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अपनों का दर्द बांट रहे नेपाली: बच्चों ने स्नैक्स के पैसे किए दान, कैसे-कैसे इंसानियत की मिसाल पेश कर रहे लोग?
Thu, 03 Sep 2026 03:48 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, काठमांडो।
पीटीआई, काठमांडो।
Published by: राकेश कुमार
Updated Thu, 03 Sep 2026 03:48 PM IST
सार
नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है और मौतों का आंकड़ा 1,250 से ज्यादा पहुंच चुका है, जबकि 4,800 से अधिक लोग लापता हैं। इस संकट के बीच स्थानीय समुदाय राहत और बचाव के साथ अब पुनर्निर्माण में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। नेपाल के कई स्कूलों के बच्चों ने अपने स्नैक्स और जेब खर्च के पैसे तक बाढ़ पीड़ितों के लिए दान किए हैं। ये छोटी-छोटी पहल बताती हैं कि बड़ी आपदा के बीच इंसानियत और सामुदायिक एकजुटता किस तरह लोगों को दोबारा खड़ा करने की ताकत देती है।
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नेपाल त्रासदी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे इलाकों में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। अचानक आई बाढ़ ने पूरे के पूरे गांवों को उजाड़ दिया। कई जरूरी सड़कें और पुल बह गए। बिजली की लाइनें और नदी के जलस्तर पर नजर रखने वाले गेज भी तबाह हो गए।
इस आपदा में मौतों का आंकड़ा गुरुवार तक 1,250 से ज्यादा पहुंच गया। वहीं, 4,800 से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों तक पहुंचना बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई हाइड्रोपावर सुरंगों में सैकड़ों मजदूरों के फंसे होने की भी जानकारी सामने आई है।
सवाल: बाढ़ के बाद सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
जवाब: बाढ़ के बाद चुनौती सिर्फ लोगों को बचाने की नहीं है। अब प्रभावित परिवारों को दोबारा खड़ा करना भी उतना ही मुश्किल काम है। जिन इलाकों में सड़कें और पुल बह गए हैं, वहां राहत सामग्री पहुंचाना कठिन हो गया है।
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कई परिवार अपने घर खो चुके हैं। कुछ लोग अपने परिजनों के बारे में अब भी जानकारी का इंतजार कर रहे हैं। घायलों को अस्पताल पहुंचाने से लेकर मृतकों की पहचान तक, हर काम के लिए स्थानीय स्तर पर मदद की जरूरत पड़ रही है।
स्थानीय लोग बने मदद की पहली कड़ी
जवाब: सरकारी एजेंसियों के पास हर गांव तक तुरंत चेतावनी पहुंचाने के संसाधन हमेशा नहीं होते। ऐसे में स्थानीय नेटवर्क बहुत काम आते हैं। नेपाल में ‘गुठी’ जैसी सामुदायिक व्यवस्थाएं पहले से लोगों को जोड़ने का काम करती हैं।
महिलाओं के माइक्रोफाइनेंस और सहकारी समूह, सामुदायिक वन उपभोक्ता समूह और दूसरे स्थानीय संगठन भी आपदा के समय मददगार बन सकते हैं। इन्हें पता होता है कि किस घर में बुजुर्ग अकेले रहते हैं, कौन सा परिवार ज्यादा असुरक्षित है और किन इलाकों में पर्यटकों या यात्रियों की संख्या ज्यादा है।
सड़कें टूटीं तो लोगों ने खुद रास्ते निकाले
सवाल: राहत के बाद असली परीक्षा कब शुरू होगी?
जवाब: आपदा के तुरंत बाद देश-दुनिया का ध्यान राहत और बचाव पर रहता है। बड़ी मात्रा में सहायता और फंड भी पहुंचता है। लेकिन कुछ समय बाद मीडिया का ध्यान दूसरी घटनाओं की तरफ चला जाता है। अंतरराष्ट्रीय मदद और फंडिंग की रफ्तार भी कम हो सकती है। यही वह दौर है जब स्थानीय समुदायों की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रभावित लोगों को सिर्फ पैसे की जरूरत नहीं होती। उन्हें घर, कारोबार और सामाजिक जीवन दोबारा शुरू करने के लिए लंबे समय तक सहयोग चाहिए।
नेपाल की ‘परमा’ व्यवस्था कैसे बनेगी मददगार?
जवाब: नेपाल की पारंपरिक ‘परमा’ व्यवस्था इस काम में मदद कर रही है। इसमें एक परिवार दूसरे परिवार को एक दिन काम में मदद करता है और बाद में दूसरा परिवार भी उसके काम आता है। बाढ़ के बाद इसी व्यवस्था का इस्तेमाल मलबा हटाने, बची हुई चीजों को सुरक्षित निकालने और अस्थायी घर बनाने में किया जा रहा है। बाहरी एजेंसियां इन समुदायों को औजार और जरूरी सामान उपलब्ध करा रही हैं। स्थानीय लोग अपनी मेहनत, कौशल और इलाके की जानकारी दे रहे हैं।
बच्चों ने स्नैक्स के पैसे तक राहत के लिए दे दिए
पांच रुपये से 500 रुपये तक का योगदान
बच्चों ने पांच नेपाली रुपये से लेकर 500 नेपाली रुपये तक दिए। कुछ छात्रों ने वह पैसा दिया, जो वे आमतौर पर स्नैक्स खरीदने में खर्च करते थे। छात्रा लक्ष्मी शाही ने बताया कि कुछ बच्चों के लिए इसका मतलब था कि उन्होंने अपने स्नैक्स के पैसे बचाकर बाढ़ प्रभावित छात्रों की मदद की। खास बात यह रही कि जिन सात बच्चों ने अपने माता-पिता खो दिए थे, उन्होंने भी राहत राशि में योगदान दिया।
पहले दिन बच्चों ने 8,785 नेपाली रुपये जमा किए। दूसरे दिन 5,470 रुपये और मिले। इस तरह कुल 14,255 नेपाली रुपये जमा हुए। यह रकम बुधवार को राष्ट्रीय वाणिज्यिक बैंक के जरिए प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कराई गई।
दूसरे स्कूलों के बच्चों ने भी दिखाई एकजुटता
मंगलेसेन के प्रगतिशील बेसिक स्कूल में बच्चों ने एक दिन के स्नैक्स का पैसा राहत के लिए दिया। यहां 585 नेपाली रुपये जमा हुए। कपिलवस्तु में पांचवीं कक्षा की नौ वर्षीय सोम्या उपाध्याय ने अपने माता-पिता से स्नैक्स के लिए सामान्य से 20 रुपये ज्यादा मांगे। बाद में उसने मिले पैसों में से 50 रुपये दान कर दिए। उसी स्कूल की सात वर्षीय राधिका कोहार ने 30 रुपये दिए।
दोनों बच्चियों ने उस दिन स्नैक्स नहीं खाए। इसके बाद उनके सहपाठियों ने भी पांच से 100 रुपये तक का योगदान दिया। स्कूल में कुल 10,050 नेपाली रुपये जमा हुए। यह रकम प्रधानमंत्री प्राकृतिक आपदा राहत कोष में जमा की गई।
200 से ज्यादा छात्रों ने राहत में दिया योगदान
स्कूल के प्रधानाध्यापक राज कुमार कोहार के मुताबिक, स्कूल के 350 छात्रों में से 200 से ज्यादा बच्चों ने योगदान दिया। बच्चों ने खुद चंदा बॉक्स बनाया और अलग-अलग कक्षाओं में जाकर अपने साथियों से मदद मांगी। रौतहट के प्रेमपुर गोनाही माध्यमिक विद्यालय के 26 छात्रों ने भी अपने स्नैक्स के पैसे से 470 नेपाली रुपये जुटाए। इसे प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कराया गया।
काठमांडो के छात्रों ने जुटाए 37,110 रुपये
काठमांडो के मनमैजू माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 11 और 12 के छात्रों ने राहत अभियान की अगुवाई की। कक्षा छह से 12 तक के बच्चों ने अपने स्नैक्स का खर्च कम करके पैसे जुटाए। इस अभियान से 37,110 नेपाली रुपये जमा हुए। यह राशि भी प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कराई गई।
‘भूगोल अलग कर सकता है, दर्द नहीं’
रौतहट के शिक्षक मुकेश यादव ने बच्चों की पहल को मानवीय संवेदना की मिसाल बताया। उन्होंने कहा, 'भूगोल लोगों को अलग रख सकता है, लेकिन दुख साझा होता है।' अछाम के शिक्षक धन कुमार केसी ने भी बच्चों की पहल की तारीफ की। उन्होंने कहा, 'योगदान बड़ा या छोटा नहीं होता। राहत जुटाने की पहल छात्रों ने खुद की और उनकी भूमिका केवल उन्हें सहयोग देने तक रही।'
सवाल: नेपाल में राहत के लिए कितनी रकम जुटी?
जवाब: बुधवार दोपहर तक प्रधानमंत्री राहत कोष में 7.77 अरब नेपाली रुपये जमा हो चुके थे। इसके अलावा सरकार के डॉलर खाते में करीब छह मिलियन अमेरिकी डॉलर भी जमा किए गए थे। यह मदद ऐसे समय में आई है, जब बाढ़ ने रासुवा और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर नुकसान किया है। रासुवा, नुवाकोट और धादिंग के कई स्कूल भी प्रभावित हुए हैं। कई कक्षाओं में मिट्टी, रेत और गाद भर गई है।
बाढ़ के बाद अब लंबी होगी पुनर्निर्माण की राह
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के हिमस्खलन से यह बाढ़ आई। इसके बाद उत्तरी और मध्य नेपाल के कई कस्बों और गांवों में भारी तबाही हुई। अब बचाव अभियान के साथ पुनर्वास और पुनर्निर्माण की चुनौती सामने है। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मदद जरूरी होगी। लेकिन जमीन पर सबसे पहले और सबसे लंबे समय तक स्थानीय लोग ही एक-दूसरे का सहारा बनेंगे।
नेपाल की इन कहानियों में एक बड़ा संदेश छिपा है। किसी के पास लाखों रुपये नहीं हैं, तो कोई अपने हिस्से का सिर्फ एक स्नैक छोड़ रहा है। लेकिन संकट के समय यही छोटी-छोटी मदद किसी टूटे हुए परिवार को यह भरोसा देती है कि वह अकेला नहीं है।
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इस आपदा में मौतों का आंकड़ा गुरुवार तक 1,250 से ज्यादा पहुंच गया। वहीं, 4,800 से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों तक पहुंचना बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई हाइड्रोपावर सुरंगों में सैकड़ों मजदूरों के फंसे होने की भी जानकारी सामने आई है।
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सवाल: बाढ़ के बाद सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
जवाब: बाढ़ के बाद चुनौती सिर्फ लोगों को बचाने की नहीं है। अब प्रभावित परिवारों को दोबारा खड़ा करना भी उतना ही मुश्किल काम है। जिन इलाकों में सड़कें और पुल बह गए हैं, वहां राहत सामग्री पहुंचाना कठिन हो गया है।
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कई परिवार अपने घर खो चुके हैं। कुछ लोग अपने परिजनों के बारे में अब भी जानकारी का इंतजार कर रहे हैं। घायलों को अस्पताल पहुंचाने से लेकर मृतकों की पहचान तक, हर काम के लिए स्थानीय स्तर पर मदद की जरूरत पड़ रही है।
स्थानीय लोग बने मदद की पहली कड़ी
- ऐसे मुश्किल समय में स्थानीय समुदायों ने खुद आगे बढ़कर जिम्मेदारी संभाली है। जिन लोगों के घर सुरक्षित हैं, जिनके फोन काम कर रहे हैं या जो खतरे वाले इलाके से बाहर हैं, वे दूसरों की मदद कर रहे हैं।
- नेपाल में सामने आई कई घटनाएं बताती हैं कि आपदा के समय स्थानीय लोगों का नेटवर्क कितना अहम हो सकता है। एक शिक्षक ने बाढ़ की चेतावनी मिलने के बाद सैकड़ों बच्चों की जान बचाई। वहीं, ऊपरी इलाकों में रहने वाले लोगों ने नीचे बसे गांवों को समय रहते बाढ़ की जानकारी दी।
जवाब: सरकारी एजेंसियों के पास हर गांव तक तुरंत चेतावनी पहुंचाने के संसाधन हमेशा नहीं होते। ऐसे में स्थानीय नेटवर्क बहुत काम आते हैं। नेपाल में ‘गुठी’ जैसी सामुदायिक व्यवस्थाएं पहले से लोगों को जोड़ने का काम करती हैं।
महिलाओं के माइक्रोफाइनेंस और सहकारी समूह, सामुदायिक वन उपभोक्ता समूह और दूसरे स्थानीय संगठन भी आपदा के समय मददगार बन सकते हैं। इन्हें पता होता है कि किस घर में बुजुर्ग अकेले रहते हैं, कौन सा परिवार ज्यादा असुरक्षित है और किन इलाकों में पर्यटकों या यात्रियों की संख्या ज्यादा है।
सड़कें टूटीं तो लोगों ने खुद रास्ते निकाले
- जब सड़क और संचार व्यवस्था ने काम करना बंद किया, तब स्थानीय लोगों ने खुद नए तरीके खोजे। कहीं लोग मरीजों को क्षतिग्रस्त सड़कों के पार ले गए। कहीं संचार व्यवस्था ठप होने पर एक-दूसरे तक संदेश पहुंचाया गया। स्कूलों, मठों और घरों को अस्थायी राहत केंद्रों में बदल दिया गया।
- स्थानीय परिवहन नेटवर्क ने भी अपना काम बदलते हुए बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पानी, खाना और कपड़े पहुंचाने शुरू कर दिए। कुछ रेस्तरां भी जरूरतमंद परिवारों तक गर्म खाना पहुंचा रहे हैं।
सवाल: राहत के बाद असली परीक्षा कब शुरू होगी?
जवाब: आपदा के तुरंत बाद देश-दुनिया का ध्यान राहत और बचाव पर रहता है। बड़ी मात्रा में सहायता और फंड भी पहुंचता है। लेकिन कुछ समय बाद मीडिया का ध्यान दूसरी घटनाओं की तरफ चला जाता है। अंतरराष्ट्रीय मदद और फंडिंग की रफ्तार भी कम हो सकती है। यही वह दौर है जब स्थानीय समुदायों की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रभावित लोगों को सिर्फ पैसे की जरूरत नहीं होती। उन्हें घर, कारोबार और सामाजिक जीवन दोबारा शुरू करने के लिए लंबे समय तक सहयोग चाहिए।
नेपाल की ‘परमा’ व्यवस्था कैसे बनेगी मददगार?
जवाब: नेपाल की पारंपरिक ‘परमा’ व्यवस्था इस काम में मदद कर रही है। इसमें एक परिवार दूसरे परिवार को एक दिन काम में मदद करता है और बाद में दूसरा परिवार भी उसके काम आता है। बाढ़ के बाद इसी व्यवस्था का इस्तेमाल मलबा हटाने, बची हुई चीजों को सुरक्षित निकालने और अस्थायी घर बनाने में किया जा रहा है। बाहरी एजेंसियां इन समुदायों को औजार और जरूरी सामान उपलब्ध करा रही हैं। स्थानीय लोग अपनी मेहनत, कौशल और इलाके की जानकारी दे रहे हैं।
बच्चों ने स्नैक्स के पैसे तक राहत के लिए दे दिए
- नेपाल में मदद की यह भावना सिर्फ बड़े लोगों तक सीमित नहीं है। स्कूल के बच्चे भी अपनी क्षमता के मुताबिक बाढ़ पीड़ितों की मदद कर रहे हैं। कई बच्चों ने अपने जेब खर्च और स्नैक्स के पैसे तक राहत के लिए दे दिए।
- अछाम के शोडश माध्यमिक विद्यालय में नौवीं कक्षा के छात्र यूनिक केसी ने बाढ़ प्रभावित बच्चों के लिए चंदा जुटाने का सुझाव दिया। स्कूल के चाइल्ड क्लब में करीब 1,500 विद्यार्थी हैं। बच्चों ने कक्षाओं में जाकर स्वैच्छिक योगदान मांगा।
पांच रुपये से 500 रुपये तक का योगदान
बच्चों ने पांच नेपाली रुपये से लेकर 500 नेपाली रुपये तक दिए। कुछ छात्रों ने वह पैसा दिया, जो वे आमतौर पर स्नैक्स खरीदने में खर्च करते थे। छात्रा लक्ष्मी शाही ने बताया कि कुछ बच्चों के लिए इसका मतलब था कि उन्होंने अपने स्नैक्स के पैसे बचाकर बाढ़ प्रभावित छात्रों की मदद की। खास बात यह रही कि जिन सात बच्चों ने अपने माता-पिता खो दिए थे, उन्होंने भी राहत राशि में योगदान दिया।
पहले दिन बच्चों ने 8,785 नेपाली रुपये जमा किए। दूसरे दिन 5,470 रुपये और मिले। इस तरह कुल 14,255 नेपाली रुपये जमा हुए। यह रकम बुधवार को राष्ट्रीय वाणिज्यिक बैंक के जरिए प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कराई गई।
दूसरे स्कूलों के बच्चों ने भी दिखाई एकजुटता
मंगलेसेन के प्रगतिशील बेसिक स्कूल में बच्चों ने एक दिन के स्नैक्स का पैसा राहत के लिए दिया। यहां 585 नेपाली रुपये जमा हुए। कपिलवस्तु में पांचवीं कक्षा की नौ वर्षीय सोम्या उपाध्याय ने अपने माता-पिता से स्नैक्स के लिए सामान्य से 20 रुपये ज्यादा मांगे। बाद में उसने मिले पैसों में से 50 रुपये दान कर दिए। उसी स्कूल की सात वर्षीय राधिका कोहार ने 30 रुपये दिए।
दोनों बच्चियों ने उस दिन स्नैक्स नहीं खाए। इसके बाद उनके सहपाठियों ने भी पांच से 100 रुपये तक का योगदान दिया। स्कूल में कुल 10,050 नेपाली रुपये जमा हुए। यह रकम प्रधानमंत्री प्राकृतिक आपदा राहत कोष में जमा की गई।
200 से ज्यादा छात्रों ने राहत में दिया योगदान
स्कूल के प्रधानाध्यापक राज कुमार कोहार के मुताबिक, स्कूल के 350 छात्रों में से 200 से ज्यादा बच्चों ने योगदान दिया। बच्चों ने खुद चंदा बॉक्स बनाया और अलग-अलग कक्षाओं में जाकर अपने साथियों से मदद मांगी। रौतहट के प्रेमपुर गोनाही माध्यमिक विद्यालय के 26 छात्रों ने भी अपने स्नैक्स के पैसे से 470 नेपाली रुपये जुटाए। इसे प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कराया गया।
काठमांडो के छात्रों ने जुटाए 37,110 रुपये
काठमांडो के मनमैजू माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 11 और 12 के छात्रों ने राहत अभियान की अगुवाई की। कक्षा छह से 12 तक के बच्चों ने अपने स्नैक्स का खर्च कम करके पैसे जुटाए। इस अभियान से 37,110 नेपाली रुपये जमा हुए। यह राशि भी प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कराई गई।
‘भूगोल अलग कर सकता है, दर्द नहीं’
रौतहट के शिक्षक मुकेश यादव ने बच्चों की पहल को मानवीय संवेदना की मिसाल बताया। उन्होंने कहा, 'भूगोल लोगों को अलग रख सकता है, लेकिन दुख साझा होता है।' अछाम के शिक्षक धन कुमार केसी ने भी बच्चों की पहल की तारीफ की। उन्होंने कहा, 'योगदान बड़ा या छोटा नहीं होता। राहत जुटाने की पहल छात्रों ने खुद की और उनकी भूमिका केवल उन्हें सहयोग देने तक रही।'
सवाल: नेपाल में राहत के लिए कितनी रकम जुटी?
जवाब: बुधवार दोपहर तक प्रधानमंत्री राहत कोष में 7.77 अरब नेपाली रुपये जमा हो चुके थे। इसके अलावा सरकार के डॉलर खाते में करीब छह मिलियन अमेरिकी डॉलर भी जमा किए गए थे। यह मदद ऐसे समय में आई है, जब बाढ़ ने रासुवा और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर नुकसान किया है। रासुवा, नुवाकोट और धादिंग के कई स्कूल भी प्रभावित हुए हैं। कई कक्षाओं में मिट्टी, रेत और गाद भर गई है।
बाढ़ के बाद अब लंबी होगी पुनर्निर्माण की राह
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के हिमस्खलन से यह बाढ़ आई। इसके बाद उत्तरी और मध्य नेपाल के कई कस्बों और गांवों में भारी तबाही हुई। अब बचाव अभियान के साथ पुनर्वास और पुनर्निर्माण की चुनौती सामने है। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मदद जरूरी होगी। लेकिन जमीन पर सबसे पहले और सबसे लंबे समय तक स्थानीय लोग ही एक-दूसरे का सहारा बनेंगे।
नेपाल की इन कहानियों में एक बड़ा संदेश छिपा है। किसी के पास लाखों रुपये नहीं हैं, तो कोई अपने हिस्से का सिर्फ एक स्नैक छोड़ रहा है। लेकिन संकट के समय यही छोटी-छोटी मदद किसी टूटे हुए परिवार को यह भरोसा देती है कि वह अकेला नहीं है।