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Nepal: भारत-चीन से लिपुलेख समझौता वापस लेने की मांग की, यूएमएल के नीति सम्मेलन में उठा मुद्दा
Mon, 08 Sep 2025 01:33 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ललितपुर
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ललितपुर
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Mon, 08 Sep 2025 01:33 AM IST
सार
नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने रविवार को संपन्न हुए नीति सम्मेलन में पारित हुए विशेष दस्तावेज में भारत और चीन के बीच हुए लिपुलेख समझौते का कड़ा विरोध किया। यूएमएल ने दोनों देशों से इस समझौते को वापस लेने की मांग की है।
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केपी शर्मा ओली, नेपाल के प्रधानमंत्री
- फोटो : X / @PM_nepal_
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विस्तार
नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी CPN-UML ने भारत और चीन के बीच हुए उस समझौते पर कड़ा एतराज जताया है, जिसमें नेपाल के लिपुलेख दर्रे का उपयोग व्यापार के लिए करने की बात कही गई है।
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रविवार को संपन्न हुए नीति सम्मेलन में पारित विशेष दस्तावेज में यूएमएल ने दोनों देशों से इस समझौते को वापस लेने की मांग की। साथ ही नेपाल सरकार से अपील की कि वह उच्चस्तरीय कूटनीतिक पहल कर इस मुद्दे को सुलझाए और काली नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल का अधिकार है, इसे स्पष्ट करे। यह प्रस्ताव पार्टी के 28 सूत्रीय वाले समकालीन दस्तावेज में शामिल किया गया।
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प्रस्ताव में प्रधानमंत्री और यूएमएल अध्यक्ष केपी शर्मा ओली के 30 अगस्त से तीन सितंबर तक चीन दौरे के दौरान लिपुलेख समझौते का विरोध दर्ज कराने को नेपाल की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को मजबूत बताकर सराहना की गई। प्रस्ताव में यात्रा के दौरान द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग का भी उल्लेख किया गया, जिससे विदेशों में देश की छवि बढ़ी।
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चीनी विदेश मंत्री वांग यी के भारत दौरे के दौरान हुआ समझौता
भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे से सीमा व्यापार दोबारा शुरू करने पर सहमति जताई है। यह दर्रा नेपाल की पश्चिमी सीमा के भीतर 56 किलोमीटर अंदर, लिम्पियाधुरा इलाके में स्थित है। समझौता अगस्त में भारत दौरे पर आए चीनी विदेश मंत्री वांग यी और भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर की मुलाकात के दौरान हुआ। संयुक्त बयान के बिंदु 9 में लिपुलेख, शिपकी ला और नाथू ला दर्रों से व्यापार फिर शुरू करने की बात दर्ज है।
भारत ने नेपाल के दावे को खारिज किया
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने इस समझौते का विरोध करते हुए कहा कि यह नेपाल की जमीन है और भारत-चीन का यह एकतरफा कदम अस्वीकार्य है। वहीं, भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल के दावे को खारिज करते हुए कहा कि इस मार्ग से दशकों से व्यापार होता आया है, जिसे कोविड और अन्य कारणों से रोक दिया गया था और अब फिर शुरू करने का निर्णय हुआ है। नेपाल के क्षेत्रीय दावों पर, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि ऐसे दावे 'न तो उचित हैं और नही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं।'
नेपाल ने संविधान में संशोधन कर जारी किया था नक्शा
इससे पहले, 2020 में नेपाल ने अपने संविधान में संशोधन कर नया राजनीतिक और प्रशासनिक नक्शा जारी किया था, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया। नेपाल का दावा है कि यह इलाका सुगौली संधि (1816) के अनुसार काली (महाकाली) नदी के पूर्व में आता है और इस आधार पर नेपाल की भूमि है।
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कैलाश मानसरोवर सड़क के उद्घाटन पर भी नेपाल ने जताया था विरोध
इसी विवाद के चलते, मई 2020 में जब भारत ने लिपुलेख से कैलाश मानसरोवर तक जाने वाली सड़क का उद्घाटन किया, तो नेपाल ने इसका कड़ा विरोध किया और भारत को औपचारिक विरोध पत्र सौंपा। भारत और चीन ने पहली बार 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के दौरान लिपुलेख से व्यापार बढ़ाने पर सहमति जताई थी। उस समय भी नेपाल ने कड़ा विरोध जताया था, क्योंकि यह निर्णय नेपाल की राय लिए बिना लिया गया था।
चीन द्वारा जारी नए नक्शे में लिपुलेख-कालापानी और लिम्पियाधुरा को दिखाया गया भारत का हिस्सा
2020 में गलवां घाटी में हुई झड़पों के बाद रिश्ते सामान्य करने की कोशिश में भारत और चीन फिर से लिपुलेख व्यापार खोलने पर राजी हुए हैं। लेकिन नेपाल अपने आधिकारिक नक्शे में लिपुलेख को अपना हिस्सा मानता है। पिछले साल 2023 में चीन ने नया नक्शा जारी किया था, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को भारत का हिस्सा दिखाया गया, जिससे विवाद और गहरा गया।