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सराहनीय: केन्या में अब महिलाएं भी जमीन की हकदार, छोटे से गांव उमोजा की बदौलत बदली किस्मत

Fri, 26 Mar 2021 01:55 PM IST
प्रियंका तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, केन्या
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, केन्या Published by: प्रियंका तिवारी Updated Fri, 26 Mar 2021 01:55 PM IST
सार

  • 1990 में बसा था बिना मर्दों वाला गांव
  • महिलाएं कर रही संचालन
  • पुरुषों का प्रवेश वर्जित

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Now Women will also be entitled to land due to Womens living in Kenyas small village Umoja
उमोजा गांव की महिलाएं - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

दुनियाभर की महिलाएं आज भी कहीं न कहीं पुरुष प्रधान समाज में बराबरी की लड़ाई में संघर्षरत हैं। वह पितृसत्ता समाज में खुद के अस्तित्व के लिए जद्दोजहद कर रही हैं। हालांकि, धीरे-धीरे ही सही महिलाएं अब अपनी जिंदगी को अहमियत देना भी सीख रही हैं। इसी का जीता जागता उदाहरण हैं अफ्रीकी देश केन्या में स्थित एक छोटे से गांव उमोजा की महिलाएं। दरअसल, इस गांव की महिलाएं अब उस जमीन पर कानूनी रूप से हक पा सकेंगी, जिसे उन्होंने कई सालों की अपनी बचत और लोगों से मिली दान की रकम से खरीदा है। 

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दरअसल, केन्या में 5.49 करोड़ की आबादी रह रही है। इनमें पुरुष 49.9 प्रतिशत हैं तो वहीं,  महिलाएं 50.1 फीसद हैं। महिलाओं का प्रतिशत अधिक होने के बावजूद यहां देश की 98 प्रतिशत जमीन पुरुषों के नाम है। वैसे तो केन्या का कानून हर नागरिक को संपत्ति रखने का बराबर अधिकार देता है, लेकिन परंपरागत रूप से वह सिर्फ पुरुषों के नाम कर दिया जाता है पर अब उमोजा गांव की महिलाओं की बदौलत यह परंपरा टूटने जा रही है। 
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केन्या के एक प्रशासनिक अधिकारी का कहना है कि इन महिलाओं में जमींदारी हासिल करने की पहल उनके जागरूक होने के कारण हुई। उन्होंने कहा, ‘अगले माह 52 वर्षीय जेन उस खेत की मालकिन होंगी, जिस पर वह 30 सालों से खेती कर रही हैं।’ वहीं, उमोजा की मिट्टी में तीन दशक से खेती कर रहीं 52 साल की जेन ने कहा, ‘यह गांव ही हमारा सहारा रहा है। हमने अपनी जिंदगी सुधारने के लिए यहां मिलकर काम किया। एक-दूसरे को महिलाओं के अधिकार की महत्ता समझाई।’

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कैसे बसा यह गांव

उमोजा का अर्थ है एकता। यह गांव उत्तरी केन्या के समबुरू में स्थित है। इस गांव में पुरुषों के पैर रखने पर भी प्रतिबंध है। गांव को सुरक्षित करने के लिए इसके चारों ओर कांटेदार बाड़ लगाए गए हैं। इस गांव की शुरुआत महज 15 महिलाओं ने 1990 में की थी, जिनका उसी वर्ष ब्रिटिश सैनिकों ने रेप और यौन शोषण किया था। आज यही गांव पीड़ित महिलाओं के लिए एक सुरक्षित जगह बन चुका है। यहां अब रेप, बाल विवाह, घरेलू हिंसा और खतना जैसी तमाम हिंसा व अपराध झेलने वाली महिलाएं आकर खुशी-खुशी रह रही हैं।

कैंपेन साइट चला रहीं महिलाएं

यहां रह रही महिलाओं ने ही गांव में प्राइमरी स्कूल व अन्य सुविधाजनक चीजें बनाई हैं। गांव को सुरक्षित करने के लिए उन्होंने इसके चारों ओर कांटेदार बाड़ लगाए हैं। इतना ही नहीं वह कल्चरल सेंटर और सामबुरू नेशनल पार्क देखने आने वाले टूरिस्ट्स के लिए कैंपेन साइट भी चलाती हैं। इसके अलावा वह गांव के फायदे के लिए पारंपरिक ज्वेलरी भी बनाकर बेचती हैं। इस गांव की अपनी वेबसाइट भी है।

कम खर्च में कर रहीं गुजारा

गांव की महिलाओं को इन संस्थाओं के जरिये नियमित आमदनी होती है, जिससे उनकी कपड़े, खाने और रोजमर्रा की बाकी जरूरतें पूरी होती हैं। हालांकि, इनके खर्च बहुत सीमित हैं। गांव की मुखिया नदी के किनारे कैंपसाइट चलाती हैं, जहां सफारी घूमने आने वाले टूरिस्ट्स का ग्रुप रुकता है। सफारी घूमने आने वाले टूरिस्ट्स गांव भी देखने आते हैं। इनसे एंट्रेंस गेट पर गांव की महिलाओं द्वारा तय एंट्री फीस ली जाती है। गांव की महिलाओं को उम्मीद है कि यहां के क्राफ्ट सेंटर से टूरिस्ट्स एक दिन इनकी बनाई ज्वैलरी भी खरीदेंगे।

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