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'मम्मी पापा आप बचाने क्यों नहीं आए?': 60 घंटे तक मलबे में दबी रही मासूम, फिर नेपाली सेना ने ऐसे किया रेस्क्यू

Thu, 03 Sep 2026 04:36 PM IST
राकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो। Published by: राकेश कुमार Updated Thu, 03 Sep 2026 04:36 PM IST
सार

नेपाल के रसुवा जिले के टिमुरे गांव में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद छह साल की मासूम मनीषा मगर करीब 60 घंटे तक मलबे और कीचड़ के नीचे जिंदगी और मौत से जंग लड़ती रही। लकड़ी के एक टुकड़े की वजह से बने एयर पॉकेट ने उसे ऑक्सीजन दी और सशस्त्र पुलिस बल के जवानों ने उसकी धीमी चीख सुनकर 28 अगस्त को उसे सकुशल बाहर निकाल लिया। क्या है पूरा मामला? जानिए...
 

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nepal flash floods 6 year old manisha magar rescued after 60 hours in timure
छह साल की बच्ची मनीषा - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

विनाशकारी बाढ़, चारों तरफ बिखरा भयानक मलबा, और जिंदगी की उम्मीद छोड़ चुके लोग...नेपाल के रसुवा जिले के टिमुरे गांव में कुदरत का जो कहर बरसा, उसने पूरे इलाके को तबाह कर दिया। लेकिन इस खौफनाक मंजर के बीच एक ऐसा चमत्कार सामने आया है, जिसने सुरक्षा बलों से लेकर हर देखने वाले की आंखों में आंसू और उम्मीद दोनों ला दिए। 26 अगस्त को आई आकस्मिक बाढ़ के बाद लगातार करीब 60 घंटे तक मलबे, कीचड़ और मलबे के भारी-भरकम पत्थरों के नीचे दबी छह साल की बच्ची मनीषा मगर को आखिरकार सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है।  
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सवाल: जब चारों तरफ सिर्फ कीचड़ और कंक्रीट का मलबा था, तो मनीषा 60 घंटे तक जिंदा कैसे रह सकी?  

जवाब: मनीषा के इस तरह जिंदा बच निकलने को बचाव दल 'ईश्वरीय चमत्कार' मान रहा है। भारी बारिश और भोटे कोशी नदी में आए उफान के कारण जब टिमुरे गांव में बाढ़ का पानी और मलबा घुसा, तो मनीषा का घर ढह गया।  
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  • लकड़ी के टुकड़े ने बचाई सांसें: जब घर का ढांचा गिरा, तो लकड़ी के मलबे का एक हिस्सा मनीषा के सिर के ठीक ऊपर इस तरह टिक गया कि वहां हवा की आवाजाही के लिए एक छोटा सा 'एयर पॉकेट' बन गया।  
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  • कीचड़ से बची जान: इस छोटे से गैप की वजह से भारी कीचड़ और मलबा उसके चेहरे और नाक को पूरी तरह से ढक नहीं पाया, जिससे उसे लगातार ऑक्सीजन मिलती रही।  
  • हिम्मत नहीं हारी: लगातार ढाई दिनों तक बिना भोजन और पानी के, अंधेरे और भीषण नमी के बीच दबे रहने के बावजूद बच्ची ने सांसें थामे रखीं।
सवाल: इतने भारी मलबे के बीच बचाव दल को बच्ची के फंसे होने का पता कैसे चला?

जवाब: नेपाल सशस्त्र पुलिस बल और नेपाली सेना की टीम टिमुरे इलाके में लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही थी। 28 अगस्त की शाम जब जवान मलबे के बीच तलाशी ले रहे थे, तब एक जवान को मलबे के नीचे से किसी बच्चे के रोने की बहुत ही धीमी आवाज सुनाई दी।  
  • हाथों से हटाया मलबा: आवाज मिलते ही जवानों ने बिना भारी मशीनों का इंतजार किए अपने हाथों से पत्थरों और कीचड़ को हटाना शुरू कर दिया।
  • नाजुक ऑपरेशन: जरा सी चूक भी मलबे को धंसा सकती थी, इसलिए बेहद सावधानी से एक-एक लकड़ी और पत्थर को हटाया गया।  
  • सफल रेस्क्यू: आखिरकार जवानों की मशक्कत रंग लाई और 28 अगस्त की शाम मनीषा को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। बाहर निकालते ही जवानों ने उसे प्राथमिक उपचार दिया और पानी पिलाया।  

यह भी पढ़ें: अपनों का दर्द बांट रहे नेपाली: बच्चों ने स्नैक्स के पैसे किए दान, कैसे-कैसे इंसानियत की मिसाल पेश कर रहे लोग?

सवाल: रेस्क्यू के बाद मनीषा की तबीयत कैसी है और उसके परिवार का क्या हुआ?

जवाब: बाढ़ के शुरुआती झटके में मनीषा के माता-पिता उससे बिछड़ गए थे और दोनों को लग रहा था कि उनकी बेटी अब इस दुनिया में नहीं रही। लेकिन जब उन्हें बेटी के सुरक्षित मिलने की खबर मिली, तो पूरे परिवार की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा।
  • काठमांडो में इलाज: खराब मौसम के कारण तुरंत एयरलिफ्ट नहीं किया जा सका था, इसलिए अगले दिन नेपाली सेना के हेलीकॉप्टर से मनीषा को काठमांडो लाया गया।
  • शिक्षण अस्पताल में भर्ती: फिलहाल मनीषा का काठमांडू स्थित 'त्रिभुवन यूनिवर्सिटी टीचिंग हॉस्पिटल' के पीडियाट्रिक इमरजेंसी वार्ड में इलाज चल रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक उसे कुछ चोटें आई हैं, लेकिन उसकी हालत पूरी तरह से स्थिर है।
  • अस्पताल में मिलन: मनीषा के माता-पिता भी इस भीषण आपदा में सुरक्षित बच गए थे। बाद में सुरक्षा बलों की मदद से उन्हें काठमांडो लाया गया, जहां अस्पताल के वार्ड में जब उन्होंने अपनी बेटी को गले लगाया, तो वहां मौजूद डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की आंखें भी नम हो गईं। इस दौरान मनीषा ने पिता से कहा मैं जिंदा हूं, मम्मी पापा आप मुझे बचाने क्यों नहीं आए?   
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