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Nepal Politics: सियासी अवसरवाद और बार-बार पाला-बदल से नेपाली समाज में नेताओं की इज्जत घटी

Wed, 01 Mar 2023 03:53 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 01 Mar 2023 03:53 PM IST
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सार
Nepal Politics: दिसंबर में सात दलों का गठबंधन प्रधानमंत्री कौन बनेगा, इस सवाल पर टूटा था। तब नेपाली कांग्रेस यह पद दहल को देने को तैयार नहीं थी। अब यूएमएल के नेतृत्व वाला गठबंधन राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर टूटा है...
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Nepal Politics: civil society is anger due to recent political developments in Nepal
Nepal Politics- PM Pushpa Kamal Dahal and Nepali Congress President Sher Bahadur Deuba - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

नेपाल में हाल की राजनीतिक घटनाओं से सिविल सोसायटी में गहरी नाराजगी की भावना देखी जा रही है। खास कर जिस तरह प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ने दो महीने के अंतराल पर दो बार पलटी खाई, उससे राजनेताओं को लेकर असम्मान का भाव बढ़ा है। दहल ने बीते 25 दिसंबर को नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन छोड़ कर पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के समर्थन से नई सरकार बना ली थी। लेकिन अब वे यूएमएल का साथ छोड़ कर फिर नेपाली कांग्रेस के गठबंधन में चले गए हैं। दहल की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) के साथ साथ यूएमएल के नेतृत्व वाले गठबंधन की तीन और पार्टियों ने भी पाला बदल लिया है।

नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर राजेश गौतम ने कहा है कि हालिया घटनाओं के बारे में दो तरह की समझ रखी जा सकती है। पहली तो यह कि नेपाल में जिस तरह की चुनाव प्रणाली अपनाई गई है, उसमें किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलना लगभग असंभव है। जबकि देश के नेता गठबंधन की संस्कृति में ढल नहीं पाए हैं, इसलिए यहां गठबंधन ज्यादा समय तक टिक नहीं पाते। दिसंबर में सात दलों का गठबंधन प्रधानमंत्री कौन बनेगा, इस सवाल पर टूटा था। तब नेपाली कांग्रेस यह पद दहल को देने को तैयार नहीं थी। अब यूएमएल के नेतृत्व वाला गठबंधन राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर टूटा है। दिसंबर में बनी सहमति के मुताबिक यह पद यूएमएल को मिलना था, लेकिन दहल इस वादे से मुकर गए। अब वे नौ मार्च को होने वाले इस चुनाव में नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक राजेंद्र महाराजन ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘जब नेता अपने गठबंधन के ऊपर अपने निजी स्वार्थ को तरजीह देते हैं, तो गठबंधन के टूटने का खतरा हमेशा बना रहता है। यही बात नेपाल में वर्षों से दोहराई जा रही है।’

प्रधानमंत्री दहल को ऐसे अवसरवादी खेल का सबसे माहिर खिलाड़ी बताया जा रहा है। पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि पिछले नवंबर में हुए आम चुनाव में माओइस्ट सेंटर को सिर्फ 32 सीटें मिली थीं। इसके बावजूद दहल ने प्रधानमंत्री बनने की ठान ली। इसके लिए पहले उन्होंने नेपाली कांग्रेस का साथ छोड़ा। ये बाजी हाथ से निकलने के बाद नेपाली कांग्रेस ने यूएमएल के नेतृत्व वाले गठबंधन को तोड़ने की चाल चली। पर्यवेक्षकों के मुताबिक दहल कभी भी केपी शर्मा ओली के साथ काम करने में सहज नहीं रहे हैं। इसलिए नेपाली कांग्रेस से उन्हें प्रधानमंत्री बनाए रखने का आश्वासन मिलते ही उन्होंने फिर पाला बदल लिया।    

विश्लेषकों ने कहा है कि अगर सिर्फ 2017 के बाद से गठबंधनों के बनने और टूटने की घटनाओं पर ध्यान दिया जाए, तो यह साफ हो जाएगा कि नेपाली राजनीति में अवसरवादी दांव अपवाद नहीं, बल्कि आम बात हो गए हैं। महाराजन ने कहा- ‘एक खास संदर्भ में बने गठबंधन राजनीतिक स्थिति बदलने से पहले ही टूट जाते हैं।’

खबरों के मुताबिक अब दहल, नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड सोशलिस्ट) के प्रमुख माधव कुमार नेपाल के बीच मौजूदा प्रतिनिधि सभा के कार्यकाल में बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनने पर सहमति बनी है। लेकिन इस पूरी अवधि तक यह गठबंधन टिका रहेगा, यह भरोसा किसी को नहीं है।

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