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इस्राइल-फिलीस्तीन विवाद: एपी और बीबीसी के सामने खड़ा हुआ साख का संकट

Tue, 25 May 2021 06:51 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 25 May 2021 06:51 PM IST
सार

एपी के 100 से ज्यादा कर्मचारियों ने एक खुला पत्र लिख कर एमिली विल्डर नाम की रिपोर्टर की बर्खास्तगी पर अपना विरोध जताया। विल्डर इस्राइल समर्थक गुटों के निशाने पर पहले से थीं। इन गुटों ने आरोप लगाया था कि अपने छात्र जीवन के समय विल्डर ने फिलीस्तीन के पक्ष में कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था...

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Recent Israeli-Palestinian conflict raised questions on credibility  of many western countries media houses
इस्राइल - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इस्राइल-फिलीस्तीन की हालिया लड़ाई में पश्चिमी देशों के कई मीडिया घरानों के रूझान को लेकर गहरे सवाल खड़े किए गए हैं। आरोप लगा है कि ये मीडिया घराने इस्राइल के पक्ष में रिपोर्टिंग और चर्चा करते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी समाचार एजेंसियों में एक एसोसिएटेड प्रेस (एपी) ने जब अपनी एक रिपोर्टर को उसके सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर हटा दिया, तो ये मामला ज्यादा भड़क गया।

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सोमवार को एपी के 100 से ज्यादा कर्मचारियों ने एक खुला पत्र लिख कर एमिली विल्डर नाम की रिपोर्टर की बर्खास्तगी पर अपना विरोध जताया। विल्डर इस्राइल समर्थक गुटों के निशाने पर पहले से थीं। इन गुटों ने आरोप लगाया था कि अपने छात्र जीवन के समय विल्डर ने फिलीस्तीन के पक्ष में कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था। हालिया लड़ाई के समय विल्डर ने सोशल मीडिया पर अपने पोस्ट में इस्राइल के हमलों की आलोचना की थी। एपी ने इसे अपनी सोशल मीडिया नीति का उल्लंघन बताते हुए पिछले हफ्ते उन्हें नौकरी से हटा दिया। विल्डर ने दावा किया है कि उन्हें अपनी सफाई देने तक का मौका नहीं दिया गया।
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खुला पत्र लिखने वाले कर्मचारियों ने कहा है कि विल्डर पर हुई कार्रवाई से इस समाचार एजेंसी की इस्राइल-फिलीस्तीन संबंधी रिपोर्टिंग की साख को नुकसान पहुंचेगा। उन्होंने मांग की है कि एपी प्रबंधक विल्डर की बर्खास्तगी के मामले में और अधिक स्पष्टीकरण पेश करें। विल्डर खुद भी यहूदी हैं। इसके बावजूद आरोप यह लगाया गया है कि उनके व्यक्तिगत विचारों से इस्राइल समर्थक लॉबी नाराज थी। उसके दबाव में समाचार एजेंसी ने उन्हें नौकरी से हटाया।
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विल्डर ने बाद में जारी एक बयान में कहा था कि जिस भावना से वे अपने छात्र जीवन में सामाजिक गतिविधियों में शामिल हुई थीं, उसी ने उन्हें ऐसा पत्रकार बनने के लिए प्रेरित किया, जो न्यायपूर्ण, आलोचनात्मक और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग के जरिए सामने ना आ सकने वाली खबरों को सामने लाए। उन्होंने पूछा कि उनकी बर्खास्तगी से आखिर युवा लोगों को क्या संदेश जाएगा, जो न्याय भावना से रिपोर्टिंग करने की इच्छा रखते हैं। एपी के कर्मचारियों ने अपने पत्र में कहा है कि विल्डर की औचक बर्खास्तगी से कर्मचारियों का ये विश्वास टूट गया है कि बिना सफाई का मौका दिए कभी उनकी बलि नहीं चढ़ा दी जाएगी।

उधर प्रिंसेस डायना के मामले में आई जांच रिपोर्ट से धूमिल हुई छवि से बीबीसी अभी उबरा नहीं है, जबकि एक कथित फिलीस्तीन समर्थक पत्रकार को नौकरी पर रखने का मामला उबल पड़ा है। बीबीसी के डिजिटल सेक्शन में काम करने वाली पत्रकार तला हलावा पर आरोप है कि कभी उन्होंने #हिटलरवॉजराइट हैशटैग के साथ ट्विट किया था। इसका मतलब है कि हिटलर ने यहूदियों का जो कत्ल-ए-आम किया, उसका उन्होंने समर्थन किया था। हालावा के बारे में विवाद पिछले हफ्ते इस्राइल समर्थक गुटों ने खड़ा किया। हलावा 2017 से बीबीसी में काम कर रही हैँ। विवाद उठने पर बीबीसी के प्रवक्ता ने कहा कि ये ट्वीट हलावा के बीबीसी ज्वाइन करने के पहले के हैं। इसके बावजूद इस मामले को गंभीरता से लिया गया है और उसकी जांच की जा रही है।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि हलावा से जुड़ी घटना ने बीबीसी में नियुक्ति प्रक्रिया पर गहरे सवाल खड़े किए हैं। साथ ही ये सवाल भी पूछा गया है कि क्या अगर किसी पत्रकार का इस्राइल समर्थक रुख सामने आए, तो क्या तब भी बीबीसी उस मामले को इतनी ही गंभीरता से लेगा?


इसके पहले पिछले फरवरी में ब्रिटिश अखबार द गार्जियन भी इससे विवाद से घिरा था। तब उसने नाथन रॉबिनसन नामक एक स्तंभकार के कॉलम को उनकी 20 साल पुरानी टिप्पणी के चर्चित होने के बाद हटा दिया था। उस टिप्पणी में रॉबिनसन ने इस्राइल को मिलने वाली अमेरिकी मदद का मखौल उड़ाया था।

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