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Nepal: PM बालेन शाह के भारतीय जमीन पर कब्जे वाले बयान पर बढ़ा विवाद, नेपाल के विदेश मंत्रालय को देनी पड़ी सफाई

Sun, 31 May 2026 09:48 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Sun, 31 May 2026 09:48 PM IST
सार

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के “भारतीय जमीन पर नेपाल के अतिक्रमण” वाले बयान पर विवाद बढ़ने के बाद विदेश मंत्रालय ने सफाई दी है। मंत्रालय ने कहा कि प्रधानमंत्री का इशारा नो-मैन्स लैंड और सीमा क्षेत्रों में जमीन के इस्तेमाल से जुड़े मामलों की ओर था।

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PM Balen Shah Statement over Encroachment on Indian Territory Controversy Escalates Foreign Ministry Clarify
नेपाल के विदेश मंत्रालय को देनी पड़ी सफाई - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

भारत-नेपाल सीमा विवाद को लेकर नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के बयान पर उठे विवाद के बाद अब नेपाल के विदेश मंत्रालय को सफाई देनी पड़ी है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि प्रधानमंत्री के “नेपाल द्वारा भारतीय जमीन पर अतिक्रमण” वाले बयान का मतलब सरकारी कब्जा नहीं, बल्कि सीमा के पास दोनों देशों के लोगों द्वारा जमीन के इस्तेमाल और नो-मैन्स लैंड से जुड़े मुद्दे थे। इस बयान के बाद नेपाल में राजनीतिक और कूटनीतिक बहस और तेज हो गई है।
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नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में कहा था कि उन्हें जानकारी मिली है कि सिर्फ भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया, बल्कि नेपाल की तरफ से भी कई जगह भारतीय जमीन का इस्तेमाल हुआ है। उनके इस बयान पर नेपाल में भारी विवाद शुरू हो गया था। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी “दसगजा” यानी नो-मैन्स लैंड और सीमा पार कब्जे से जुड़े मामलों को लेकर थी। मंत्रालय ने कहा कि इसे किसी सरकारी कब्जे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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नेपाल के विदेश मंत्रालय ने सफाई में क्या कहा?
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत और नेपाल की मौजूदा सीमा 1816 की सुगौली संधि पर आधारित है। मंत्रालय ने कहा कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा, कालापानी और सुस्ता जैसे कुछ क्षेत्र अब भी पूरी तरह सीमांकित नहीं हुए हैं। विदेश मंत्रालय के मुताबिक दोनों देश इन मुद्दों को बातचीत और कूटनीतिक माध्यम से सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। मंत्रालय ने यह भी कहा कि कई सीमावर्ती इलाकों में दोनों देशों के लोगों द्वारा एक-दूसरे की जमीन का इस्तेमाल किया जाता रहा है।
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दसगजा और सीमा पार कब्जे का क्या मतलब है?
नेपाल सरकार ने कहा कि “दसगजा” उन नो-मैन्स लैंड क्षेत्रों को कहा जाता है जो सीमा स्तंभों के बीच खाली छोड़े जाते हैं। कई जगह सीमा स्तंभ टूट गए या गायब हो गए हैं, जिसके कारण जमीन को लेकर भ्रम की स्थिति बनती रही है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि कुछ मामलों में भारतीय सीमा के लोग नेपाली जमीन का इस्तेमाल करते हैं और कुछ मामलों में नेपाली लोग भारतीय जमीन का उपयोग करते हैं। प्रधानमंत्री का बयान इसी तरह के मामलों से जुड़ा था।

भारत-नेपाल के बीच विवाद किन इलाकों को लेकर है?
भारत और नेपाल के बीच कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर लंबे समय से सीमा विवाद चल रहा है। भारत का कहना है कि ये इलाके उत्तराखंड का हिस्सा हैं। वहीं नेपाल इन क्षेत्रों पर अपना दावा करता है। हाल ही में कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भी दोनों देशों के बीच बयानबाजी हुई थी। भारत ने नेपाल के दावों को “एकतरफा कृत्रिम विस्तार” बताया था और कहा था कि ऐसे दावे स्वीकार नहीं किए जा सकते।

क्या दोनों देश बातचीत से समाधान चाहते हैं?
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों देशों की तकनीकी टीमें लंबे समय से सीमा स्तंभों की मरम्मत, सीमा निर्धारण और जमीन के इस्तेमाल से जुड़े तथ्यों पर काम कर रही हैं। मंत्रालय ने कहा कि भारत और नेपाल ऐतिहासिक दस्तावेजों, नक्शों और समझौतों के आधार पर विवाद सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। नेपाल ने साफ किया कि वह सीमा विवाद का समाधान शांति, संवाद और कूटनीतिक रास्ते से चाहता है।


नेपाल में बयान पर इतना विवाद क्यों हुआ?
प्रधानमंत्री बालेन शाह के बयान के बाद नेपाल में राजनीतिक हलचल तेज हो गई थी। कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या नेपाल ने आधिकारिक तौर पर कभी भारतीय जमीन पर कब्जा स्वीकार किया है। मीडिया और विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगा। इसी दबाव के बाद विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर पूरे मामले को स्पष्ट करने की कोशिश की।
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