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पाकिस्तान बाढ़ : मंदिर में मिली मुस्लिमों को शरण, बलोचिस्तान में हिंदू समुदाय ने खोले दरवाजे

Tue, 13 Sep 2022 12:30 AM IST
Amit Mandal एजेंसी, क्वेटा।
एजेंसी, क्वेटा। Published by: Amit Mandal Updated Tue, 13 Sep 2022 12:30 AM IST
सार

करीब 100 कमरों वाले बाबा माधोदास मंदिर में न सिर्फ बाढ़ पीड़ितों को सुरक्षित ठिकाना मुहैया कराया गया है बल्कि उन्हें मुफ्त भोजन भी दिया जा रहा है।

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Pakistan floods: Muslims found refuge in the temple, Hindu community opened doors in Balochistan
पाकिस्तान में बाढ़ से हाहाकार - फोटो : PTI

विस्तार

पाकिस्तान में आई बाढ़ में जहां सिंध, पंजाब और बलोचिस्तान के कई हिस्सों में जमीन तक दिखाई नहीं दे रही और हजारों लोग मारे जा चुके हैं, वहीं एक मंदिर में मुस्लिमों को शरण दी गई है। बलोचिस्तान प्रांत में कच्छी जिले के छोटे से जलाल खान गांव का यह मंदिर कुछ ऊंचाई पर बना है इसलिए बाढ़ का पानी यहां नहीं घुस पाया है। मंदिर प्रशासन ने सभी लोगों के लिए दरवाजे खोल दिए हैं, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम हैं।

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करीब 100 कमरों वाले बाबा माधोदास मंदिर में न सिर्फ बाढ़ पीड़ितों को सुरक्षित ठिकाना मुहैया कराया गया है बल्कि उन्हें मुफ्त भोजन भी दिया जा रहा है। यहां बाढ़ प्रभावित लोगों के अलावा उनके पशुओं को भी आसरा दिया गया है। डॉन अखबार ने बताया कि मंदिर में करीब 200 से 300 बाढ़ पीड़ित मौजूद हैं जिन्हें सम्मान के साथ हर दिन भोजन और नाश्ता कराया जा रहा है। बता दें कि क्षेत्र में नारी, बोलन और लहरी नदियों में आई बाढ़ के कारण यह गांव पूरे प्रांत से कट चुका है। 
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मेडिकल कैंप भी लगाया, लाउड स्पीकर पर की घोषणा
रिपोर्ट के मुताबिक, जलाल खान में हिंदू समुदाय के अधिकांश लोग रोजगार व अन्य अवसरों के लिए कच्छी के दूसरे शहरों में चले गए हैं। कुछ परिवार इस मंदिर की देखभाल के लिए इसी परिसर में रहते हैं। तहसील के एक दुकानदार 55 वर्षीय रतन कुमार वर्तमान में मंदिर के प्रभारी हैं। एक डॉक्टर इसरार मुघेरी ने मंदिर में मेडिकल कैंप लगाया है। हिंदुओं द्वारा लाउडस्पीकर पर मुस्लिमों को मंदिर में शरण लेने की घोषणाएं की गईं। 
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धार्मिक सीमाओं से परे रहे संत माधोदास
स्थानीय लोगों ने डॉन न्यूज को बताया कि बंटवारे से पहले बाबा माधोदास हिंदू संत थे। उनमें क्षेत्र के मुसलमानों और हिंदुओं की समान आस्था थी। भाग नारी तहसील से अक्सर इस गांव आने वाले इल्तफ बुजदार कहते हैं कि वह ऊंट पर यात्रा करते थे। उनके लिए धार्मिक सीमाओं के पार लोगों की जाति और विश्वास के बजाय मानवता सबसे ऊपर थी। 

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