Nepal Politics: नेपाल में प्रधानमंत्री दहल के ‘सोशलिस्ट फ्रंट’ बनाने के दांव पर गर्म हुईं अटकलें
Nepal Politics: पर्यवेक्षकों के मुताबिक हाल में सुप्रीम कोर्ट के माओवादी विद्रोह के दौर में हुई हत्याओं के लिए दहल को जवाबदेह ठहराने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो जाने के बाद से माओवादी गुटों में एकता की कोशिश नए सिरे से शुरू हुई है...
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प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल के ‘सोशलिस्ट फ्रंट’ बनाने के दांव ने नेपाल की सियासत में अटकलों का नया दौर शुरू कर दिया है। दहल ढाई महीने के अंदर दो बार पाला बदल चुके हैं। अब देश की कम्युनिस्ट ताकतों को एकजुट करने के उनके एलान मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन में शामिल गैर कम्युनिस्ट पार्टियों में संशय पैदा कर दिया है।
दहल ने कहा है कि कम्युनिस्ट एकता की शुरुआत ‘सोशलिस्ट फ्रंट’ के गठन के साथ की जाएगी, ताकि तमाम समाजवादी शक्तियों में सामान्य समझ बनाई जा सके। उसके बाद इस प्रयास को ‘तार्किक परिणति’ तक ले जाया जाएगा। दहल ने बीते सप्ताहांत अपनी पार्टी की एक बैठक में कहा था- ‘माओवादी लाइन पर चलने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच बातचीत चल रही है। हमारा मकसद शांति प्रक्रिया और संक्रमणकालीन न्याय से संबंधित बाकी बचे कार्यों को पूरा करना है। इसके लिए आने वाले दिनों में एक सोशलिस्ट फ्रंट बनाया जाएगा।’
खबरों के मुताबिक दहल लगभग रोजमर्रा के स्तर पर नौ अलग-अलग माओवादी गुटों के साथ बातचीत कर रहे हैं। पिछले नवंबर में हुए आम चुनाव के पहले भी दहल ने सोशलिस्ट फ्रंट बनाने का प्रस्ताव किया था। इसके लिए सत्ताधारी गठबंधन में शामिल तीन पार्टियों- माओइस्ट सेंटर, जनता समाजवादी पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड सोशलिस्ट) के बीच भी विस्तार से बातचीत हुई थी। लेकिन तब बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक हाल में सुप्रीम कोर्ट के माओवादी विद्रोह के दौर में हुई हत्याओं के लिए दहल को जवाबदेह ठहराने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो जाने के बाद से माओवादी गुटों में एकता की कोशिश नए सिरे से शुरू हुई है। इस प्रयास में माओइस्ट सेंटर खास भूमिका निभा रही है।
संकेत हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई के नेतृत्व वाली नेपाल समाजवादी पार्टी का माओइस्ट सेंटर में विलय लगभग पक्का हो गया है। भट्टराई की पार्टी ने पिछला आम चुनाव माओइस्ट सेंटर के चुनाव निशान पर ही लड़ा था। उधर, यूनिफाइड सोशलिस्ट और जनता समाजवादी पार्टी भी माओइस्ट सेंटर के साथ मोर्चा बनाने पर लगभग सहमत हो गई हैं। बताया जाता है कि पिछले आम चुनाव में इन सभी दलों की ताकत घटने के बाद उनमें एकता की जरूरत महसूस हुई है। आम चुनाव में माओइस्ट सेंटर की सीटें 54 से घट कर 32, जनता समाजवादी पार्टी की 17 से घट कर 12 और यूनिफाइड सोशलिस्ट की 24 से घट कर 10 रह गईं।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक अगर सोशलिस्ट फ्रंट का विचार कारगर रहता है, तो उसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के प्रति उसके रुख पर उनकी नजर रहेगी। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली यूएमएल अभी देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी है। लेकिन दहल और उनके साथी उसे माओवादी पार्टी नहीं मानते हैं। उनका दावा है कि इसलिए अभी यूएमएल को एकता प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया है। लेकिन जानकारों के मुताबिक आगे चल कर प्रस्तावित सोशलिस्ट फ्रंट उससे जुड़ने की कोशिश कर सकता है। यह संभावना नेपाली कांग्रेस के लिए चिंता का पहलू बन सकती है, जो वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी है।