक कि वे अमेरिका से भिड़ने को भी तैयार हैं जिसका सीधा सा आशय है कि रूस इस प्रश्न पर अब परमाणु हथियारों के साथ विश्व युद्ध से भी पीछे नहीं हटेगा। ऐसी रणनीतिक परिस्थितियों में परमाणु प्रतिरोधकता का सिद्धांत कार्य करता है, जब तनाव के शीर्ष पर नाभिकीय युद्ध से होने वाले संभावित महाविनाश का भय न सिर्फ युद्ध को रोकता है बल्कि युद्ध से होने वाली हानि के प्रति अनिच्छुक अथवा कम इच्छुक राष्ट्र को पीछे हटने के लिए बाध्य भी करता है।

जैसा कि इस वर्तमान संकट में दिखाई दे रहा है कि अमेरिका और नाटो के देश फिलहाल बयानबाज़ी तक ही सीमित हैं और रूस लगातार यूक्रेन के विरुद्ध जमीनी कार्यवाही करता जा रहा है, संभव है जल्दी ही रूस यूक्रेन में अपनी पसंदीदा सरकार स्थापित करवा के उसे अपने प्रभाव में ले लेगा, यूक्रेनी राष्ट्रपति व्लोदिमीर ज़िलेंस्की के लिए सबक है कि जिस अमेरिका के आश्वासन पर वे रूस से क्रीमिया और सिवस्तोपोल बंदरगाह की वापसी का दावा कर रहे थे, वह उन्हें युद्ध मे अकेला छोड़ कर दूर खड़ा तमाशा देख रहा है, वे मात्र अमेरिकी मोहरा सिद्ध हुए हैं जिनका अमेरिकी हितों की पूर्ति के लिए प्रयोग किया गया।

रूस को पुनः महाशक्ति के रूप में हुआ स्थापित

इस पूरे घटनाक्रम को ध्यान से देखने पर लगता है कि रूसी ने इस विषय पर काफी सोच विचार के बाद योजना बनाई। न केवल सैनिक तैयारी की गई बल्कि कूटनीतिक रूप से चीन, अजरबैजान, बेलारूस व पाकिस्तान सहित कई राष्ट्रों को सक्रिय रूप से उन्होंने अपने साथ मिला रखा है। जबकि दूसरी ओर नाटो देश कड़ी निंदा, प्रतिबंध, आलोचना, बयानबाज़ी और एक दूसरे का मुंह देखने के अतिरिक्त विशेष कुछ करने की स्थिति में नहीं दिखते, जिसका ऐसे युद्ध मे कोई महत्व नहीं है।

वास्तव में यूक्रेन का वर्तमान संकट पूरे विश्व पर अनेक आर्थिक, राजनीतिक व सैनिक प्रभाव डालेगा। यह तय है क्योंकि इस प्रकरण ने रूसी ताकत का प्रदर्शन करने के साथ साथ उसे पुनः एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, जिसकी परिणति में विश्व को एक नए शीत युद्ध की आहट भी दिखने लगी है, यह कहना आवश्यक होगा कि ऐसी चरम तनाव की रणनीतिक परिस्थितियों में गलती की गुंजाइश कदापि नहीं होती, किसी तरफ से भी की गई एक छोटी सी ग़लती या दुर्घटना संपूर्ण मानव सभ्यता का नामो निशान मिटा सकती है।



(लेखक मेरठ कॉलेज में रक्षा अध्ययन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है)

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